मेरा आईना – लतिका श्रीवास्तव

मां क्या जरूरत थी ये सब करने की अब इस उम्र में ..!! अमन की आवाज का लहजा तीखा और व्यंग्यपूर्ण था।

शुभी के ठहरे कदम तेजी से वहां तक आ गए।

क्या बात है इस तरह क्यों बोल रहे हैं आप उसने गर्दन झुकाए कुर्सी पर बैठी सास जी नीरजा की ओर देखते हुए टोका।

मां से ही पूछ लो कहता अमन पानी पीने लगा।

लेकिन मां तो कुछ बोल ही नहीं रहीं थीं।एकदम खामोशी से सिर झुकाए बैठी रहीं मानो कोई अपराध कर दिया हो।

शुभी ने बहुत पूछा लेकिन मां ने कुछ नहीं कहा।

मां देखिए शादी की शॉपिंग मैने कर ली।ये देखिए आपकी साड़ियां बहुत उत्साह से कई साड़ियां पैकेट से निकाल कर दिखाते हुए शुभी ने कहा ये सोच कर कि मां उत्साह से साड़ियां देखेगी लेकिन मां ने नजर उठाई ही नहीं।

ये इतने चटक रंग मां पहनेंगी अमन ने देखते ही प्रतिवाद किया।

क्यों नहीं पहनेगी।शादी है उनके पोते की अमन शुभी चकित हो गई।

पोते की शादी है शुभी ।मां इतने गहरे रंग की साड़ी नहीं पहनेगी अच्छा नहीं लगेगा कहता अमन कमरे से बाहर चला गया था।

मां भी एक नजर उन साड़ियों पर डाल तटस्थ भाव से वहां से उठ गईं थीं।

शुभी ऑफिस टूर से आज ही वापिस आई थी और सीधे ससुराल आ गई थी ।मां की ननद के लड़के की शादी थी।ननद का घर भी वहीं पास में ही था।आज उन्होंने कथा पूजा रखी थी शादी की तारीख निकलवानी थी पंडित जी से।मां और अमन वहीं गए थे।जाने ऐसा क्या हो गया वहां ।

मां उस दिन के बाद से खामोश ही हो गईं।

एक दिन रात के समय शुभी उन्हें गरम दूध देने गई तो देखा मां आईने में अपना चेहरा देख रहीं थीं।अचानक शुभी को आया देख वह अचकचा गईं जैसे कोई गलती हो गई हो।

मां ये दूध का गिलास वहीं डाइनिंग टेबल पर ही रखा था।आज आप भूल गईं शुभी ने उन्हें गिलास थमाते हुए वातावरण सहज करने का यत्न किया।

…. आज मन नहीं हो रहा था सफाई सी दी थी उन्होंने।

लीजिए मैं दुबारा गर्म करके लाई हूं पी लीजिए कहती शुभी वापिस अपने कमरे में लौट आई थी।

अमन बताओ तो उस दिन ऐसा क्या हुआ था।मां भी कुछ नहीं बता रहीं आप भी ।अमन उस दिन के बाद से मां कुछ उदास सी रहतीं हैं  शुभी ने अमन के पास बैठते हुए जोर देकर कहा।

पापा की याद आती होगी अमन ने टाल दिया।

अचानक पापा की याद !!लगभग दस बरस हो गए पापा को गुजरे।कुछ और बात है जो मां को चुभ गई है भीतर तक।पहले तो शादी विवाह में जाने को बहुत उत्सुक थीं।बुआजी के लड़के की यह शादी तो पहली ऐसी परिवार की शादी है जिसका सभी बेताबी से इंतजार कर रहे थे मां भी।पर अब शिथिल हो गई हैं।

शुभी से जब्त नहीं हो पा रहा था सो वह दूसरे ही दिन बुआजी के घर पहुंच गई।काफी रिश्तेदार जमा थे वहां।

