झूठी शान के परिंदे – मुकेश पटेल 

 “माँ-बाप अक्सर अपने बच्चों की ‘चमक’ देखकर इतना खुश हो जाते हैं कि यह देखना भूल जाते हैं कि वो चमक सोने की है या पीतल की; और जब तक सच सामने आता है, तब तक घर की नींव बिक चुकी होती है।”

“अरे भाई साहब, आप तो किस्मत वाले हैं। बड़ा बेटा बंगलौर में कंपनी का मालिक है और छोटा बेटा सरकारी दफ्तर में बाबू। दोनों हाथ में लड्डू हैं आपके तो!”

पड़ोस के शर्मा जी ने जब रघुवीर जी के कंधे पर हाथ रखकर यह बात कही, तो रघुवीर जी का सीना गर्व से 56 इंच का हो गया। उन्होंने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, “बस शर्मा जी, सब भगवान की कृपा है और हमारे विक्रांत की मेहनत। लड़के ने दिन-रात एक कर दिया तब जाकर आज उसका ‘स्टार्टअप’ खड़ा हुआ है। लाखों का टर्नओवर है, लाखों का!”

पास ही खड़ीं सुमित्रा देवी भी अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं। उनकी आँखों में बड़े बेटे विक्रांत के लिए जो चमक थी, उसके आगे छोटे बेटे सुमित की साधारण सी सरकारी नौकरी की खुशी फीकी पड़ गई थी।

रघुवीर जी एक रिटायर्ड प्रिंसिपल थे। जीवन भर अनुशासन और ईमानदारी की कमाई खाई थी। उनके दो बेटे थे—विक्रांत और सुमित। विक्रांत शुरू से ही बातों का धनी था। बड़ी-बड़ी बातें करना, ऊंचे सपने दिखाना और ब्रांडेड कपड़ों का शौक रखना उसकी फितरत थी। वहीं सुमित बेहद शांत, अंतर्मुखी और सादगी पसंद था।

विक्रांत ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी, लेकिन कॉलेज के कैंपस प्लेसमेंट में उसे कोई बड़ी कंपनी नहीं मिली। उसने घर आकर कहा, “पापा, यह 20-25 हज़ार की नौकरी मेरे लेवल की नहीं है। मैं अपना बिज़नेस करूँगा, स्टार्टअप शुरू करूँगा। मेरे पास एक धांसू आईडिया है।”

रघुवीर जी को ‘स्टार्टअप’ शब्द का मतलब ठीक से पता भी नहीं था, लेकिन बेटे के आत्मविश्वास ने उन्हें मोह लिया। उन्होंने अपनी पीएफ (PF) का एक बड़ा हिस्सा निकालकर विक्रांत को दे दिया—दस लाख रुपये।

“जा बेटा, जी ले अपनी ज़िंदगी। बस हमारा नाम रोशन करना,” रघुवीर जी ने कहा था।

विक्रांत पैसे लेकर बंगलौर चला गया। शुरू के छह महीने सब ठीक रहा। वह अक्सर वीडियो कॉल करता। कभी किसी आलीशान कैफ़े से, तो कभी किसी बड़ी बिल्डिंग के सामने खड़े होकर। वह कहता, “पापा, यह देखो मेरा नया ऑफिस। अभी रेंट पर है, जल्द ही खरीद लूँगा।”

रघुवीर जी और सुमित्रा देवी फूले नहीं समाते थे। गाँव और रिश्तेदारों में ढिंढोरा पिट गया कि विक्रांत अब बहुत बड़ा आदमी बन गया है।

दूसरी तरफ, सुमित ने चुपचाप प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी पा ली। वेतन साधारण था, लेकिन स्थायित्व था। जब सुमित ने अपनी पहली तनख्वाह लाकर माँ के हाथ में रखी, तो सुमित्रा देवी ने खुश होकर माथा तो चूमा, लेकिन तुरंत तुलना भी कर दी।

“चलो, अच्छा है सुमित। कम से कम दाल-रोटी का जुगाड़ तो हो गया। देख अपने भाई को, वो तो अब करोड़ों में खेल रहा है। तू भी उससे कुछ सीख, थोड़ा रिस्क लेना सीख।”

सुमित मुस्कुरा कर रह गया। वह जानता था कि भाई की लाइफस्टाइल और उसकी हकीकत में कुछ तो झोल है, लेकिन उसके पास सबूत नहीं थे और माता-पिता बड़े भाई के खिलाफ एक शब्द सुनने को तैयार नहीं थे।

समय बीतता गया। तीन साल निकल गए।

विक्रांत जब भी घर आता, तो टैक्सी के बजाय फ्लाइट से आता। उसके हाथ में महंगा आईफोन होता, कलाई पर चमचमाती घड़ी और बदन पर ब्रांडेड कोट-पैंट। वह आते ही पूरे घर के लिए महंगे गिफ्ट्स लाता। पड़ोसियों को बुलाकर पार्टी देता।

