कांच के महल – विनीता खन्ना 

ससुर ने दामाद की फटी जेब देखकर उसे भरी महफ़िल में ‘बेचारा’ कह दिया, लेकिन उसे नहीं पता था कि वक्त का पहिया जब घूमता है, तो वो राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है। क्या स्वाभिमान की जीत दौलत के अहंकार को हरा पाएगी?


रवि ने अपनी पुरानी स्कूटर को तीसरी बार किक मारी, तब जाकर इंजन ने घरघराहट के साथ जागने का संकेत दिया। पीछे बैठी सुमन ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और पति के कंधे पर हाथ रखते हुए धीमे स्वर में कहा, “रवि, अगर मन नहीं है तो रहने देते हैं। पापा जी बुरा मानेंगे तो मान जाएं, पर तुम्हारा मूड खराब हो, यह मुझे अच्छा नहीं लगता।”

रवि ने हेलमेट का शीशा नीचे करते हुए एक फीकी मुस्कान दी। “नहीं सुमन, जाना तो पड़ेगा। तुम्हारे चचेरे भाई की सगाई है। अगर नहीं गए, तो तुम्हारे पापा को फिर एक मौका मिल जाएगा यह कहने का कि दामाद जी अपनी ‘गरीबी’ छुपाने के लिए महफ़िल में नहीं आए।”

सुमन चुप रही। वह जानती थी कि रवि के दिल पर क्या गुजरती है। रवि एक स्ट्रगलिंग आर्किटेक्ट था। उसके पास टैलेंट की कमी नहीं थी, लेकिन आज के दौर में जहां सिफारिश और पैसों से काम बनते हैं, वहां रवि के उसूल अक्सर उसके आड़े आ जाते थे। वह पिछले तीन सालों से अपनी एक छोटी सी फर्म चलाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन कोई बड़ा प्रोजेक्ट हाथ नहीं लग पा रहा था। घर का खर्च बमुश्किल ट्यूशन और छोटे-मोटे नक्शे पास करवाकर चलता था।

दूसरी तरफ, सुमन के पिता, मिस्टर खन्ना, शहर के जाने-माने रईस थे। उन्होंने सुमन की शादी रवि से बहुत बेमन से की थी। सुमन ने ज़िद करके रवि को चुना था, वरना मिस्टर खन्ना तो अपनी बेटी के लिए कोई एनआरआई या बड़ा बिजनेसमैन ढूंढ रहे थे। शादी के बाद से ही, जब भी कोई पारिवारिक समारोह होता, मिस्टर खन्ना रवि को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे।

स्कूटर ‘खन्ना मेंशन’ के आलीशान गेट के सामने रुका। वहां खड़ी लंबी-लंबी लग्जरी गाड़ियों की कतार के बीच रवि का पुराना स्कूटर किसी भद्दे दाग जैसा लग रहा था। वॉचमैन ने भी उन्हें अजीब नज़रों से देखा, लेकिन सुमन को पहचानकर गेट खोल दिया।

अंदर पार्टी पूरे शबाब पर थी। झूमर की रोशनी आँखों को चोंधिया रही थी। वेटर विदेशी शराब और महंगे स्नैक्स परोस रहे थे। रवि एक कोने में खड़ा होकर बस वक्त गुज़रने का इंतज़ार कर रहा था, तभी मिस्टर खन्ना अपने कुछ रईस दोस्तों के साथ वहां आ धमके।

“अरे रवि बेटा! तुम यहाँ कोने में क्यों खड़े हो? आओ, तुम्हें अपने दोस्तों से मिलवाऊं,” मिस्टर खन्ना की आवाज़ में एक बनावटी मिठास थी जो किसी कड़वे घूंट से कम नहीं थी।

रवि न चाहते हुए भी आगे बढ़ा।

“मिलिए, ये हैं मेरे छोटे दामाद, रवि,” मिस्टर खन्ना ने अपने दोस्तों से परिचय करवाया। “बहुत मेहनती लड़का है। आर्किटेक्ट है। वो बात अलग है कि आजकल मंदी का दौर है, तो बेचारे का काम कुछ खास चल नहीं रहा। क्यों रवि? अगर पैसों की तंगी ज्यादा हो तो बता देना, हम तो अपनों की मदद के लिए ही बैठे हैं।”