अरे आओ शुभी आ गईं तुम आज फुर्सत मिली बुआजी ने पैर छूती शुभी को उठाते हुए कहा।

तब कहां थीं जब कथा पूजा थी।आज तो ऐसा कोई काम नहीं है काम तो उस दिन ही था रत्ना चाची ने व्यंग्य किया।

जी ऑफिस टूर में थी इसीलिए नहीं आ पाई।उसी दिन शाम को ही आई हूं सोचा आप सबसे मिल आऊं शुभी ने बिना असहज हुए जवाब दिया।

हां जानती हो  उस दिन तो तुम्हारी सासू जी बहुत तैयारी से आईं थीं क्यों विमला यहां आओ थोड़ा बताओ उनकी बहुरिया को चाची ने फिर व्यंग्य किया तो विमला जोर से हंस पड़ी।

हां बहू रानी तुम ही समझा दो उन्हें। आस पड़ोस की सब कह रहीं हैं तुम्हारी सास पार्लर गईं थीं थ्रेडिंग करवाने विमला ने आँखें चढ़ा मुंह को गोल गोल घुमाते हुए कहा तो शुभी सब समझ गई।

बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम कितने चटक रंग की साड़ी पहन कर आईं थीं क्या शोभा देता है ऐसा रंग पहनना उन्हे और बाल भी काला करवाती हैं हाय दैय्या मुंह पर हाथ रख सब हंस रहे थे और शुभी को मां की उदास खामोशी और अमन की नाराजगी का राज पता चल गया था।

विमला दीदी सभ्यता से बात करिए वह आपकी भी आदरणीय हैं नाराजगी शुभी के लहजे में स्पष्ट थी।

हां तो आदर के योग्य भी बनाना सीख लें विमला ने मुंह बिगाड़ते हुए कहा इस उम्र में जब ताया जी भी नहीं रहे तो बनाव सिंगार किसके लिए ये पार्लर ये थ्रेडिंग ये काले बाल… विमला की जुबान अंगारे की तरह लग रही थी शुभी को।

चुप करिए दीदी कहती शुभी झपटते हुए अपने घर वापिस आ गई।

रास्ते भर उसकी आँखों के सामने मां का उदास झुका चेहरा आता रहा।

वह सीधे अमन के पास गई।

अमन प्लीज़  सच सच बताओ मुझे आखिर ऐसी कौन सी घटना उस दिन हो गई थी वो भी मां से शुभी ने बहुत अधीरता से पूछा जिसे आज अमन टाल नहीं सका।

शुभी मां की उमर हो गई है।पापा को गए दस साल से ऊपर हो गए ।मां को सजने की क्या आवश्यकता है अमन के मुंह से निकल गया।

रुको रुको अमन पापा के जाने और मां के सजने का क्या संबंध है तेजी से टोक दिया शुभी ने।

क्यों संबंध नहीं है।जब पापा थे तब ठीक लगता था पर अब !! तुम्हे पता भी है मां छुप के पार्लर गईं थीं विमला दीदी कह रहीं थीं सब उस दिन कानाफूसी कर हंस रहे थे अमन ने इस तरह कहा मानो बम विस्फोट हो गया हो।

छुप के क्यों गईं थीं शुभी ने पलटवार किया था।

तुम्हीं सोचो ।क्योंकि उन्हें पता था कि वह गलत कर रहीं हैं उन्हें वहां नहीं जाना चाहिए था अमन ने त्वरित प्रतिक्रिया दे दी थी।

उन्हें नहीं अमन तुम्हें लगा कि वह गलत कर रही हैं तुम्हे शुभी चुप नहीं रह सकी।

तो फिर उन्होंने मुझसे वहां ले जाने के लिए क्यों नहीं कहा ।घर में किसी को बिना बताए क्यों चली गईं और आकर भी यही बोल रहीं थीं बाजार का कुछ काम था जबकि सच यह था कि वह पार्लर गईं थीं।मुझे तो शर्म सी आ रही है सोच कर इस उम्र में इन्हें क्या शौक चर्राया है थ्रेडिंग करवाने का अब किसको दिखाना है इन्हें अमन बोलता जा रहा था।

