**सूनी कोख और भरा हुआ आँचल** – महक दुआ

*उसने अपनी कोख इसलिए सूनी रखी ताकि देवर को ‘सतेला’ होने का अहसास न हो। लेकिन बीस साल बाद जब उसी देवर ने भरी महफिल में कहा, “तुम हो कौन? सिर्फ मेरी भाभी ही तो हो,” तो उस त्याग की मूरत के दिल के इतने टुकड़े हुए कि आवाज़ भी नहीं निकली।*

वंदना जब डोली से उतरकर अपनी ससुराल की चौखट पर पहुंची, तो वहां स्वागत के लिए औरतों का झुंड नहीं था, न ही मंगल गीत गाए जा रहे थे। घर के बाहर एक अजीब सी वीरानी छाई थी। ससुर दीनानाथ जी कुर्सी पर बैठे थे, चेहरे पर एक सख्त भाव लिए। और उनके बगल में खड़ा था उसका पति, सुरेश। लेकिन वंदना की निगाहें इन दोनों पर नहीं, बल्कि घर के एक कोने से आ रही बच्चे की रोने की आवाज़ पर टिक गईं।

वह अभी अपनी रस्मों के लिए खड़ी ही थी कि अंदर से एक दाई माँ दौड़ती हुई आई। “मालिक, छोटा बाबू चुप ही नहीं हो रहा। शायद भूख लगी है या पेट में दर्द है।”

दीनानाथ जी ने माथा पकड़ लिया। “अरे, तो मैं क्या करूँ? सुरेश की माँ होती तो संभाल लेती। अब नई बहू आई है, उसे अभी घर के भीतर तो आने दे।”

वंदना ने घूंघट की आड़ से देखा। सुरेश ने लजाते हुए कहा, “वंदना, अंदर चलो।”

गृह प्रवेश की रस्म आनन-फानन में निपटा दी गई। वंदना जब अपने कमरे में पहुंची, तो वहां फूलों की सेज नहीं, बल्कि एक पालने में छह महीने का एक बच्चा हाथ-पैर मार रहा था। यह बच्चा ‘आर्यन’ था—सुरेश का सौतेला भाई।

कहानी कुछ ऐसी थी कि सुरेश की माँ के देहांत के बाद, खानदान के दबाव में दीनानाथ जी ने बुढ़ापे में दूसरी शादी की थी। लेकिन नियति का खेल ऐसा कि दूसरी पत्नी आर्यन को जन्म देते ही चल बसी। दीनानाथ जी टूट गए थे। सुरेश तब 22 साल का था और नौकरी करने लगा था। घर में एक नवजात बच्चे को पालने वाला कोई नहीं था। ऐसे में सुरेश की शादी जल्दबाजी में वंदना से तय कर दी गई, इस उम्मीद में कि घर को एक औरत मिल जाएगी।

वंदना ने अपनी शादी की पहली रात उस बच्चे को गोद में उठाकर बितायी। आर्यन रोता रहा, और वंदना उसे अपनी छाती से लगाकर थपकियां देती रही। उसे नहीं पता था कि मां कैसे बनते हैं, क्योंकि वह खुद अभी बामुश्किल 21 साल की थी। लेकिन उस रात, जब आर्यन ने उसकी उंगली पकड़कर रोना बंद किया और उसे टुकुर-टुकुर देखा, तो वंदना के अंदर का ‘नारीत्व’ जाग उठा। उसने तय कर लिया कि यह बच्चा उसकी जिम्मेदारी नहीं, उसका जीवन है।

शुरुआती दिन आसान नहीं थे। दीनानाथ जी सख्त मिज़ाज के थे। उन्हें लगता था कि वंदना एक सौतेली माँ (या भाभी) की तरह आर्यन को वो प्यार नहीं दे पाएगी। वे अक्सर उस पर निगरानी रखते।

“बहू, दूध ज्यादा गर्म तो नहीं था?”

