स्वाभिमान का मोल और खाकी की चमक – प्रियंका नाथ

*जिसने कभी दौलत के नशे में चूर होकर एक पिता की गरीबी का मजाक उड़ाया था, आज उसी पिता की बेटी ने अपनी कलम की ताकत से उस दौलत के साम्राज्य को हिला कर रख दिया। पढ़िए एक ऐसी बेटी की कहानी जिसने सोने के पिंजरे को ठुकरा कर आसमान चुना।*

विक्रांत हंसा। “अरे, बुरा मत मानो। यह रियलिटी है। तुम मिडिल क्लास हो। तुम्हारे पापा की पूरी जिंदगी की कमाई मेरी एक कार की कीमत के बराबर भी नहीं होगी। इस शादी से तुम्हारी लॉटरी लग रही है। तुम्हें बस इतना करना है कि यह ‘आईएएस-वायस’ का भूत उतार दो। मेरे दोस्तों की पत्नियां किटी पार्टी करती हैं, शॉपिंग करती हैं, ऐश करती हैं। तुम्हें रानी बनाकर रखूंगा। बस मेरी लाइफ में दखल मत देना और मेरे फैसलों पर सवाल मत उठाना।”

पुरानी दीवार घड़ी ने जैसे ही शाम के चार बजाए, पूरे घर में एक अजीब सी अफरातफरी मच गई। घर के हर कोने को ऐसे चमकाया जा रहा था मानो आज कोई त्यौहार हो, लेकिन काव्या के लिए यह किसी मातम से कम नहीं था। वह अपने कमरे की खिड़की से बाहर देख रही थी, जहाँ उसकी यूपीएससी (UPSC) की किताबें मेज पर बिखरी पड़ी थीं। उन किताबों में उसका भविष्य था, उसका सपना था—एक ज़िला अधिकारी (DM) बनने का। लेकिन आज उन किताबों को समेटकर अलमारी के सबसे निचले रैक में छिपा दिया गया था, ठीक वैसे ही जैसे उसके सपनों को समाज के डर से दबाया जा रहा था।

काव्या एक मध्यमवर्गीय परिवार की होनहार बेटी थी। पिता, राघवेंद्र जी, एक सरकारी स्कूल में प्रधानाचार्य थे और माँ, सुमित्रा, एक सीधी-सादी गृहिणी। काव्या की दुनिया उसकी पढ़ाई और समाज सेवा के इर्द-गिर्द घूमती थी। वह न केवल अपनी पढ़ाई में अव्वल थी, बल्कि शहर के एक एनजीओ (NGO) के साथ मिलकर गरीब बच्चों को पढ़ाती भी थी।

लेकिन पिछले कुछ महीनों से घर का माहौल बदल गया था। बुआ जी और मौसी ने राघवेंद्र जी के कान भरने शुरू कर दिए थे—”लड़की 24 की हो गई है, हाथ पीले कर दो। ज्यादा पढ़-लिख गई तो घर नहीं संभाल पाएगी।”

राघवेंद्र जी चाहते थे कि बेटी अपने पैरों पर खड़ी हो, लेकिन समाज का दबाव उन पर भारी पड़ रहा था। और फिर वह प्रस्ताव आया, जिसने राघवेंद्र जी की रातों की नींद उड़ा दी और रिश्तेदारों की बाछें खिला दीं।

लड़का शहर के सबसे रईस और प्रभावशाली ‘सिंघानिया ग्रुप’ का इकलौता वारिस था—विक्रांत। सिंघानिया परिवार का रुतबा ऐसा था कि शहर का हर बड़ा फैसला उनकी मर्जी के बिना नहीं होता था। जब बिचौलिये ने रिश्ता बताया, तो बुआ जी खुशी से झूम उठीं। “राघवेंद्र, तेरी तो लॉटरी लग गई! काव्या राज करेगी, राज!”

काव्या ने विरोध किया था। “पापा, मुझे अभी शादी नहीं करनी। मेरा प्रीलिम्स (Prelims) अगले महीने है। और वो लोग… वो लोग हमसे बहुत बड़े हैं। हमारी दुनिया अलग है।”

राघवेंद्र जी ने बेबसी से बेटी के सिर पर हाथ रखा था। “बेटा, बस देख लो। मना करने का हक तुम्हारे पास रहेगा। लेकिन अगर मैं उन्हें देखने से ही मना कर दूँगा, तो बिरादरी में थू-थू होगी कि राघवेंद्र को घमंड हो गया है।”