शर्म तो आपको आनी ही चाहिए अमन जो अपनी मां के लिए इस तरह की शब्दावली प्रयोग कर रहे हो शुभी तेज आवाज में बोल उठी जिसे सुन कर नीरजा जी भी बाहर वाले कमरे से आ गईं।

क्या हो गया शुभी आते ही उन्होंने चिंता से पूछा।

मां आप बिना बताए पार्लर गईं थीं उन्हें देखते ही शुभी ने प्रश्न दाग दिया नीरजा जी कांप गईं और अपना सिर झुका लिया कि बेटे के साथ अब बहू को भी ताना मारने का मखौल उड़ाने का मौका मिल गया।

मां मैं आपसे पूछ रही हूं शुभी ने फिर कहा तो अमन भी आक्रोश से उनकी तरफ़देखने लगा।

वो …वो बेटा अब से कभी नहीं जाऊंगी गला अटक गया था उनका।

क्यों नहीं जाएंगी शुभी ने फिर जोर से पूछा तो सहम कर अमन की तरफ देखने लगीं।

क्योंकि आपके बेटे को पसंद नहीं है आपका पार्लर जाना क्योंकि आपके बेटे को शर्म आती है मां के ऐसे शौक से शुभी ने धारदार आवाज में कहा तो नीरजा जी की आँखें भर आईं।

मां इसमें डरने या छुप कर जाने की क्या जरूरत है।अब से आप सबको बता कर जाएंगी ।पार्लर जाना कोई गुनाह नहीं है शुभी ने अमन की तरफ  तेज निगाहों से देखते हुए कहा तो अमन के साथ साथ नीरजा जी भी चौंक कर उसकी तरफ देखने लगे।

क्या मां आप भी।आपके बेटे को पसंद नहीं तो वह ना जाए आपको तो पसंद है ना तो आप जाइए।खुद को खुद के लिए भी तो सजा सकते हैं हम शुभी ने नीरजा जी के एकदम पास आकर उनके कांधे पर हाथ रख आहिस्ता से कहा तो नीरजा जी की आंखों में भरे अश्रु धार बन बह चले।

बेटा मै जब भी आईना देखती हूं अपने आप को पहचान ही नहीं पाती।सफेद बाल मुझको डराते हैं मुझे अपना चेहरा बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ।जब मैं आईना देखती हूं मेरे सफेद बाल मुझे भयानक लगते हैं मैं क्या करूं सब मेरी हंसी उड़ा रहे थे उस दिन गला भर आ रहा था उनका।

आप वही करिए मां जो आपको पसंद हो दूसरों के आईने से खुद को क्यों देखना।आईना आपका है जो देखना चाहती हैं वही देखें।सिर्फ पापा जी के आईने में ही आपको सुंदर दिखना था या उनके सामने ही क्यों !!अपने लिए अपने शौक के लिए अपनी खुशी के लिए भी हमें कुछ करना चाहिए।बहुत हो गया मां आज ही हम दोनों पार्लर चलेंगे और परसों शाम की दावत में बुआ जी के घर चलेंगे शुभी ने कहा तो नीरजा जी नहीं नहीं मुझे अब कहीं नहीं जाना मै घर पर ही रहूंगी तुम अमन के साथ चले जाना कहती वहीं कुर्सी पर निढाल सी बैठ गईं।