रवि का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया। भरी महफ़िल में उसे ‘बेचारा’ कहना और पैसों की मदद का ढोंग करना, यह मिस्टर खन्ना का पुराना तरीका था।

उनके एक दोस्त ने हंसते हुए कहा, “अरे खन्ना जी, आजकल के बच्चे स्वाभिमानी होते हैं। पर रवि बेटा, स्वाभिमान से पेट नहीं भरता। अगर ससुर जी की कंपनी में ही कोई सुपरवाइजर की नौकरी कर लो, तो कम से कम एक फिक्स सैलरी तो आएगी। स्कूटर से कार पर तो आ जाओगे।”

वहां खड़े सभी लोग ठहाका मारकर हंस पड़े। सुमन, जो कुछ दूरी पर अपनी माँ के साथ खड़ी थी, यह सब सुन रही थी। उसकी आँखों में आंसू आ गए। वह दौड़कर रवि के पास आई और अपने पिता की आँखों में देखते हुए बोली, “पापा, रवि को नौकरी की ज़रूरत नहीं है। वो अपना काम कर रहे हैं और हम उसी में खुश हैं। और रही बात कार की, तो हमें स्कूटर की हवा ज्यादा पसंद है, क्योंकि वो हमारी अपनी कमाई की है।”

मिस्टर खन्ना का चेहरा उतर गया। उन्होंने दांत पीसते हुए कहा, “बड़ों के बीच में बोलना तुझे कब से आ गया सुमन? मैं तो इसकी भलाई के लिए कह रहा था।”

“चलिए रवि,” सुमन ने रवि का हाथ पकड़ा और उसे पार्टी से बाहर ले आई।

रास्ते भर दोनों चुप रहे। घर पहुँचकर रवि सोफे पर धम्म से बैठ गया। उसने अपना सिर हाथों में थाम लिया।

“सुमन, मुझे लगता है तुम्हारे पापा सही कहते हैं। मैं शायद इसी लायक हूँ। तीन साल हो गए, एक ढंग का प्रोजेक्ट नहीं मिला। मैं तुम्हें वो खुशियाँ नहीं दे पा रहा जिसकी तुम हकदार हो। शायद मुझे आर्किटेक्चर छोड़कर कोई नौकरी कर लेनी चाहिए।”

सुमन रवि के पास फर्श पर बैठ गई और उसके घुटनों पर अपना सिर रख दिया। “रवि, क्या तुम हार मान रहे हो? वो रवि कहाँ गया जो कहता था कि मैं कंक्रीट के जंगल में नहीं, बल्कि लोगों के लिए सांस लेने वाले घर बनाऊंगा? पापा की बातों को दिल पर मत लो। वो पैसे को ही कामयाबी मानते हैं। पर मेरे लिए कामयाबी वो है जब तुम अपनी टेबल पर बैठकर रात-रात भर डिज़ाइन बनाते हो और तुम्हारी आँखों में एक चमक होती है।”

“पर चमक से घर का किराया नहीं जाता सुमन,” रवि की आवाज़ भारी थी।

“जाएगा रवि, सब जाएगा। मुझे तुम पर भरोसा है। वक्त बदलने में देर नहीं लगती। तुम बस अपनी कोशिश मत छोड़ना। अगर आज तुम टूट गए, तो उनकी वो बातें सच हो जाएंगी जो वो तुम्हारे बारे में सोचते हैं।”

सुमन के इन शब्दों ने रवि के अंदर बुझती हुई आग को फिर से सुलगा दिया। उसने तय किया कि वह अब जवाब अपनी जुबान से नहीं, अपने काम से देगा।

अगले दिन अखबार में एक खबर छपी। राज्य सरकार ने एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट निकाला था—’ग्रीन रिवरफ्रंट डेवलपमेंट’। यह शहर का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट था। बड़े-बड़े बिल्डर्स और आर्किटेक्ट्स की नज़र इस पर थी। रवि जानता था कि यह प्रोजेक्ट हासिल करना लगभग नामुमकिन है, क्योंकि इसमें बड़े खिलाड़ियों की लॉबिंग चलती थी। लेकिन इस बार प्रोजेक्ट की एक शर्त अलग थी—डिज़ाइन पूरी तरह से इको-फ्रेंडली (पर्यावरण के अनुकूल) और कम लागत वाला होना चाहिए। और चयन एक ‘ब्लाइंड जूरी’ द्वारा किया जाना था, यानी जूरी को पता नहीं होगा कि डिज़ाइन किस कंपनी का है।