“बहू, आर्यन को सर्दी लग रही है, तूने स्वेटर नहीं पहनाया?”

वंदना चुपचाप सुनती और अपनी सेवा में कोई कमी न छोड़ती। धीरे-धीरे आर्यन, वंदना को ही अपनी दुनिया मानने लगा। उसे ‘माँ’ कहना तो नहीं आता था, लेकिन उसकी नज़रें वंदना को देखते ही चमक उठती थीं।

समय बीतता गया। आर्यन अब तीन साल का हो चुका था। वह वंदना के पल्लू से बंधा रहता। सुरेश अपनी पत्नी के इस समर्पण से खुश था, लेकिन उसके मन में एक कसक भी थी। उनकी शादी को तीन साल हो चुके थे, लेकिन उनके अपने बच्चे की कोई आहट नहीं थी।

एक रात, सुरेश ने दबे स्वर में वंदना से कहा, “वंदना, आर्यन अब थोड़ा बड़ा हो गया है। क्या हमें अब अपने परिवार के बारे में नहीं सोचना चाहिए? पिताजी भी पोते का मुँह देखना चाहते हैं… मेरा मतलब, हमारे अपने बच्चे का।”

वंदना उस वक्त आर्यन को सुला रही थी। उसने सुरेश के होंठों पर उंगली रख दी। वह उसे दूसरे कमरे में ले गई।

“सुरेश, मुझे आपसे कुछ मांगना है।”

“क्या?” सुरेश ने पूछा।

“वचन दीजिये कि आप कभी जिद नहीं करेंगे,” वंदना की आवाज़ गंभीर थी। “मैं अपनी कोख हरी नहीं करना चाहती।”

सुरेश सन्न रह गया। “पागल हो गई हो क्या? हर औरत का सपना होता है माँ बनना।”

“मैं माँ बन चुकी हूँ सुरेश,” वंदना ने आर्यन के कमरे की तरफ इशारा किया। “जिस दिन मैं इस घर में आई थी, आर्यन मेरी गोद में था। अगर कल को मेरा अपना बच्चा हुआ, तो न चाहते हुए भी मेरा ध्यान बंट जाएगा। दुनिया आर्यन को ‘सतेला’ कहेगी। अगर मेरे सगे बच्चे ने आर्यन के साथ कोई बदतमीजी की, या हक जमाया, तो आर्यन का क्या होगा? उसके पास तो न माँ है, न बाप का प्यार (क्योंकि दीनानाथ जी अब बहुत बूढ़े और चिड़चिड़े हो चुके थे)। मैं नहीं चाहती कि यह बच्चा अनाथ महसूस करे।”

सुरेश ने बहुत समझाया, लेकिन वंदना अडिग थी। उसने कहा, “अगर मैंने अपनी कोख से बच्चा जना, तो मैं ‘भाभी’ बन जाऊंगा। लेकिन अगर मैंने त्याग किया, तो मैं आर्यन की ‘यशोदा मैय्या’ रहूंगी।”

अंततः सुरेश को झुकना पड़ा। वंदना ने अपनी कोख सूनी रखने का फैसला किया, सिर्फ इसलिए ताकि आर्यन की झोली खुशियों से भरी रहे।

साल दर साल बीतते गए। वंदना ने आर्यन को राजकुमारों की तरह पाला। दीनानाथ जी का निधन हो गया। जाते-जाते उन्होंने वंदना के सिर पर हाथ रखकर कहा था, “बहू, मुझे माफ़ करना। मैंने तुझे पराया समझा, पर तूने तो इस घर की लाज रख ली। आर्यन को तेरे भरोसे छोड़कर जा रहा हूँ।”

आर्यन अब बड़ा हो गया था। वंदना ने उसे पढ़ा-लिखाकर इंजीनियर बनाया। आर्यन वंदना को ‘भाभी माँ’ कहता था। उसके लिए वंदना का शब्द कानून था। सुरेश ने अपनी सारी जमा पूंजी आर्यन की पढ़ाई और करियर पर लगा दी।

