**मायके की वो “बेगानी” अलमारी और भाभी का प्रेम** – हर्षिता सिंह

*शादी के पांच साल बाद जब वह टूटे हुए स्वाभिमान के साथ भाई के चौखट पर लौटी, तो उसे लगा कि वह अब इस घर में सिर्फ एक ‘बोझ’ है। लेकिन एक दिन भाभी ने उसे घर की तिजोरी की चाबी थमाकर कुछ ऐसा कहा कि उसकी रूह तक कांप गई और आँखों से वर्षों का जमा दर्द बह निकला।*

सुधा ने भी अपनी आँखों के कोर पोंछे और कविता को उठाया। “पगली लड़की! बोझ तो वो होते हैं जो दिल में नहीं, सिर पर रहते हैं। तुम तो हमारे दिल में रहती हो। और सुन, आज के बाद अगर तूने पानी, चाय या खाने के लिए मुझसे पूछा, तो मैं सच में तुझे घर से निकाल दूँगी। यह धमकी समझ या भाभी का ऑर्डर।”

शाम के 4 बज रहे थे। घर में सन्नाटा पसरा था। रसोई में बर्तनों की खनक के बीच सुधा अपने खयालों में गुम थी कि तभी उसे किसी के दबे पाँव चलने की आहट सुनाई दी। उसने पलटकर देखा। दरवाजे की ओट में उसकी ननद, कविता, खड़ी थी।

कविता… वही कविता जो कभी इस घर की रौनक हुआ करती थी। जिसकी हंसी से घर की दीवारें गूंजती थीं। लेकिन आज, पांच साल बाद, जब वह अपनी ससुराल छोड़कर वापस आई थी, तो वह कविता कहीं खो गई थी। उसकी जगह एक सहमी, डरी और संकोची छाया ने ले ली थी।

“अरे कविता? तुम यहाँ खड़ी क्यों हो? अंदर आओ न,” सुधा ने प्यार से कहा।

कविता हिचकिचाते हुए अंदर आई। उसकी नज़रें झुकी हुई थीं। “भाभी… वो… मुझे थोड़ी प्यास लगी थी। क्या मैं फ्रिज से पानी ले लूं?”

सुधा के हाथ से बेलन छूटते-छूटते बचा। उसका दिल एक पल के लिए रुक गया। यह कैसा सवाल था? अपने ही घर में, अपने ही भाई-भाभी के सामने पानी पीने की इजाज़त?

सुधा ने खुद को संभाला। वह जानती थी कि कविता के साथ उसके ससुराल में क्या-क्या हुआ है। ताने, रोक-टोक और हर छोटी बात पर अपमान ने उसके आत्मविश्वास को दीमक की तरह चाट लिया था।

सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा, “पागल हो क्या? पानी पीने के लिए पूछना पड़ता है क्या? यह तुम्हारा ही घर है बाबा। ले लो।”

कविता ने कांपते हाथों से फ्रिज खोला, बोतल निकाली और पानी पिया। फिर बोतल को वापस रखते हुए उसने उसे तीन बार चेक किया कि वह सही जगह रखी है या नहीं। कहीं भाभी नाराज़ न हो जाएं।

सुधा यह सब कनखियों से देख रही थी। उसे याद आया, शादी से पहले यही कविता फ्रिज खुला छोड़ देती थी और चिल्लाती थी, “भाभी, पानी ठंडा नहीं है!” और आज… आज उसे बोतल रखने में भी डर लग रहा था।

शाम को जब सुधा का पति और कविता का भाई, रवि, ऑफिस से आया, तो घर का माहौल थोड़ा सामान्य हुआ। रवि अपनी बहन को बहुत प्यार करता था, लेकिन पुरुषों की तरह वह भी बारीक भावनाओं को समझने में थोड़ा कच्चा था। उसे लगता था कि कविता को वक्त लगेगा, सब ठीक हो जाएगा।

रात के खाने की मेज पर।

कविता ने अपनी थाली में बहुत थोड़ी सी सब्जी ली।

रवि ने देखा तो बोला, “अरे गुड़िया, बस इतना सा? और ले न। तुझे तो भिंडी पसंद है।”