रवि के लिए यह ‘करो या मरो’ वाली स्थिति थी। उसने अपने छोटे से कमरे को ही अपना वॉर-रूम बना लिया। वह दिन-रात काम करने लगा। वह नदियों के किनारे जाकर घंटों बैठा रहता, मिट्टी की जांच करता, हवा का रुख देखता। उसने फैसला किया कि वह ऐसा डिज़ाइन बनाएगा जो प्रकृति के साथ खिलवाड़ न करे, बल्कि उसका हिस्सा लगे।

इस दौरान घर की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई। मकान मालिक किराए के लिए तकादा करने लगा। राशन के डब्बे खाली होने लगे।

एक शाम रवि अपनी मेज पर सिर झुकाए बैठा था। उसे प्रिंटआउट्स निकालने और मॉडल बनाने के लिए कुछ पैसों की सख्त ज़रूरत थी, लेकिन जेब खाली थी। तभी सुमन कमरे में आई। उसने रवि के हाथ में एक मखमली डिब्बी रख दी।

“ये क्या है?” रवि ने पूछा।

सुमन ने डिब्बी खोली। उसमें सोने की दो बालियां थीं। यह सुमन की नानी की निशानी थी, जिसे वह जान से ज्यादा प्यार करती थी।

“इन्हें बेच दो रवि,” सुमन ने शांत भाव से कहा।

“पागल हो गई हो?” रवि झटके से खड़ा हो गया। “मैं भूखा रह लूँगा, पर तुम्हारी नानी की आखिरी निशानी नहीं बेचूंगा। इतना भी नहीं गिरा हूँ मैं।”

“यह गिरना नहीं है रवि, यह निवेश है,” सुमन ने उसकी आँखों में देखा। “नानी कहती थीं कि सोना बुरे वक्त के लिए होता है। और यह बुरा वक्त नहीं, यह हमारे सुनहरे भविष्य की सीढ़ी है। अगर आज ये बालियां तुम्हारे सपने को पूरा करने में काम आ गईं, तो नानी ऊपर से बहुत खुश होंगी। प्लीज, ज़िद मत करो।”

रवि की आँखों से आंसू बह निकले। उसने सुमन को गले लगा लिया। उस दिन रवि ने कसम खाई कि वह सुमन के इस त्याग को व्यर्थ नहीं जाने देगा।

रवि ने अपना डिज़ाइन सबमिट कर दिया। अब इंतज़ार का दौर शुरू हुआ।

दो महीने बीत गए। मिस्टर खन्ना का फोन आया।

“हाँ सुमन, कैसी हो? सुना है तुम्हारे पतिदेव ने रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट के लिए अप्लाई किया है? पागल है क्या वो? वहां मेरी कंपनी जैसी बड़ी मछलियां बैठी हैं। उसे कहो, क्यों अपना समय और पैसा बर्बाद कर रहा है? अभी भी वक्त है, मेरे पास आ जाए, चपरासी की नहीं तो क्लर्क की नौकरी तो दिलवा ही दूंगा।”

सुमन ने इस बार फोन पर ही करारा जवाब दिया, “पापा, इंतज़ार कीजिये। परिणाम आने वाला है। फिर देखते हैं कौन क्या बनता है।” और उसने फोन काट दिया।

परिणाम वाले दिन, रवि और सुमन लैपटॉप के सामने बैठे थे। उनकी धड़कनें रुकी हुई थीं। स्क्रीन पर लाइव प्रसारण चल रहा था। मंत्री जी ने लिफाफा खोला।

“इस साल के सबसे महत्वाकांक्षी ‘ग्रीन रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट’ के विजेता हैं…” मंत्री जी ने एक पल का विराम लिया। रवि ने सुमन का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“…इनोवेटिव आर्किटेक्ट्स, मिस्टर रवि वर्मा!”