पापा की झुकी हुई आँखों ने काव्या को चुप करा दिया था। उसने सोचा, “इतने अमीर लोग हैं, उन्हें मुझ जैसी साधारण, चश्मा लगाने वाली और किताबों में डूबी रहने वाली लड़की पसंद ही क्यों आएगी? वे खुद ही मना कर देंगे।” इसी उम्मीद के सहारे उसने अपनी सबसे अच्छी साड़ी पहनी और बाहर जाने के लिए तैयार हो गई।

शाम को ठीक पांच बजे, तीन काली लग्जरी गाड़ियां राघवेंद्र जी के छोटे से गेट के बाहर आकर रुकीं। गाड़ियों से उतरते हुए लोगों का ठाठ-बाट देखकर मोहल्ले वाले छतों पर चढ़ गए। विक्रांत के साथ उसके पिता, माँ और दो बहनें थीं।

ड्राइंग रूम, जिसे सुमित्रा जी ने अपनी पुरानी साड़ियों को काटकर बनाए गए कुशन कवर से सजाया था, अचानक बहुत छोटा लगने लगा। विक्रांत सोफे पर ऐसे बैठा था जैसे किसी सिंहासन पर बैठा हो। उसने काव्या की तरफ एक बार देखा और फिर अपने मोबाइल में व्यस्त हो गया।

बातचीत शुरू हुई। विक्रांत की माँ, मिसेज सिंघानिया, ने घर का जायजा लेते हुए नाक-भौं सिकोड़ी। उनकी आँखों में एक स्कैनिंग मशीन लगी थी जो हर चीज़ की कीमत आंक रही थी।

“तो काव्या बेटी,” मिसेज सिंघानिया ने कड़क आवाज़ में पूछा, “सुना है तुम बहुत पढ़ाई करती हो? आईएएस बनना चाहती हो?”

काव्या ने धीरे से सिर हिलाया। “जी आंटी।”

“बहुत अच्छी बात है,” मिसेज सिंघानिया ने नकली मुस्कान के साथ कहा। “पढ़ना अच्छी आदत है। पर हमारे घर की बहुएं नौकरी नहीं करतीं। हमारे पास इतना पैसा है कि पुश्तें बैठकर खा सकती हैं। हमें एक ऐसी बहू चाहिए जो हमारे स्टेटस को मेंटेन करे, पार्टियों में हमारे साथ चले और घर को एक ‘होम’ बनाए। उम्मीद है तुम्हें कुकिंग और इंटीरियर डेकोरेशन का शौक होगा?”

काव्या का दिल बैठ गया। उसने पापा की तरफ देखा। राघवेंद्र जी सिर झुकाए चाय का प्याला पकड़े हुए थे, उनके हाथ कांप रहे थे।

तभी विक्रांत के पिता ने कड़कती आवाज़ में कहा, “राघवेंद्र जी, हमें लड़की पसंद है। सीधी-सादी है, हमारे हिसाब से ढल जाएगी। बस, शादी थोड़ी ग्रैंड करनी होगी। हमारा रूतबा है, शहर के वीआईपी आएंगे। आप चिंता मत कीजिये, खर्चे में हम मदद कर देंगे, पर इंतज़ाम फाइव स्टार होटल में होना चाहिए।”

यह एक सीधा अपमान था, जिसे मदद की चाशनी में लपेटकर परोसा गया था। राघवेंद्र जी कुछ बोलते, उससे पहले विक्रांत ने अपना फोन जेब में रखा और बोला, “पापा, मैं काव्या से अकेले में बात करना चाहता हूँ।”

इजाजत मिल गई। काव्या और विक्रांत छत पर चले गए।

छत पर ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन माहौल गर्म था। विक्रांत रेलिंग के पास खड़ा होकर अपनी महंगी घड़ी सेट करने लगा।

“देखो काव्या,” विक्रांत ने बिना किसी भूमिका के कहा, “मैं साफ़ बात करता हूँ। मुझे यह शादी-वादी में कोई खास इंट्रेस्ट नहीं था, लेकिन मॉम को एक ‘घरेलू’ और ‘पढ़ी-लिखी’ ट्रॉफी वाइफ चाहिए थी। तुम सुंदर हो, स्मार्ट लगती हो, तो मैंने हाँ कर दी।”

काव्या ने पहली बार नज़रें उठाईं। “ट्रॉफी वाइफ?”