कविता ने धीरे से कहा, “नहीं भैया, बस… पेट भर गया। ज्यादा खाऊंगी तो…” वह वाक्य अधूरा छोड़कर चुप हो गई। शायद उसे याद आ गया होगा कि ससुराल में उसे कहा जाता था, ‘मुफ्त की रोटियाँ तोड़ती है’।

रवि ने जोर नहीं दिया, लेकिन सुधा ने देखा कि कविता की नज़रों में भूख थी, पर डर उससे बड़ा था।

अगले दिन सुबह, सुधा जानबूझकर थोड़ी देर से उठी। उसने देखा कि कविता पहले ही उठ चुकी थी और झाड़ू लगा रही थी।

“अरे कविता, तुम क्यों कर रही हो? कामवाली बाई आएगी न,” सुधा ने टोका।

कविता हड़बड़ा गई। झाड़ू उसके हाथ से गिर गया। “नहीं भाभी… वो… मुझे लगा आप सो रही हैं, और बाई लेट हो जाएगी… तो मैंने सोचा मैं ही कर लूं। मैं बैठी-बैठी क्या करूँगी? बोझ ही तो हूँ…” आखिरी शब्द बहुत धीमे थे, पर सुधा के कानों तक पहुँच गए।

सुधा का दिल पसीज गया। उसे समझ आ गया कि कविता ‘बहन’ बनकर नहीं, बल्कि ‘आश्रित’ बनकर जी रही है। उसे लग रहा है कि उसे अपने रहने और खाने की कीमत चुकानी पड़ेगी, वरना भाभी ताने देंगी।

सुधा ने तय किया कि अब बहुत हो गया। इस घर की बेटी को उसका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाना ही होगा।

दोपहर का समय था। सुधा ने अपनी अलमारी खोली और उसमें से कुछ पुराने कपड़े निकालने लगी। तभी कविता वहां आई।

“भाभी, मैं आपकी मदद कर दूँ?”

सुधा ने मुस्कुराकर उसे पास बुलाया। “हाँ, आ जाओ। वैसे भी मुझे तुम्हारी मदद की सख्त ज़रूरत है।”

सुधा ने अलमारी का लॉकर खोला। उसमें घर के कुछ जेवर और कुछ नकदी रखी थी। सुधा ने लॉकर की चाबी निकाली और उसे कविता की हथेली पर रख दिया।

कविता चौंक गई। “भाभी, यह… यह क्या है?”

“यह इस लॉकर की चाबी है,” सुधा ने सामान्य भाव से कहा। “और यह घर की दूसरी चाबी। देखो कविता, मुझे आज शाम को मायके जाना है, माँ की तबीयत थोड़ी नासाज़ है। हो सकता है मुझे वहां एक-दो दिन रुकना पड़े। रवि तो ऑफिस में रहेगा। अब घर की ज़िम्मेदारी और इस लॉकर की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है।”

कविता के हाथ कांपने लगे। “नहीं भाभी… मैं… मैं यह नहीं ले सकती। इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी… अगर कुछ खो गया तो? अगर मुझसे कोई गलती हो गई तो?” उसका चेहरा पीला पड़ गया। उसे याद आया कि ससुराल में एक बार चाबी खोने पर उसे पूरी रात घर के बाहर खड़ा रखा गया था।

सुधा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। “मेरी आँखों में देखो कविता।”

कविता ने डरते-डरते नज़रें उठाईं।

“तुम कौन हो?” सुधा ने पूछा।

“मैं… मैं कविता…”

“नहीं, तुम इस घर की बेटी हो। रवि की बहन हो। और मेरी… मेरी ननद बाद में, सहेली पहले हो। क्या तुम चोर हो?”