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, और फिर रवि और सुमन एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगे। यह खुशी के आंसू थे, संघर्ष के अंत के आंसू थे। रवि का डिज़ाइन न केवल चुना गया था, बल्कि जूरी ने उसे ‘भविष्य का मॉडल’ बताया था।

अगले ही दिन, रवि की तस्वीर हर अखबार के पहले पन्ने पर थी। जिस प्रोजेक्ट के लिए बड़े-बड़े अरबपति लाइन में थे, उसे एक स्कूटर चलाने वाले साधारण आर्किटेक्ट ने अपनी काबिलियत के दम पर जीत लिया था। रवि को सरकार की तरफ से 50 लाख का एडवांस चेक और प्रोजेक्ट का कॉन्ट्रैक्ट मिला।

कुछ दिनों बाद, रवि और सुमन ने अपने नए ऑफिस का उद्घाटन रखा। शहर के तमाम बड़े लोग वहां मौजूद थे। मिस्टर खन्ना भी आए थे। लेकिन आज उनका सिर झुका हुआ था। जिस दामाद को वो ‘बेचारा’ कहते थे, आज शहर के कलेक्टर और मंत्री उस दामाद से हाथ मिलाने के लिए कतार में खड़े थे।

रवि ने मंच पर माइक संभाला। उसने अपनी सफलता का श्रेय अपनी टीम को दिया। फिर उसकी नज़र कोने में खड़े मिस्टर खन्ना पर पड़ी।

रवि मंच से नीचे उतरा और सीधा अपने ससुर के पास गया। वहां सन्नाटा छा गया। सबको लगा कि रवि आज अपने अपमान का बदला लेगा। रवि ने अपनी जेब से एक छोटी सी डिब्बी निकाली—वही डिब्बी जिसमें अब सुमन की नानी की बालियों जैसी ही, पर उससे कहीं ज्यादा कीमती और सुंदर नई बालियां थीं। (रवि ने पहली कमाई से सबसे पहले वही बालियां वापस बनवाई थीं।)

रवि ने मिस्टर खन्ना के पैर छुए। मिस्टर खन्ना हक्के-बक्के रह गए।

“पापा जी,” रवि ने माइक पर ही कहा, “मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ।”

सब हैरान थे। शुक्रिया?

“हाँ,” रवि ने मुस्कुराते हुए कहा। “अगर आपने मुझे उस दिन मेरी ‘औकात’ याद न दिलाई होती, अगर आपने मुझे यह एहसास न दिलाया होता कि मेरे पास कुछ नहीं है, तो शायद मेरे अंदर वो आग नहीं लगती। आपकी कड़वी बातों ने मुझे वो ईंधन दिया जिसकी मुझे ज़रूरत थी। आप मेरी गरीबी का मज़ाक उड़ाते रहे, और मैं अपनी अमीरी (मेहनत) को तराशता रहा।”

फिर रवि ने सुमन को मंच पर बुलाया और वो डिब्बी उसे पहनाते हुए कहा, “और असली अमीर मैं इसलिए हूँ क्योंकि मेरे पास सुमन है। जब दुनिया मेरी जेब देख रही थी, यह मेरा हुनर देख रही थी। जब सबने हाथ छोड़ दिया, इसने अपना हाथ (बालियां) मेरे लिए खाली कर दिया।”

हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मिस्टर खन्ना की आँखों में आंसू थे—इस बार अपमान के नहीं, बल्कि पश्चाताप के। उन्होंने आगे बढ़कर रवि को गले लगा लिया।

“मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं पैसे की चमक में हीरे को पहचान नहीं पाया। तूने साबित कर दिया कि इंसान की कीमत उसके बैंक बैलेंस से नहीं, उसकी रीढ़ की हड्डी (स्वाभिमान) से होती है।”

रवि और सुमन ने एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्कुरा दिए। उनकी दुनिया अब बदल चुकी थी। कांच के महल (अहंकार) टूट चुके थे, और ईंटों का मकान (सच्चाई) अब एक मजबूत किले में बदल चुका था।

रवि को समझ आ गया था कि जिंदगी में कोई शॉर्टकट नहीं होता। और सुमन को यह तसल्ली थी कि उसने सही इंसान पर दांव लगाया था। उस रात, जब वे अपने घर लौटे, तो स्कूटर की आवाज़ में भी एक अजीब सा संगीत था—जीत का संगीत।


कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:

क्या आपको लगता है कि सुमन की जगह अगर कोई और होती तो वो रवि का साथ छोड़ देती? क्या आज के ज़माने में रवि जैसा धैर्य और सुमन जैसा त्याग देखने को मिलता है? क्या रवि का ससुर को माफ़ करना सही था? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

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मूल लेखिका : विनीता खन्ना 

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