एक दिन रात के खाने पर विक्रांत ने कहा, “पापा, मेरा बिज़नेस अब इंटरनेशनल लेवल पर जा रहा है। एक अमेरिकी कंपनी इन्वेस्ट करना चाहती है, लेकिन मुझे अपनी तरफ से भी कुछ ‘शो’ करना पड़ेगा। मुझे पच्चीस लाख रुपये की सख्त ज़रूरत है। अगर यह डील हो गई, तो हम यह पुराना मकान तुड़वाकर यहाँ कोठी खड़ी कर देंगे।”

रघुवीर जी के हाथ का निवाला रुक गया। “पच्चीस लाख? बेटा, मेरे पास तो अब इतने पैसे नहीं बचे। रिटायरमेंट का जो पैसा था, वो तो तुझे पहले ही दे दिया था।”

“तो वो पुश्तैनी ज़मीन है न गाँव वाली? उसे बेच दीजिये,” विक्रांत ने बड़ी आसानी से कह दिया।

सुमित, जो चुपचाप खाना खा रहा था, बोल पड़ा, “भैया, वो ज़मीन पापा की आखिरी जमा-पूंजी है। अगर कल को कोई मुसीबत आई तो? और आपका बिज़नेस इतना अच्छा चल रहा है, तो आपको घर से पैसे लेने की क्या ज़रूरत है?”

विक्रम की आँखों में गुस्सा तैर गया। उसने चम्मच पटक दिया। “तू सरकारी बाबू है, बाबू ही रह। बिज़नेस की एबीसीडी पता है तुझे? पैसे को खींचने के लिए पैसा लगाना पड़ता है। और पापा, मैं माँग नहीं रहा, उधार ले रहा हूँ। छह महीने में दोगुना करके दूंगा।”

रघुवीर जी ने सुमित को डांट दिया। “तू चुप कर सुमित। वो समझदार है, उसे पता है क्या करना है। और वैसे भी, वो ज़मीन पड़ी-पड़ी क्या सोना उगल रही है?”

सुमित्रा देवी ने भी विक्रांत का पक्ष लिया। “हाँ जी, दे दीजिये। कल को बेटा जब महल खड़ा करेगा, तो हम ही गर्व करेंगे।”

सुमित की एक न चली। ज़मीन बिक गई। पैसे विक्रांत के खाते में चले गए।

अगले एक साल तक विक्रांत का आना-जाना कम हो गया। वह कहता कि वह बहुत व्यस्त है। फोन पर भी कम बात होती। जब भी रघुवीर जी पैसों का पूछते, वह कहता, “पापा, मार्केट डाउन है, अभी पैसा फंसा हुआ है। थोड़ा सब्र रखिये।”

फिर एक मनहूस रात आई।

रघुवीर जी को अचानक सीने में तेज़ दर्द उठा। सुमित और सुमित्रा देवी घबरा गए। आनन-फानन में उन्हें शहर के बड़े अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने बताया कि दिल की धमनियों में ब्लॉकेज है, तुरंत बाईपास सर्जरी करनी होगी। खर्चा—पाँच लाख रुपये।

सुमित के पास अपनी बचत के नाम पर सिर्फ़ एक लाख रुपये थे। रघुवीर जी का बैंक खाता खाली हो चुका था क्योंकि सारी जमा-पूंजी और ज़मीन के पैसे विक्रांत ले जा चुका था।

सुमित्रा देवी ने रोते हुए विक्रांत को फोन लगाया।

“बेटा, तेरे पापा आईसीयू में हैं। डॉक्टर ने पाँच लाख मांगे हैं। जल्दी से पैसे भेज दे।”

फोन पर सन्नाटा था। फिर विक्रांत की आवाज़ आई, “माँ… वो… अभी मेरे सारे अकाउंट फ्रीज़ हैं। इनकम टैक्स का कुछ लफड़ा चल रहा है। मैं… मैं अभी एक रुपया नहीं भेज सकता। आप सुमित से कहो, वो कुछ करे।”

“क्या कह रहा है तू?” सुमित्रा देवी चिल्लाईं। “तीस-पैंतीस लाख रुपये ले गया तू हमसे, और आज बाप की जान पर बनी है तो कह रहा है पैसे नहीं हैं?”

