*”रिटायरमेंट के बाद जब दुनिया ने उन्हें ‘बेकार’ मान लिया, तब उनकी बहू ने रद्दी की टोकरी से उनके पुराने सपनों को ढूँढ निकाला और उन्हें ‘बेमिसाल’ बना दिया। पढ़िए एक ससुर और बहू की दिल छू लेने वाली दास्तां।”*
“अक्सर लोग कहते हैं कि बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है। मेरे पास बेटा भी है जो मेरा बहुत ख्याल रखता है। लेकिन मेरी बहू… वो मेरी लाठी नहीं बनी, उसने मुझे ‘पंख’ दिए। उसने मुझे समझाया कि उम्र सिर्फ एक नंबर है, और सपने देखने की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। आज मैं जो कुछ भी हूँ, अपनी इस बेटी की बदौलत हूँ।”
बालकनी में रखी आरामकुर्सी पर बैठकर हरीश बाबू ने अपनी कलाई घड़ी की ओर देखा। सुबह के दस बज चुके थे। ठीक इसी समय, पिछले पैंतीस सालों से, वे बैंक की अपनी कुर्सी पर बैठकर पहली फाइल खोलते थे और अपने दिन की शुरुआत करते थे। लेकिन आज… आज सब कुछ अलग था। आज उनके सामने कोई फाइल नहीं थी, बस एक खालीपन था जो उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
पिछले हफ्ते ही हरीश बाबू बैंक के मैनेजर पद से रिटायर हुए थे। विदाई समारोह में फूलों के इतने गुलदस्ते मिले थे कि घर का ड्राइंग रूम किसी बगीचे जैसा लग रहा था। सबने कहा था, “अब तो आप आज़ाद हैं, आराम कीजिये, ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठाइये।” लेकिन हरीश बाबू को यह आज़ादी, आज़ादी कम और सज़ा ज़्यादा लग रही थी। पत्नी को गुज़रे हुए पाँच साल हो चुके थे। बेटा रजत और बहू सुमन अपनी-अपनी नौकरियों में व्यस्त थे। पोता चिंटू स्कूल चला जाता था। दिन भर घर की दीवारों को ताकते रहने के सिवा उनके पास कोई काम नहीं बचा था।
रसोई से कुकर की सीटी बजी। सुमन आज ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रही थी। हरीश बाबू ने सोचा कि जाकर पूछ लें अगर कुछ मदद चाहिए हो। वे धीरे-धीरे रसोई के दरवाजे तक पहुँचे।
“सुमन बेटा, कुछ काट-पीट करना है क्या? मैं कर दूँ?” हरीश बाबू ने हिचकिचाते हुए पूछा।
सुमन लैपटॉप पर किसी मीटिंग में थी, उसने म्यूट का बटन दबाया और मुस्कुरा कर बोली, “अरे नहीं पापा जी, आप क्यों तकलीफ करेंगे? खाना बस बन ही गया है। आप आराम कीजिये ना, टीवी देखिये या अख़बार पढ़ लीजिये।”
हरीश बाबू फीकी मुस्कान के साथ वापस अपनी कुर्सी पर आ गए। ‘आराम कीजिये’… यह शब्द अब उन्हें चुभने लगा था। उन्हें महसूस होने लगा था कि अब वो घर के किसी पुराने फर्नीचर की तरह हो गए हैं, जिसकी जगह कोने में है और जिसका कोई विशेष उपयोग नहीं है।
शाम को रजत ऑफिस से आया। वह थका हुआ लग रहा था। हरीश बाबू ने उत्साह से पूछा, “कैसा रहा बेटा आज का दिन?”
रजत ने जूते उतारते हुए कहा, “बस पापा, वही रोज की भागदौड़। टारगेट का प्रेशर है। अभी फ्रेश होकर फिर काम करना है।” और वह अपने कमरे में चला गया।
हरीश बाबू का मन भारी हो गया। उन्हें लगा कि उनके पास साझा करने के लिए कुछ है ही नहीं। न कोई किस्सा, न कोई शिकायत, न कोई उपलब्धि। वे चुपचाप अपने कमरे में गए और एक पुराना बक्सा निकाला। यह बक्सा उन्होंने सालों से नहीं खोला था। उसमें डायरियां थीं, लेकिन हिसाब-किताब की नहीं, बल्कि ‘व्यंजनों’ की।
हरीश बाबू को खाना बनाने का बहुत शौक था। जवानी में वे शेफ बनना चाहते थे, लेकिन पिता जी के डर और सरकारी नौकरी की सुरक्षा के चक्कर में उन्होंने मसालों को छोड़कर फाइलों को चुन लिया था। उस बक्से में उनकी माँ के हाथ के लिखे नुस्खे और उनके खुद के प्रयोग किए हुए कई रसीदें थीं। वे पन्ने पलटने लगे और उनकी आँखों में एक चमक आ गई, जैसे किसी पुराने दोस्त से मिल रहे हों।
अगले दिन रविवार था। घर में सब देर से सोकर उठे। हरीश बाबू सुबह पाँच बजे ही उठ गए थे। आज उन्होंने एक फैसला किया था। जब तक घर के बाकी लोग जागे, पूरे घर में एक भीनी-भीनी खुशबू फैल चुकी थी।