फिर वह दिन आया जब आर्यन की नौकरी एक मल्टीनेशनल कंपनी में लगी। घर में जश्न का माहौल था। वंदना की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने आर्यन की पसंद की लड़की ‘काव्या’ से उसकी शादी भी करवा दी। काव्या आधुनिक ख्यालात की थी। वंदना ने उसका भी स्वागत उसी प्यार से किया जैसे कभी आर्यन का किया था।

लेकिन कहते हैं न, वक्त और हवा का रुख बदलते देर नहीं लगती। शादी के बाद आर्यन बदलने लगा। काव्या को वंदना का आर्यन पर इतना अधिकार जताना खटकने लगा।

“तुम्हारी भाभी हर बात में दखल देती हैं आर्यन,” काव्या रात में कान भरती। “तुम्हें क्या पहनना है, क्या खाना है, पैसे कहाँ इन्वेस्ट करने हैं… सब भाभी तय करती हैं। तुम बच्चे नहीं हो।”

आर्यन, जो कभी वंदना के बिना पानी भी नहीं पीता था, अब वंदना के सवालों पर चिढ़ने लगा।

“भाभी, प्लीज आप रहने दीजिये, आपको इन मॉडर्न चीजों की समझ नहीं है,” यह वाक्य अब आम हो गया था।

बात तब बिगड़ी जब प्रॉपर्टी के बंटवारे की बात आई। दीनानाथ जी का पुराना मकान अब करोड़ों का हो चुका था। काव्या चाहती थी कि उसे बेचकर वे लोग शहर के पॉश इलाके में शिफ्ट हो जाएं। सुरेश इस बात के सख्त खिलाफ था। यह मकान उसके पिता की निशानी था।

एक शाम खाने की मेज पर बहस छिड़ गई।

“भैया, मुझे मेरा हिस्सा चाहिए,” आर्यन ने सपाट आवाज़ में कहा। “मैं और काव्या अलग रहना चाहते हैं।”

वंदना के हाथ से रोटी की थाली छूट गई। “हि हिस्सा? अलग रहना? आर्यन, यह तू क्या कह रहा है? यह घर, यह परिवार… हम सब एक हैं।”

आर्यन ने झुंझलाकर चम्मच मेज पर पटका। “भाभी, इमोशनल ड्रामा बंद कीजिये। प्रैक्टिकल बात कीजिये। पापाजी के बाद इस घर पर मेरा भी आधा हक है। और वैसे भी, मैं अब अपनी लाइफ अपने हिसाब से जीना चाहता हूँ। आपकी ‘ममता’ का घोंसला अब मुझे चुभने लगा है।”

सुरेश गुस्से में खड़ा हो गया। “जुबान संभाल कर बात कर आर्यन! यह वही भाभी है जिसने तुझे गीले में सोकर सूखे में सुलाया है। इसने तुझे जन्म नहीं दिया, पर सगी माँ से बढ़कर चाहा है।”

काव्या बीच में बोल पड़ी, “हाँ तो? भाभी ने पाला है तो क्या हम ज़िंदगी भर उनके गुलाम बनकर रहें? और वैसे भी भैया, आपने कौन सा बड़ा तीर मारा है? पापाजी की पेंशन और प्रॉपर्टी पर ही तो ऐश की है आप दोनों ने। अब आर्यन कमा रहा है तो आपको जलन हो रही है।”

यह शब्द वंदना के दिल पर खंजर की तरह लगे। लेकिन आर्यन का अगला वाक्य उसे जीते जी मार गया।

