संध्या जी को अपनी बेटी और बहू को करवा चौथ मे देने के लिए साड़िया लेनी थी इसलिये उन्होंने मानव जी से बाजार चलने को कहा। मानव जी इस शर्त पर उन्हें बाजार ले गए कि तुम दुकान मे अंदर जाने को नहीं बोलोगी। संध्या जी को अच्छे से पता था कि मानव जी थोड़े संकोची स्वभाव के है।
साड़ी के दुकान मे ज्यादातर ग्राहक औरते होती है और वे अपने चारो तरफ औरतो को देखकर असहज हो जाते है इसलिए वे वहाँ जाने से बचते है। संध्या जी नें कहा मुझे पता है कि आप अंदर नहीं जाओगे। हमारे विवाह को तीस वर्ष हो गए है। क्या अब भी आपको नहीं पहचानुँगी? फिर हँसते हुए कहा पता नहीं औरतो को देखकर आपके पसीने क्यों छुटते है।
मानव जी उन्हें लेकर बाजार गए और संध्या जी को कपड़े के दुकान मे भेज दिया और खुद बाहर जूस की दुकान पर जूस पीने लगे। पर पत्नी द्वारा कही बातें आज उनके मन को चोट पहुंचा गई और लगा जैसे किसी नें उनके दुखती रग पर हाथ धर दिया हो।
उन्हें आज अपनी जवानी के वे दिन याद आने लगे जो उनके जीवन के सबसे हसीन दिन थे पर उन्होंने अपने संकोची स्वभाव के कारण अपने पहले प्यार को खो दिया था।कभी कभी झिझक के कारण या अपनी ना समझी मे हम जिसे प्यार करते है उसे गवाँ देते है पर उनके साथ गुजारें हुए पल जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक हम उसे भुला नहीं पाते
और वे पल हमारे जीवन की पूंजी बन जाते है। वैसा ही कुछ पल मानव जी के जीवन की अमूल्य निधि थे,जिसे उनके आलावा कोई और नहीं जानता था। उन्होंने इस राज़ को इतना राज़ रखा था कि जिसे वे बेइंतहा प्यार करते थे वह भी इस बात को नहीं जानती थी कि कोई उसे इतना प्यार करता है
और उसने उसके साथ गुजारें पल को आज भी अपनी यादो मे संजोकर रखा है। वह जान भी कैसे सकती थी क्योंकि उनका प्यार एकतरफा था और उसे कभी व्यक्त भी नहीं किया गया था। प्रीति, हाँ प्रीति ही तो नाम है मानव जी के प्यार का। जैसा नाम वैसा रूप,प्यारा,
मनमोहक उसके निश्छल रूप और हँसी पर जैसे सभी मुग्ध हो जाय। लगता जैसे प्रीति अपने नाम के अनुरूप ही सब जगह प्रीत बिखेरते चलती थी। अभी कुछ दिन ही तो हुए थे उसे अपनी मौसी के घर आए हुए पर इतने दिनों मे ही उसने पुरे परिवार के दिलो मे अपना घर बना लिया था।
प्रीति जितनी ही बिंदास और हँसमुख थी मानव जी उतने ही शर्मिंले और संकोची। लड़कियों से तो बात करना जैसे उनको आता ही नहीं था।
वे अपने हमउम्र अन्य लड़को की तरह नहीं थे।उन्हें लड़कियों को देखना या अपने दोस्तों के बीच उनकी बातें करना बिलकुल पसंद नहीं था। नब्बे का जमाना था। उस समय लडके और लड़कियों मे दोस्ती होना कॉमन बात नहीं थी, खास कर छोटे शहरों मे तो बिल्कुल ही सम्भव नहीं था।
मानव का घर एक छोटे से शहर मे था जहाँ शहरी मूलभूत सुविधाएं तो थी पर आधुनिकता अभी इतनी नहीं थी कि लड़के लड़कियां अकेले घूमने जाए या आपस मे मित्रता या प्यार होने की समाज मे घोषणा कर सके । प्रीति का घर गाँव मे था। वह अपने गाँव के इंटर कॉलेज से बारहवीं पढ़कर ग्रेजुएसन करने के लिए अपने मौसी के घर शहर मे रहने आई थी। एक दिन अपनी माँ को खरीदारी करवाने के लिए मानव बाजार गए थे।
माँ को दुकान के अंदर भेजकर वे बाहर कोल्ड्रिंग्स पीने लगे।तभी वहाँ उन्हें प्रीति के हँसने की आवाज सुनाई दी जो अपनी मौसी के साथ खरीदारी करने आई थी।जब मुड़कर देखा तो बस उसे देखते ही रहे,लगा जैसे किसी नें उन्हें सम्मोहित कर दिया हो।
प्रीति तो हँसते हुए आगे बढ़ गई पर मानव जी जैसे वही जड़ हो गए। माँ की खरीदारी समाप्त होने पर माँ को लेकर घर आ गए पर मन तो उनका बाजार मे ही छुट गया। एक दो दिन ऐसे गुजरे जैसे वर्षो गुजर गए हो। उनका मन दिन रात सिर्फ यही सोचता कि काश मे फिर उसे देख पाता।
