भोपाल के एरेरा कॉलोनी इलाके मैं सरल और सीधे स्वभाव के गुप्ता जी अपनी पत्नी आशा और बेटे राहुल के साथ रहते थे. न्यू मार्केट मैं उनका जाना माना होटल था जिसे उनके दादा जी ने खड़ा किया था. दादा जी और पिता जी के गुज़र जाने के बाद अब वहीं होटल के मालिक थे.
आशा जी की काम वाली बाई बेबी एक विधवा औरत थीं जो अपने बेटे चिंटू के साथ रहती थीं. बेबी का पति शराब की लत की वजह से किडनी फेल होने से साल भर पहले ही मरा था. उस समय गुप्ता जी ने उसकी पैसो से काफ़ी मदद की थीं इसलिये बेबी और चिंटू उनका बहुत आदर करते थे.
चिंटू और राहुल हम उम्र थे. चिंटू शाम क़ो गुप्ताजी के घर आ जाता था और घर के छोटे मोटे काम कर दिया करता था. बेबी का घर पास की झोपड पट्टी मैं था, जहाँ सारे मजदूर और कुली लोग ही रहते थे. चिंटू जब 12-13 साल का रहा होगा, की एक दिन बहुत ज्यादा बरसात हुई की शहर के सारे तालाब ओवर फ्लो होने लगे और सब जगह पानी ही पानी हो गया.
अधिक बरसात के कारण उस रात बेबी का मकान गिर गया और माँ बेटा दोनों गंभीर घायल हो गये. गुप्ता जी ने उनका बहुत इलाज करवाया पर बेबी को बचा नहीं पाये. चिंटू लगभग महीने भर इलाज के बाद अपने पैरों पर चलने लगा. चिंटू का इस दुनिया में अपना कहने के नाम पर कोई नहीं था और रहने का घर भी नहीं बचा था.
गुप्ता जी ने चिंटू को अपने होटल में रहने खाने की जगह देदी और घर के सारे अंदर बाहर के काम उसके जिम्मे थे. चिंटू घर का सदस्य बन गया था. राहुल स्कूटी पर उसे भी साथ लेकर जाता और वो राहुल को भईया बोलता. एक दिन राहुल, माँ से जिद करके पापा की कार से घूमने चला गया,
जाते हुए चिंटू क़ो भी साथ ले लिया. न्यू मार्केट के पास कार क़ो टर्न करते हुए स्कूटी से ठोक दिया. मैंन मार्किट होने से भीड़ और पुलिस आ गई जिसे देख कर राहुल घबरा गया. चिंटू ने राहुल क़ो वहाँ से हटा दिया और बोला तुम जाओ और पापा क़ो बता दो कि चिंटू ने गाड़ी ठोक दीं है.
पुलिस ने घायल स्कूटी वाले क़ो हॉस्पिटल भेज दिया और चिंटू क़ो थाने ले गये. गुप्ताजी खबर मिलते ही थाने पहुंचे, वकील क़ो बुलाया, घायल का इलाज करवाया, तब तक रात हो गई. रात होने कि वजह से चिंटू कि जमानत नहीं हो सकी और अगले दिन इतवार था.
चिंटू दो दिन हवालत मैं बन्द रहा और सोमवार दोपहर बाद रिहा हुआ. घर आकर गुप्ताजी चिंटू पर बहुत नाराज़ हुए और गुस्से मैं बहुत बुरा भला कहा और घर पर आने के लिए मना कर दिया, क्योंकि उन्हें हकीकत मालूम नहीं थीं. ये सब देख सुन कर गुप्ताजी कि पत्नी से रहा नहीं गया और उसने सारी सच्चाई बताई.
सच का पता लगते ही गुप्ताजी ने चिंटू क़ो पास बुलाया और पूछा कि राहुल कि गलती तुमने अपने ऊपर क्यों ली? चिंटू बोला, भईया रात भर थाने मैं रहता तो आपकी बदनामी होती, मेरा तो कोई अपना है नहीं, इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता. गुप्ताजी फिर गुस्से से बोले, खबरदार जो फिर कभी ये बात बोली, हम सब तेरे अपने है.
जब से तू पैदा हूँआ है, तब से तू इस घर से जुडा हुआ है, हमारे लिए जैसा राहुल वैसा तू. ये कहते हुए गुप्ताजी ने चिंटू और राहुल क़ो गले लगा लिया. उस दिन गुप्ताजी क़ो समझ आ गया कि “रिश्ते अधिकार से नहीं, करुणा से निभते है.”
वाक्य कहानी प्रतियोगिता
(रिश्ते अधिकार से नहीं, करुणा से निभते है)
लेखक
एम. पी. सिंह
(Mohindra Singh )
स्वरचित, अप्रकाशित