अमन आप ही समझाइए मां को।

क्या अपने लिए ठीक से रहने में कोई गलत बात है।मां जिंदगी भर पार्लर जाती रहीं उन्हें पसंद है।पापा के नहीं रहने से या उम्र ज्यादा हो जाने से क्या अब उनका जाना गलत हो गया।क्या उनकी अपनी जिंदगी नहीं है।पापा नहीं हैं तो उनकी जिंदगी भी नहीं रह गई।रिश्तेदार पड़ोसी कौन होते हैं इन पर इनकी पसंद पर उंगली उठाने वाले ।आप को भी क्या अधिकार है मां पर नाराज होने का।क्या अब इस उम्र में आप उन्हें समझाएंगे क्या करना उनके लिए सही है क्या गलत।आप ही जब उन्हें गलत ठहराएंगे तो दूसरे तो मौका ही ढूंढते रहते हैं। अपने ही घर में अपना मन मार कर अपनी जिंदगी बोझिल बनाना क्या सही है।किसी को ना हो पसंद मां को तो पसंद है ना ।ये सब वह अपने लिए करती हैं और करती रहेंगी क्या आप नहीं चाहते मां सुख और खुशी से रहें क्या उनकी इतनी सी खुशी आपसे देखी नहीं जाती शुभी ने  कहा तो अमन को भी लगा वाकई इसमें गलत क्या है।क्या मां की अपनी जिंदगी नहीं है। मैं तो दूसरे क्या कहेंगे इस वजह से डरता हूं ।

हां शुभी इस पहलू से तो मैने सोचा ही नहीं। मां को जो अच्छा लगता है वह क्यों नहीं कर सकती सिर्फ बाहरी चंद लोगों के दकियानूसी विचारों के कारण उनके तानों के कारण क्या ठीक से तैयार होना अनुचित हो जाएगा।।मां अब से तुम किसी की बात पर ध्यान मत देना और ये छोटे छोटे अपने शौक निर्भीकता पूर्वक पूरे करो।मुझे माफ कर देना मां इतना पढ़ा लिखा होकर भी मैं इस संकीर्ण दकियानूसी सामाजिक मानसिकता के चक्रव्यूह में फंस गया था ।

बेहद दुखी होकर अमन मां के घुटनों पर सिर टिका जमीन पर बैठ गया।

अब इतना दुख मत मनाओ।ज्यादा दुख लग रहा है तो चलो हम दोनों को अभी पार्लर ले चलो या अगर मां राजी हों तो घर पर ही बुलवा लेती हूं पार्लर वाली को शुभी ने वातावरण हल्का करने की कोशिश की।

हां शुभी घर पर ही बुलवा लो मां को आने जाने का कष्ट नहीं होगा अमन ने भी उत्साह से कहा।

हां हां और आपको भी कष्ट ना होगा हम लोगों को ले जाने का है ना मैं खूब समझती हूं शुभी ने जोर से हंसकर कहा तो अमन झेंप गया।

शुभी ने फोन कर बुकिंग कर ली।एक घंटे में पार्लर से दो लड़कियां आ गईं।

नीरजा जी बहुत संकोच कर रहीं थीं।

मां अपनी खुशी के लिए कुछ करना अपराध नहीं होता ।अपने शौक को प्राथमिकता देना शुरू कीजिए जिंदगी आपकी है अपने हिसाब से जिया जाए दूसरों के नहीं अमन ने मां के पास आकर सहज और वत्सल स्वर में कहा तो मां के अंदर कुछ पिघलता चला गया।

रात की दावत के लिए शुभी ने मां को खासतौर से तैयार किया।बढ़िया नई वाली साड़ी में।

वे सभी महिलाएं जो उस दिन व्यंग्य कर रहीं थीं।आज नीरजा जी की नई सज धज देख हतप्रभ थीं।

अरी बहुरानी ये क्या कर रही हो।हमने कहा था अपनी सास को समझा लो ये साड़ी…फिर पार्लर गईं थीं लगता है….विमला तेजी से पास आकर कहने लगी।

नहीं दीदी पार्लर नहीं गईं थीं । मैंने समझाया था मां को कि उतनी दूर पार्लर आने जाने का कष्ट उठाने की क्या जरूरत है ।तो घर पर ही पार्लर बुलवा लिया था हंसकर बहुत शालीनता से शुभी ने उत्तर दिया था और हां दीदी आपको भी समझाना चाहती हूं अच्छे से रहना अच्छे कपड़े पहनना अपनी पसंद की जिंदगी जीना सबका अधिकार होता है इसमें गलत या अनुचित जैसा क्या है ।क्या आपको मां आज ज्यादा सुंदर नहीं दिख रहीं ज्यादा खुश नहीं दिख रहीं …इसमें गलत क्या है शुभी की बात सुन बाकी महिलाएं भी वहां आ गईं।