विक्रांत हंसा। “अरे, बुरा मत मानो। यह रियलिटी है। तुम मिडिल क्लास हो। तुम्हारे पापा की पूरी जिंदगी की कमाई मेरी एक कार की कीमत के बराबर भी नहीं होगी। इस शादी से तुम्हारी लॉटरी लग रही है। तुम्हें बस इतना करना है कि यह ‘आईएएस-वायस’ का भूत उतार दो। मेरे दोस्तों की पत्नियां किटी पार्टी करती हैं, शॉपिंग करती हैं, ऐश करती हैं। तुम्हें रानी बनाकर रखूंगा। बस मेरी लाइफ में दखल मत देना और मेरे फैसलों पर सवाल मत उठाना।”

काव्या को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर तमाचा मार दिया हो। वह अमीर लड़के का अहंकार तो समझती थी, लेकिन यह बदतमीजी उसकी बर्दाश्त से बाहर थी।

“और अगर मैं अपना सपना न छोड़ना चाहूँ तो?” काव्या ने दृढ़ता से पूछा।

विक्रांत का चेहरा सख्त हो गया। वह काव्या के करीब आया, इतना करीब कि काव्या को उसके महंगे परफ्यूम से घबराहट होने लगी। “सपना? देखो डार्लिंग, सपने देखने के लिए नींद चाहिए, और नींद के लिए आरामदायक बिस्तर। वो बिस्तर मैं तुम्हें दे रहा हूँ। कलेक्टर बनकर क्या कर लोगी? जिंदगी भर फाइलों में सड़ोगी और एक सरकारी गाड़ी में घूमोगी। मैं तुम्हें प्राइवेट जेट की लाइफ दे रहा हूँ। सौदा बुरा नहीं है। तुम्हारे पापा का बुढ़ापा भी सुधर जाएगा। उनका यह टूटा-फूटा मकान भी रिनोवेट करवा दूंगा।”

काव्या ने एक गहरी सांस ली। उसकी आंखों में अब डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी शांति थी। वह समझ गई थी कि यह रिश्ता नहीं, सौदा है। और इस सौदे में उसे अपनी आत्मा बेचनी होगी।

वह बिना कुछ बोले नीचे की तरफ चल दी।

“अरे! मैंने बात खत्म नहीं की!” विक्रांत पीछे से चिल्लाया, पर काव्या ने मुड़कर नहीं देखा।

नीचे ड्राइंग रूम में माहौल खुशनुमा था। मिठाइयां बंट रही थीं। बुआ जी राघवेंद्र जी को बधाई दे रही थीं। जैसे ही काव्या नीचे आई, सबकी नज़रें उस पर टिक गईं।

मिसेज सिंघानिया ने मुस्कुराते हुए पूछा, “क्या हुआ बेटा? बातें हो गईं? विक्रांत को तो तुम पसंद हो, तुमने भी हाँ ही कर दी होगी। आखिर ऐसा रिश्ता नसीब वालों को मिलता है।”

काव्या, राघवेंद्र जी के पास जाकर खड़ी हो गई। उसने अपने पिता का हाथ अपने हाथ में लिया। वह हाथ, जिसने उसे बचपन में चलना सिखाया था, आज पसीने से भीगा हुआ था।

“पापा,” काव्या ने साफ और ऊँची आवाज़ में कहा, “मैं यह शादी नहीं कर सकती।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी के हाथ से मिठाई की प्लेट लगभग गिरते-गिरते बची। बुआ जी की आंखें फटी रह गईं।

मिसेज सिंघानिया का चेहरा लाल हो गया। “क्या कहा? दिमाग तो ठीक है तुम्हारा? तुम हमें मना कर रही हो? सिंघानिया परिवार को?”

राघवेंद्र जी ने घबराकर काव्या का हाथ दबाया। “बेटा, यह क्या कह रही हो?”

काव्या ने विक्रांत की आंखों में आंखें डालकर कहा, “हाँ आंटी, मैं मना कर रही हूँ। क्योंकि मुझे ‘पति’ चाहिए, ‘मालिक’ नहीं। और मुझे ‘घर’ चाहिए, ‘सोने का पिंजरा’ नहीं।”

विक्रांत भी नीचे आ चुका था। वह गुस्से में बोला, “पापा, चलो यहाँ से। इस दो कौड़ी की लड़की की इतनी हिम्मत! इसे अपनी औकात का अंदाजा नहीं है।”

“औकात की बात मत कीजिये विक्रांत जी,” काव्या ने उसे बीच में ही काट दिया। उसकी आवाज़ में अब एक भावी कलेक्टर का आत्मविश्वास था। “आपकी औकात आपके बैंक बैलेंस से है, और मेरी मेरे संस्कारों और शिक्षा से। आप पैसे से बिस्तर खरीद सकते हैं, नींद नहीं। आप मकान खरीद सकते हैं, घर नहीं। और रही बात मेरे पिता के टूटे मकान की, तो यह मकान इनकी मेहनत और ईमानदारी की कमाई है, आपकी काली कमाई के महल से लाख गुना बेहतर है।”

मिसेज सिंघानिया चिल्लाईं, “राघवेंद्र जी! अपनी बेटी को ज़बान संभालना सिखाया नहीं क्या? यह बदतमीजी हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। अगर यह रिश्ता टूटा, तो याद रखियेगा, इस शहर में आपकी बेटी की शादी कहीं नहीं होने देंगे हम।”