“नहीं भाभी!” कविता की आँखों में आंसू आ गए।

“तो फिर डर कैसा? यह घर जितना मेरा है, उतना ही तुम्हारा है। बल्कि मुझसे ज्यादा तुम्हारा है, क्योंकि तुम इसमें पैदा हुई हो। अगर तुमसे कुछ खो भी गया, तो क्या मैं तुम्हें घर से निकाल दूँगी? क्या रवि तुम्हें मारेगा?”

कविता फूट-फूट कर रो पड़ी। वह घुटनों के बल बैठ गई और सुधा की गोद में सिर रख दिया। “भाभी… मुझे डर लगता है। मुझे लगता है मैं आप लोगों पर बोझ हूँ। मेरा अपना घर टूट गया, अब मैं यहाँ पड़ी हूँ। मुझे लगता है कहीं आप भी मुझसे नफरत न करने लगो।”

सुधा ने भी अपनी आँखों के कोर पोंछे और कविता को उठाया। “पगली लड़की! बोझ तो वो होते हैं जो दिल में नहीं, सिर पर रहते हैं। तुम तो हमारे दिल में रहती हो। और सुन, आज के बाद अगर तूने पानी, चाय या खाने के लिए मुझसे पूछा, तो मैं सच में तुझे घर से निकाल दूँगी। यह धमकी समझ या भाभी का ऑर्डर।”

सुधा ने जबरदस्ती चाबी कविता के पल्लू में बांध दी। “अब आँसू पोंछ। और सुन, मुझे शाम की चाय तेरे हाथ की पीनी है। वैसी ही कड़क अदरक वाली, जैसी तू शादी से पहले बनाती थी। और हाँ, चीनी कम मत डालना, अब तुझे किसी के डायबिटीज या गुस्से का खयाल रखने की ज़रूरत नहीं है। अपनी मर्ज़ी की चाय बना।”

उस शाम, घर का नक्शा कुछ और ही था।

जब रवि ऑफिस से आया, तो उसने देखा कि डाइनिंग टेबल पर तरह-तरह के पकवान सजे थे। कविता रसोई में गुनगुना रही थी। सुधा सोफे पर बैठकर मैगज़ीन पढ़ रही थी।

“अरे वाह! आज क्या खास है?” रवि ने हैरान होकर पूछा।

कविता ट्रे लेकर बाहर आई। उसके चेहरे पर वो पुरानी चमक की एक हल्की सी लकीर वापस आ गई थी। “भैया, आज मैंने पसंद की आलू-पुरी और खीर बनाई है। भाभी कह रही थीं कि उन्हें आज खाना बनाने का मन नहीं है, तो मैंने मोर्चा संभाल लिया।”

रवि ने सुधा की तरफ देखा। सुधा ने आँखों ही आँखों में इशारा किया कि ‘सब ठीक है’।

खाना खाते वक्त, कविता ने अपनी थाली में इस बार दो एक्स्ट्रा पूरियां रखीं। उसने रवि से पूछा नहीं, उसने सुधा की तरफ डरते हुए नहीं देखा। उसने बस हक़ से खाना परोसा।

अचानक, कविता के हाथ से पानी का गिलास छूट गया। कांच का गिलास फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया।

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। कविता का शरीर फिर से अकड़ गया। उसके हाथ कांपने लगे। उसका पुराना डर लौट आया। वह अपनी जगह से खड़ी हो गई और हकलाने लगी, “भ… भैया… भाभी… वो… गलती से… मेरा हाथ फिसल गया… मैं अभी साफ़ कर देती हूँ… मुझे माफ़ कर दो… प्लीज़ मुझे मारना मत…”

रवि हक्का-बक्का रह गया। “मारना मत?” उसने सोचा। उसकी बहन को किस हद तक तोड़ा गया था?