उनके मन की मुराद पूरी हुई और उन्हें फिर से प्रीति को देखने का मौका मिला और वह भी अपने घर पर। एक दिन दोपहर मे जब वे अपने कॉलेज से घर आए तो उन्होंने अपनी बहन और उसकी कुछ सहेलियों के साथ प्रीति को अपने घर पर देखा। उन सभी के चले जाने के बाद उन्होंने अपनी बहन से पूछा,
आज तेरी सहेलियों मे एक नई लड़की दिखी, हमारे मुहल्ले की तो नहीं लग रही थी। तुम्हारे स्कूल की सहेली है क्या? बहन नें कहा इतनी पूछताछ क्या कर रहे हो? हमारे ही मुहल्ले की लड़की है। करुणा की मौसी की बेटी है। गाँव से यहाँ पढ़नें आई है।
प्रीति दीदी बहुत ही अच्छी है।और भी बहुत कुछ प्रीति के बारे मे बताती रही पर मानव तो अपनी ही दुनिया मे खो गया और सोचने लगा प्रीति नाम है उसका कितनी प्यारी है वह। चलो अपने ही मुहल्ले मे रहेगी तो कभी ना कभी मिलने का मौका तो मिल ही जाया करेगा। सबसे बड़ी ख़ुशी की बात तो यह थी कि करुणा के घर का छत उसके घर के छत से दिखाई देता था।
उसने सोचा कि प्रीति कभी ना कभी तो छत पर आएगी और वह जब भी आएगी तब वह उसे देख लिया करेगा। यह सोचकर मानव नें अपना ज्यादातर समय छत पर गुजारना शुरू कर दिया। प्रीति बड़ी उम्र की थी और बाहर की भी थी इसलिए उसकी मौसी उसे कहीं बाहर नहीं जाने देती थी।
इसलिए ज्यादातर प्रीति और उसके मुहल्ले की कुछ लड़कियां शाम को करुणा के छत पर इक्क्ठा होती और आपस मे बातें करती थी। बस उसने भी अपनी शाम छत पर ही गुजारनी शुरू कर दी। मानव अपने छत पर बैठा प्रीति को ही निहारते रहता और उसके और अपने मिलन के सपने बुनता रहता।
अपने संकोची स्वभाव और समाजिक वर्जनाओ के चलते उसने कभी भी प्रीति के सामने अपने प्यार का इजहार नहीं किया। हर बार सोचता लिखकर दे देता हूँ पर डरता कहीं प्रीति नें गुस्सा किया और पत्र घरवालों को दिखा दिया तो उसकी बड़ी भद्द पिटेगी। कभी सोचता जब कभी घर आएगी तो सीधे ही अपने मन की बात कह देगा।
पर प्रीति के बिंदास स्वभाव से डरता और सोचता कि कहीं प्रीति शर्माने की जगह शोर मचा देगी तो क्या होगा। वह तो नादान है उसे तो समझ नहीं आएगा कि मेरे साथ उसकी भी बदनामी होंगी। ना मै उसे बदनाम नहीं कर सकता। समय तो अपनी गति से चलता है जो चलता ही रहा।
देखते देखते छह माह गुजर गया। एक दिन जब शाम के वक़्त मानव छत पर गया तो उसे प्रीति नहीं दिखाई दी। वह रोज़ शाम को छत पर जाता पर प्रीति अपने छत पर नहीं आती थी। इसतरह से प्रीति का इंतजार करते करते दिन सप्ताह मे और सप्ताह महीने मे बदल गए पर मानव को प्रीति नहीं दिखाई दी।
मानव बुझा बुझा सा रहने लगा। उसे समझ मे नहीं आ रहा था कि प्रीति अचानक पढ़ाई बीच मे छोड़ कर अपने घर क्यों चली गई? करीब तीन माह बाद एक दिन उसकी बहन नें स्कूल से आते ही माँ से कहा माँ प्रीति दीदी आई है।मै उनसे मिलने के लिए आज शाम को करुणा के घर जाउंगी।
मानव नें जैसे ही यह सुना, लगा जैसे उसे कोई अमूल्य निधि मिल गई। वह ख़ुशी ख़ुशी शाम होने का इंतजार करने लगा।आज मानव को ऐसा एहसास हो रहा था जैसे वक़्त धीमी गति से चल रहा है। तीन घंटे तीन वर्ष के समान गुजरे। पांच बजते ही मानव दौड़ कर छत पर गया।
थोड़े इंतजार के बाद सभी लड़कियां छत पर आई। सभी प्रीति को घेर कर उससे बात कर रही थी। मानव को प्रीति का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
वह प्रीति को देखने के लिए बेचैन हो रहा था पर जब प्रीति उसकी तरफ मुड़ी और उसने प्रीति को देखा तब लगा मानव का वक़्त वही थम गया। प्रीति की माँग सिंदूर से भरा हुआ था। पति के प्यार से दग्द उसका चेहरा और भी आकर्षक लग रहा था। पर मानव का सब कुछ लूट चूका था। मानव मन ही मन सोच रहा था काश मै थोड़ा हिम्मत करता तो शायद आज प्रीति के माँग मे मेरे नाम का सिंदूर होता।
विषय – पहला प्यार
लतिका पल्लवी