राघवेंद्र जी, जो अब तक झुके हुए थे, अचानक सीधे खड़े हो गए। उन्होंने काव्या का हाथ कसकर पकड़ा और एक कदम आगे बढ़ाया। उनकी आँखों से डर गायब हो चुका था।

“मिसेज सिंघानिया,” राघवेंद्र जी की आवाज़ में एक अजीब सी गूंज थी। “मेरी बेटी ने कोई बदतमीजी नहीं की। उसने बस सच बोला है। और सच कड़वा होता है।”

सब हैरान होकर राघवेंद्र जी को देखने लगे।

राघवेंद्र जी ने दरवाजे की तरफ इशारा किया। “आप लोग जा सकते हैं। मुझे अपनी बेटी को ‘रानी’ बनाने के लिए किसी राजा की भीख की ज़रूरत नहीं है। वो खुद अपनी मेहनत से सुल्तान बनेगी। और सुनिए… आपने सही कहा, मेरा घर छोटा है। इतना छोटा कि इसमें आप जैसे ‘बड़े’ लोगों का अहंकार समा नहीं सकता। जाइये यहाँ से।”

सिंघानिया परिवार अपमान के घूंट पीकर, पैर पटकते हुए वहां से निकल गया। उनकी गाड़ियों की आवाज़ दूर तक गूंजी।

ड्राइंग रूम में फिर से सन्नाटा था, लेकिन यह सन्नाटा मातम का नहीं, सुकून का था। बुआ जी कुछ कहने ही वाली थीं कि “राघवेंद्र, तूने यह क्या किया…” लेकिन राघवेंद्र जी ने हाथ उठाकर उन्हें चुप करा दिया।

वे मुड़े और काव्या के सामने खड़े हो गए। उनकी आँखों में आंसू थे।

“मुझे माफ़ कर दे बेटा,” राघवेंद्र जी ने रुंधे गले से कहा। “मैं समाज के डर से इतना कायर हो गया था कि तुझे ही दांव पर लगाने चला था। मैं भूल गया था कि तू मेरी बेटी है, कोई बोझ नहीं। आज तूने मुझे पिता होने का मतलब समझा दिया।”

काव्या ने पिता को गले लगा लिया। “पापा, आपने उनका सामना किया, मेरे लिए यही मेरी सबसे बड़ी जीत है। अब देखियेगा, मैं आईएएस बनकर दिखाऊंगी। तब आपको किसी के आगे झुकना नहीं पड़ेगा, सब आपको सलाम करेंगे।”

सुमित्रा जी, जो कोने में खड़ी थीं, दौड़कर आईं और दोनों को गले लगा लिया। आज उस छोटे से घर की दीवारें गर्व से तन गई थीं।

**तीन साल बाद…**

उसी ड्राइंग रूम में टीवी चल रहा था। न्यूज़ चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ आ रही थी।

“शहर के नए जिलाधिकारी (DM) ने सिंघानिया ग्रुप के अवैध निर्माण पर चलाया बुलडोजर। बिना किसी दबाव के की जा रही है कार्रवाई।”

स्क्रीन पर काव्या, पुलिस फोर्स के साथ खड़ी थी। उसके चेहरे पर वही आत्मविश्वास था। उसके बगल में, एक साधारण सी कुर्सी पर राघवेंद्र जी बैठे थे, जिनकी आँखों में खुशी के आंसू थे। मोहल्ले के लोग, जो तीन साल पहले ताने मार रहे थे, आज राघवेंद्र जी के घर मिठाई लेकर बधाई देने आ रहे थे।

काव्या ने साबित कर दिया था कि सम्मान मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है। और असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि रीढ़ की हड्डी के सीधे होने में है।

**हूक लाइन:**

*जिसने कभी दौलत के नशे में चूर होकर एक पिता की गरीबी का मजाक उड़ाया था, आज उसी पिता की बेटी ने अपनी कलम की ताकत से उस दौलत के साम्राज्य को हिला कर रख दिया। पढ़िए एक ऐसी बेटी की कहानी जिसने सोने के पिंजरे को ठुकरा कर आसमान चुना।*

**लेखक का संदेश:**

बेटियाँ बोझ नहीं, वो नींव होती हैं जिस पर परिवार और समाज का भविष्य टिका होता है। अगर हम अपनी बेटियों को उड़ने के लिए पंख देंगे, तो वे हमारे लिए पूरा आसमान जीत लाएंगी। कभी भी परिस्थितियों या पैसों के दबाव में आकर अपने आत्मसम्मान से समझौता न करें।

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 लेखिका : प्रियंका नाथ

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