इससे पहले कि रवि कुछ बोलता, सुधा अपनी कुर्सी से उठी। उसने कांच के टुकड़ों को नहीं देखा। उसने जाकर सीधे कविता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।

“दिखा तो ज़रा… कहीं तुझे चोट तो नहीं लगी?” सुधा की आवाज़ में सिर्फ चिंता थी, कांच टूटने का कोई अफ़सोस नहीं।

कविता ने हैरानी से सुधा को देखा। “भाभी… गिलास टूट गया… वो महँगा वाला सेट था…”

सुधा ने हंसते हुए कहा, “अरे, तो क्या हुआ? कांच का नसीब ही टूटना होता है। पर मेरी ननद के ये हाथ… ये तो अनमोल हैं। देख, यहाँ खरोंच आ गई है।”

सुधा ने रवि को आवाज़ दी, “रवि, जल्दी से फर्स्ट एड बॉक्स लाओ।”

रवि ने दौड़कर दवाई और पट्टी ला दी। सुधा ने कविता को सोफे पर बिठाया और उसके हाथ पर दवा लगाने लगी।

“देख कविता,” सुधा ने पट्टी बांधते हुए कहा, “इस घर में चीजें टूट सकती हैं, पर किसी का दिल नहीं टूटने दिया जाएगा। तू दस गिलास तोड़ दे, हम नया ले आएंगे। पर तू अपने आप को मत तोड़।”

कविता उस दिन समझ गई कि ‘मायका’ सिर्फ वो जगह नहीं जहाँ आप पैदा होते हैं, बल्कि वो जगह है जहाँ आपकी ‘आत्मा’ को फिर से सांस लेने की जगह मिलती है।

उस रात कविता को पहली बार बिना डर के नींद आई। उसके तकिए के नीचे वो चाबी रखी थी—जो सिर्फ अलमारी की नहीं, बल्कि उसके खोए हुए आत्मविश्वास की चाबी थी।

कुछ दिनों बाद, सुधा सच में दो दिन के लिए मायके गई। जब वह वापस लौटी, तो घर पहले से ज्यादा व्यवस्थित था। और सबसे बड़ी बात, कविता ने ड्राइंग रूम का सोफा हटाकर वहां अपनी पुरानी पेंटिंग्स लगा दी थीं।

सुधा ने अंदर आते ही पूछा, “अरे, यह सोफा कहाँ गया?”

कविता रसोई से चाय लेकर निकली और मुस्कुराते हुए बोली, “वो सोफा बहुत जगह घेर रहा था भाभी, और मुझे पेंटिंग करनी थी। मैंने उसे स्टोर रूम में डाल दिया। आपको बुरा तो नहीं लगा?”

सुधा की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उसने दौड़कर कविता को गले लगा लिया।

“बुरा? अरे पगली, मैं तो इसी दिन का इंतज़ार कर रही थी कि तू मुझसे ‘पूछना’ बंद करे और ‘बताना’ शुरू करे। आज तू सच में अपने घर में आ गई है।”

उस दिन सुधा और कविता, ननद-भाभी नहीं, बल्कि दो बहनें लग रही थीं। सुधा ने साबित कर दिया था कि एक औरत ही दूसरी औरत का सबसे बड़ा सहारा बन सकती है। उसने कविता के टूटे पंखों को फिर से जोड़ा और उसे वो आसमान दिया जो उसका अपना था।

**कहानी का सार:**

अक्सर ससुराल के कड़वे अनुभव बेटियों को इतना तोड़ देते हैं कि वे अपने ही मायके में पराई हो जाती हैं। ऐसे समय में, एक समझदार भाभी, जो ‘माँ’ और ‘सखी’ का किरदार निभाए, उस टूटी हुई लड़की को नई ज़िंदगी दे सकती है। सम्मान और विश्वास की एक छोटी सी चाबी, बड़े-बड़े जख्म भर सकती है।

**लेखक का संदेश:**

हर घर में एक ‘कविता’ हो सकती है जो चुपचाप अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रही हो। और हर घर में एक ‘सुधा’ की ज़रूरत है जो बिना कहे उस दर्द को समझे। अगर आपके घर में कोई ननद या बहन मुश्किल दौर से गुज़र रही है, तो उसे ‘मेहमान’ मत बनाइये, उसे ‘घर का सदस्य’ होने का अहसास दिलाइये। उसे बताईये कि उसका हक़ आज भी उतना ही है जितना विदाई से पहले था।

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लेखिका : हर्षिता सिंह

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