आर्यन खड़ा हुआ और वंदना की आँखों में देखकर बोला, “और भाभी, बार-बार यह ‘माँ जैसा प्यार’ जताना बंद कीजिये। आप मेरी भाभी हैं, माँ नहीं। अगर आप मेरी सगी माँ होतीं, तो मुझे समझतीं, मेरी खुशियों में रोड़ा नहीं बनतीं। आपने जो किया वो आपका फर्ज था, क्योंकि इस घर में कोई और था नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि आप मुझे खरीद चुकी हैं।”

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। वंदना पत्थर की मूरत बन गई। जिस बच्चे के लिए उसने अपनी कोख की बलि दी, जिस बच्चे के लिए उसने समाज के ताने सहे कि “बांझ है”, आज वही बच्चा उसे कह रहा था कि “तुम सिर्फ भाभी हो।”

सुरेश का सब्र टूट गया। उसका हाथ हवा में लहराया और एक जोरदार तमाचा आर्यन के गाल पर पड़ा।

“चुप! एकदम चुप!” सुरेश दहाड़ा। उसका शरीर कांप रहा था।

“तू जानना चाहता है न कि तेरी भाभी का तुझ पर क्या हक है? तू जानना चाहता है कि इसने तेरे लिए क्या किया?” सुरेश ने वंदना की तरफ देखा, जो उसे रोकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन आज सुरेश रुकने वाला नहीं था।

वह अंदर कमरे में गया और अलमारी से एक पुरानी फाइल निकालकर लाया। उसने फाइल आर्यन के मुँह पर दे मारी।

“पढ़ इसे! पढ़!”

आर्यन ने घबराते हुए फाइल उठाई। उसमें पुराने मेडिकल रिपोर्ट्स थे। रिपोर्ट्स वंदना की थीं। तारीख 22 साल पुरानी थी।

रिपोर्ट्स में साफ लिखा था कि वंदना पूरी तरह स्वस्थ थी और माँ बनने में सक्षम थी। लेकिन उसके साथ एक एफिडेविट (शपथ पत्र) भी था, जिसमें वंदना और सुरेश के हस्ताक्षर थे—नसबंदी का फॉर्म।

आर्यन के हाथ कांपने लगे। काव्या भी हैरान थी।

“समझ में आया?” सुरेश की आवाज़ अब रुंध चुकी थी। “तेरी भाभी बांझ नहीं थी। हम माँ-बाप बन सकते थे। लेकिन जिस रात तू बहुत बीमार था और डॉक्टर ने कहा था कि तुझे चौबीस घंटे देखभाल की ज़रूरत है, उस रात तेरी भाभी ने फैसला लिया था। उसने कहा था कि अगर उसका अपना बच्चा हुआ, तो आर्यन का हिस्सा बंट जाएगा। उसने अपनी कोख का गला घोंट दिया ताकि तुझे ‘सौतेला’ शब्द कभी सुनना न पड़े। उसने अपनी ममता की हत्या कर दी ताकि तुझे ज़िंदगी मिल सके।”

सुरेश की आँखों से आंसू बह रहे थे। “और तू? तू आज प्रॉपर्टी मांग रहा है? अरे नालायक, जिस औरत ने तेरे लिए अपना वंश खत्म कर दिया, तू उसे कह रहा है कि वो सिर्फ भाभी है? अरे, इसकी जगह कोई सगी माँ होती न, तो वो भी शायद एक बार को अपने दूसरे बच्चे के लिए तुझे इग्नोर कर देती, पर वंदना ने तो तुझे भगवान बना रखा था।”

आर्यन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कागज़ हाथ से छूटकर गिर गए। उसे अपने बचपन के वो दिन याद आने लगे जब बुखार में वंदना रात भर उसके सिरहाने बैठी रहती थी। उसे याद आया कि कैसे स्कूल के फंक्शन में जब सब बच्चों की माँ आती थीं, तो वंदना सबसे आगे खड़ी होकर ताली बजाती थी। उसे याद आया कि कैसे उसने कभी वंदना को उदास नहीं देखा, हमेशा मुस्कुराते हुए देखा।

वह “त्याग” जो वंदना ने खामोशी से किया था, उसका शोर आज आर्यन के कानों के पर्दे फाड़ रहा था।

वंदना अब भी चुप थी। उसकी आँखों से अविरल अश्रु धारा बह रही थी। वह मुड़ी और अपने कमरे की तरफ जाने लगी। उसका ‘कंधा’, जो आज तक पूरे घर का बोझ उठाए था, आज झुक गया था।

“माँ!”