“माँ, प्लीज समझने की कोशिश करो। मैं बाद में बात करता हूँ,” कहकर विक्रांत ने फोन काट दिया। दोबारा फोन करने पर फोन ‘स्विच ऑफ’ आने लगा।

सुमित्रा देवी वहीं अस्पताल के गलियारे में ढ़ह गईं। सुमित ने उन्हें संभाला। “माँ, आप चिंता मत करो। मैं हूँ न।”

सुमित ने अपने ऑफिस के दोस्तों से उधार लिया, अपनी बाइक गिरवी रखी और अपनी पीएफ पर लोन लिया। जैसे-तैसे पैसों का इंतज़ाम हुआ। रघुवीर जी की सर्जरी सफल रही।

जब रघुवीर जी होश में आए और घर लौटे, तो वे बहुत कमज़ोर हो चुके थे। शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी। उन्हें पता चल चुका था कि जिस बेटे पर उन्होंने अपना सब कुछ लुटा दिया, वह ऐन वक्त पर पीठ दिखा गया।

“सुमित,” रघुवीर जी ने कांपती आवाज़ में कहा, “मुझे विक्रांत से मिलना है। मुझे जानना है कि मेरा पैसा आखिर गया कहाँ? वह इतना बड़ा आदमी है, फिर पांच लाख के लिए उसने फोन क्यों बंद कर लिया?”

सुमित ने सिर झुका लिया। “पापा, आप अभी आराम कीजिये।”

“नहीं!” रघुवीर जी ज़िद्द पर अड़ गए। “मुझे अभी बंगलौर जाना है। तू टिकट बुक कर।”

मज़बूरन सुमित को पिता को लेकर बंगलौर जाना पड़ा। विक्रांत ने जो पता दिया था, वे वहां पहुंचे। वह कोई आलीशान ऑफिस नहीं, बल्कि एक रिहायशी इलाके का साधारण सा फ्लैट था।

दरवाजे पर ताला लटका था।

सुमित ने पड़ोस की घंटी बजाई। एक बुजुर्ग महिला बाहर आईं।

“जी, यहाँ विक्रांत रहता था?” सुमित ने पूछा।

“हाँ, रहता तो था। पर दो महीने पहले पुलिस आई थी, तब से भागा हुआ है,” महिला ने बताया।

रघुवीर जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “पुलिस? क्यों?”

“अरे भाई साहब, वो लड़का कोई काम-धंधा नहीं करता था। दिन भर दोस्तों के साथ पार्टी करना, जुआ खेलना और ऑनलाइन सट्टेबाजी करना, यही काम था उसका। सुना है बहुत लोगों से उधार ले रखा था। मकान मालिक का किराया भी नहीं दिया। बोलता था कि बहुत बड़ी कंपनी है, पर असल में तो वो बाप के भेजे पैसों पर अय्याशी कर रहा था।”

रघुवीर जी को लगा जैसे किसी ने उनके सीने पर हथौड़ा मार दिया हो। आँखों के आगे अँधेरा छा गया। जिस ‘स्टार्टअप’ के नाम पर उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई और पुश्तैनी ज़मीन बेच दी, वो दरअसल जुए और शराब का अड्डा था। वो ऑफिस की फोटो, वो शान-ओ-शौकत… सब झूठ था। सब एक छलावा था।

सुमित ने पिता को संभाला। रघुवीर जी की आँखों से आंसू नहीं, बस एक खालीपन झांक रहा था।

वे वापस अपने शहर लौट आए। रघुवीर जी अब खामोश रहने लगे थे। वे अक्सर अपनी पुरानी टूटी हुई कुर्सी पर बैठकर शून्य में ताकते रहते।

कुछ दिनों बाद, एक रात दरवाजे की घंटी बजी। सुमित ने दरवाजा खोला। सामने विक्रांत खड़ा था। कपड़े मैले-कुचैले, दाढ़ी बढ़ी हुई, आँखों में डर। वह उस ‘सीईओ’ जैसा बिल्कुल नहीं लग रहा था जो फ्लाइट से आता था।

“सुमित… पापा हैं?” विक्रांत हकलाते हुए बोला।

रघुवीर जी अपने कमरे से बाहर आए। विक्रांत दौड़कर उनके पैरों में गिर गया।

“पापा, मुझे बचा लीजिये। वो लोग मुझे मार डालेंगे। मुझे दस लाख रुपये चाहिए। मैंने सट्टे में सब गंवा दिया। वो लोग मेरे पीछे पड़े हैं। आप घर गिरवी रख दीजिये पापा, मैं वादा करता हूँ सब ठीक कर दूंगा। मैं नौकरी कर लूँगा।”

रघुवीर जी ने अपने पैर पीछे खींच लिए। उन्होंने विक्रांत को ऐसे देखा जैसे किसी अजनबी को देख रहे हों।

“कौन हो तुम?” रघुवीर जी ने ठंडी आवाज़ में पूछा।

“पापा, मैं विक्रांत… आपका बेटा,” वह गिड़गिड़ाया।

“मेरा बेटा विक्रांत तो बहुत बड़ा आदमी था,” रघुवीर जी ने व्यंग्य और दर्द से भरी मुस्कान के साथ कहा। “उसका तो करोड़ों का कारोबार था। तुम तो कोई भिखारी लगते हो। मेरे बेटे ने तो मेरी ज़मीन उस ‘भविष्य’ के लिए बेची थी जो कभी था ही नहीं।”