कुछ गलत नहीं है बहुरिया नीरजा को जो पसंद है वह करेगी और ऐसा कोई अनर्थ तो कर नहीं रही है तभी चुप बैठी दादी सास बोल पड़ीं।

सच बताऊं विमला दीदी को जलन हो रही है कि काश मैं भी इतने कायदे से रहती पार्लर जाती बाल रंगती निधि ने जोर से चुटकी ली तो सब हंस पड़े।

हमारी भी जिंदगी है।दूसरों के सही गलत के हिसाब से अपनी पसंद नापसंद कब तक क्यों निर्धारण करें।तुमको नहीं पसंद मत करो दूसरे के न्यायाधीश मत बनो दादी सास ने कहा तो उनकी बात सुन शुभी ने उन्हें गले से लगा लिया।

वाह दादी हों तो ऐसी हों शुभी कह उठी।

शुभी एक बात कहूं मेरी भी बहुत सालों की दबी इच्छा है कि एक बार मैं अपने इन सफेद बालों को काला कर पाती।पर ऐसी मेरी किस्मत कहां….किससे कहूं और कैसे कहूं सबकी हंसी की पात्र बनूं यही डर मेरी इच्छा पर हर बार हावी हो जाता है दादी सास ने शुभी के कान में कहा जिसे सबने सुन लिया।सब हंसने लगे साथ में दादी भी पोपली हंसी से।

इतनी सी इच्छा को क्या दबाना दादी जी।मै खुद आकर आपके बाल डाई कर दूंगी एक हफ्ते बाद शादी समारोह में सिर्फ आप को ही सब देखेंगे देखिएगा शुभी ने बहुत दुलार से दादी के गले में बांहे डाल कर कहा।

नीरजा की आंखों में चमक थी आज।अपने लिए भी और अपनी बहू के लिए भी।

शादी समारोह में दादी जो हमेशा सफेद सूती सी बेरंग साड़ी में लिपटी उदासी सी लपेटे रहतीं थीं आज शुभी की मेहनत से बनारसी साड़ी और काले बालों में अलग ही दिख रहीं थीं।एक अलग ही खुशी की आभा से उनका चेहरा दमक रहा था ।बरसों की दबी इच्छा पूरी हुई थी उनकी। बरसों से उनकी जिंदगी से सारे रंग प्रतिबंधित कर दिए गए थे।उनकी भी इच्छा नहीं होती थी किसके लिए पहनूं ये प्रश्न उन्हें विचलित कर अदृश्य खिंची सीमा रेखा में बांध देता था।उस सीमारेखा को ही वह अपनी नियति मान लीं थीं।आज शुभी ने उन्हें हिम्मत से सोचना सिखाया कि किसी के लिए अपने खुद के लिए करिए वह हर काम जो आपको अच्छा लगता है।

शुभी नीरजा जी के साथ दादी के पास ही खड़ी थी।उन्हें इतना प्रसन्न और सहज देख बाकी महिलाएं भी स्वयं की ऐसी इच्छाओं को पूरा करने की हिम्मत और उत्साह अपने भीतर महसूस कर रहीं थीं।

(अब आप लोग ही बताइए शुभी ने सही किया या नहीं? दादी मां ने जो किया वह अनुकरणीय है या नहीं ? आखिर बाकी महिलाएं नीरजा पर व्यंग्य क्यों कर रहीं थीं?क्या कोई महिला दूसरों को दिखाने के लिए ही सजती है या स्वयं को दिखाने और  खुश करने के लिए भी!! दूसरों के आईने में नहीं अपने को देखने के लिए अपने आईने खुद बनाइए)

ऐसी किस्मत कहां#कहानी प्रतियोगिता

लतिका श्रीवास्तव 

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