पीछे से एक चीख उभरी।

आर्यन दौड़कर आया और वंदना के पैरों में गिर पड़ा। वह फूट-फूट कर रो रहा था, किसी छोटे बच्चे की तरह।

“मुझे माफ़ कर दो माँ… मुझे माफ़ कर दो। मैं अंधा हो गया था। मैं भूल गया था कि मैं आपकी कोख से नहीं, आपके दिल से पैदा हुआ हूँ। मुझे नहीं चाहिए कोई प्रॉपर्टी। मुझे नहीं चाहिए कोई अलग घर। मुझे बस मेरा वो पुराना आंचल चाहिए।”

काव्या भी सिर झुकाए खड़ी थी। उसे अपने आधुनिक विचारों पर शर्म आ रही थी। उसे समझ आ गया था कि रिश्तों की जो नींव वंदना ने रखी थी, वो किसी भी प्रॉपर्टी से करोड़ों गुना महंगी थी।

वंदना ने कांपते हाथों से आर्यन को उठाया। उसने उसे गले नहीं लगाया, बस उसके सिर पर हाथ रख दिया। एक माँ कभी अपने बच्चे को ठुकरा नहीं सकती, चाहे बच्चा कितना भी बड़ा अपराध कर दे। लेकिन आज वंदना के दिल में एक गांठ पड़ गई थी।

उसने धीमी आवाज़ में कहा, “आर्यन, तूने आज मुझे मेरा स्थान बता दिया। मैं खुश हूँ कि तुझे तेरी गृहस्थी मिल रही है। यह घर तेरा है, तू जैसे चाहे रह। पर आज के बाद मुझसे कभी यह मत कहना कि मैंने ‘त्याग’ किया। क्योंकि प्यार में किया गया काम त्याग नहीं होता, वो ‘मर्जी’ होती है। और मेरी मर्जी थी तुझे पालना। अब मेरी मर्जी है… थोड़ा आराम करना।”

वंदना कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया।

उस रात के बाद घर तो नहीं बंटा, लेकिन वंदना बदल गई। वह अब घर के फैसलों में नहीं बोलती थी। वह अब आर्यन को नहीं टोकती थी। वह बस अपनी पूजा-पाठ में मगन रहती। आर्यन उसे मनाने की लाख कोशिश करता, उसके पैरों में बैठता, लेकिन वंदना सिर्फ मुस्कुरा देती—एक ऐसी मुस्कान जो होंठों तक तो आती थी, पर आँखों तक नहीं पहुँचती थी।

आर्यन को अपना घर मिल गया था, लेकिन उसने अपनी ‘माँ’ को खो दिया था। उसे समझ आ गया था कि शब्द एक बार कमान से निकल जाएं, तो वो वापस नहीं आते, चाहे आप उनके बदले अपनी जान ही क्यों न दे दें।

**निष्कर्ष:**

रिश्तों में ‘अधिकार’ जताना आसान है, लेकिन उस अधिकार के पीछे छिपे ‘त्याग’ को समझना मुश्किल। कभी-कभी हम अपनों को इतना आहत कर देते हैं कि माफ़ी मिलने के बाद भी रिश्ते पहले जैसे नहीं हो पाते। माता-पिता (चाहे सगे हों या पालने वाले) भगवान का रूप होते हैं, उनके त्याग का मोल किसी वसीयत या प्रॉपर्टी से नहीं लगाया जा सकता।

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लेखिका : महक दुआ

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