“पापा, गलती हो गई। एक मौका दे दीजिये,” विक्रांत रोने लगा।

पास खड़ी सुमित्रा देवी का दिल पसीज गया। ममता फिर जाग उठी। “जी, सुनिए… हमारा ही खून है। पुलिस-गुंडों के हवाले कैसे कर दें? कुछ तो…”

“खबरदार सुमित्रा!” रघुवीर जी ने हाथ उठाकर रोका। उनकी आवाज़ में आज वो कड़कपन था जो प्रिंसिपल रहते हुए हुआ करता था।

“आज अगर तुमने इसे बचाया, तो तुम मेरी लाश देखोगी। इसने सिर्फ़ पैसा नहीं डुबोया, इसने मेरा विश्वास, मेरा स्वाभिमान और मेरे छोटे बेटे का हक़ मारा है।”

रघुवीर जी सुमित की तरफ मुड़े। “सुमित, पुलिस को फोन कर।”

“पापा?” विक्रांत और सुमित दोनों चौंक गए।

“हाँ, पुलिस को बुलाओ,” रघुवीर जी ने दृढ़ता से कहा। “अगर इसने अपराध किया है, लोगों का पैसा खाया है, तो इसे सजा भुगतनी होगी। मैं इसे घर बेचकर नहीं बचाऊंगा। ताकि कल को यह फिर किसी और बाप को न ठगे।”

विक्रांत को यकीन नहीं हुआ कि उसके पिता इतना कठोर फैसला ले सकते हैं।

“और सुन,” रघुवीर जी ने विक्रांत की आँखों में देखा, “तुम कहते थे न कि सुमित ‘बाबू’ है? हाँ, वो बाबू है। लेकिन उसी बाबू ने अपनी मेहनत की कमाई से मेरे दिल का ऑपरेशन कराया है। उसने अपनी बाइक बेच दी, पर मुझसे झूठ नहीं बोला। तुम ‘कागज़ के शेर’ निकले विक्रांत, और मेरा यह छोटा बेटा, जिसे हम हमेशा कम आंकते रहे, वो मेरी असली ‘लाठी’ निकला।”

थोड़ी देर बाद पुलिस आई और विक्रांत को ले गई। मोहल्ले वाले तमाशा देख रहे थे। वही शर्मा जी जो कभी विक्रांत की तारीफ करते नहीं थकते थे, अब कह रहे थे, “मैंने तो पहले ही कहा था, इतनी जल्दी पैसा कमाना हज़म नहीं होता। दाल में कुछ काला था।”

घर में सन्नाटा था। सुमित्रा देवी रो रही थीं। रघुवीर जी ने सुमित को अपने पास बुलाया और गले लगा लिया।

“मुझे माफ़ कर दे बेटा,” रघुवीर जी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। “मैं चमक-दमक में अंधा हो गया था। मैंने हीरे को पत्थर समझा और कांच के टुकड़े को हीरा। आज मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ नहीं बचा, न पैसा, न ज़मीन। बस यह टूटा हुआ मकान और कर्ज़ है।”

सुमित ने पिता के आंसू पोंछे। “पापा, आप साथ हैं, यही सबसे बड़ी दौलत है। हम मेहनत करेंगे, सब ठीक हो जाएगा। आखिर, आपकी ईमानदारी का खून तो मेरी रगों में भी है न।”

समय बीतता गया। सुमित ने अपनी मेहनत से घर के हालात सुधारे। विक्रांत जेल में था, अपने कर्मों की सजा काट रहा था। रघुवीर जी अब समझ चुके थे कि औलाद की सफलता उसके बैंक बैलेंस या बड़े पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और ज़िम्मेदारी उठाने की क्षमता से मापी जाती है।

उस दिन रघुवीर जी ने अपनी डायरी में एक बात लिखी—

“अपने बच्चों पर भरोसा करो, लेकिन इतना अंधा भरोसा मत करो कि उनकी सच्चाई देखना ही भूल जाओ। और कभी भी एक बच्चे की चमक के आगे दूसरे बच्चे की सादगी को कम मत आंको, क्योंकि अक्सर तूफ़ान में वही दीया जलता रह जाता है जिसे हम हवा के भरोसे छोड़ देते हैं।”


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यह कहानी आज के दौर की एक कड़वी सच्चाई है। कई बार युवा जल्दी अमीर बनने की चाह में गलत रास्ते चुन लेते हैं और माता-पिता प्यार में अंधे होकर सब कुछ लुटा देते हैं।

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लेखक : मुकेश पटेल 

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