रजत और सुमन अंगड़ाई लेते हुए बाहर आए।
“यह खुशबू कहाँ से आ रही है?” रजत ने नाक सिकोड़ते हुए नहीं, बल्कि गहरी सांस लेते हुए पूछा। “यह तो… यह तो बिल्कुल वैसा है जैसा माँ बनाती थीं।”
वे दोनों रसोई में पहुँचे। वहां हरीश बाबू एप्रन पहने हुए थे (जो शायद सुमन का था और उन पर थोड़ा छोटा पड़ रहा था)। गैस पर एक बड़ी कड़ाही चढ़ी थी और हरीश बाबू बड़े चाव से उसमें करछी चला रहे थे।
“पापा? आप?” सुमन हैरान थी।
हरीश बाबू ने पलटकर देखा, उनके चेहरे पर पसीना था लेकिन आँखों में वो सूनापन नहीं था। “अरे, तुम लोग उठ गए? आज मैंने सोचा कि नाश्ता मैं बनाऊँ। तुम लोग हफ्ते भर काम करते हो, आज आराम करो। मैंने ‘अमृतसरी छोले और कुलचे’ बनाए हैं।”
डाइनिंग टेबल पर जब नाश्ता लगा, तो सन्नाटा छा गया। रजत ने पहला निवाला मुंह में डाला और उसकी आँखें बंद हो गईं। स्वाद वही था, जो उसके बचपन की यादों में बसा था।
“पापा… यह तो कमाल है! आपने कभी बताया नहीं कि आप इतना अच्छा खाना बनाते हैं?” रजत ने उंगलियाँ चाटते हुए कहा।
“अरे, नौकरी की भागदौड़ में शौक कहीं पीछे छूट गए थे बेटा। माँ के जाने के बाद तो रसोई में जाने की हिम्मत ही नहीं हुई। पर अब… अब वक्त ही वक्त है,” हरीश बाबू ने उदासी और खुशी के मिले-जुले भाव से कहा।
सुमन चुपचाप अपने ससुर को देख रही थी। उसने उनकी आँखों में वो चिंगारी देखी जो पिछले एक हफ्ते से गायब थी। उसे समझ आ गया कि ‘आराम’ हरीश बाबू की ज़रूरत नहीं है, ‘मकसद’ उनकी ज़रूरत है।
शाम को सुमन हरीश बाबू के पास आई। उनके हाथ में एक टैबलेट था।
“पापा जी, एक बात कहूँ? मानेंगे?” सुमन ने प्यार से पूछा।
“कहो बहु, क्या बात है?”
“पापा, आपके हाथ में जादू है। यह जादू सिर्फ़ हम तीन लोगों तक सीमित क्यों रहे? क्यों न हम इसे दुनिया को चखाएं?”
हरीश बाबू हँस पड़े। “अरे बहु, बुढ़ापे में मज़ाक मत कर। अब मैं क्या होटल खोलूँगा?”
“होटल नहीं पापा,” सुमन ने उत्साह से कहा। “क्लाउड किचन। मतलब, खाना घर पर बनेगा और डिलीवरी एप्स के ज़रिये लोगों तक पहुँचेगा। मैंने सब पता कर लिया है। हम छोटे से शुरुआत करेंगे। सिर्फ वीकेंड पर या सिर्फ नाश्ता। नाम भी सोच लिया है मैंने—’दादूज़ डिलाइट’ (Dadu’s Delight)।”
हरीश बाबू सन्न रह गए। उनका दिल जोर से धड़का। “लेकिन बेटा, रजत क्या कहेगा? लोग क्या कहेंगे कि बैंक मैनेजर अब बावर्ची बन गया?”
“लोग तो तब भी कहते थे जब आप बैंक जाते थे। और रजत की चिंता आप मत कीजिये, उसे मैं मना लूँगी। पापा, रिटायरमेंट का मतलब ज़िंदगी का अंत नहीं होता, यह तो दूसरी पारी की शुरुआत है। क्या आप नहीं चाहते कि आप अपनी पहचान फिर से बनाएं? किसी के पापा या दादा के रूप में नहीं, बल्कि ‘शेफ हरीश’ के रूप में?”
सुमन की बातों ने हरीश बाबू के सोए हुए सपनों को झकझोर दिया। उस रात हरीश बाबू को नींद नहीं आई, लेकिन यह अनिद्रा चिंता की नहीं, बल्कि उत्साह की थी।
अगले एक महीने तक घर का नक्शा बदल गया। सुमन ने सारी कानूनी कार्यवाही पूरी की। फूड लाइसेंस, पैकेजिंग, मेन्यू डिज़ाइन—सब सुमन ने संभाला। रजत पहले तो झिझका, “सुमन, पापा इस उम्र में थक जाएंगे,” लेकिन जब उसने पिता के चेहरे पर लौटती हुई रौनक देखी, तो वह भी साथ हो लिया।
‘दादूज़ डिलाइट’ का पहला दिन। मेन्यू में सिर्फ दो चीजें थीं—शाही पनीर और लच्छा पराठा। पहला आर्डर आया। हरीश बाबू के हाथ कांप रहे थे, डर से नहीं, बल्कि रोमांच से। सुमन ने एप्रन बांधने में उनकी मदद की।
“पापा, बेस्ट ऑफ लक! आप रॉक कर देंगे,” सुमन ने थम्स अप किया।
शुरुआत धीमी थी। पहले दिन सिर्फ पाँच आर्डर। लेकिन जिन्होंने खाया, उन्होंने ऐसे रिव्यु (Review) लिखे कि पढ़ने वालों के मुँह में पानी आ जाए। किसी ने लिखा, “घर की याद आ गई,” तो किसी ने लिखा, “शुद्ध स्वाद, बिल्कुल माँ के हाथ जैसा।”
धीरे-धीरे आर्डर बढ़ने लगे। हरीश बाबू अब सुबह उठकर खालीपन महसूस नहीं करते थे। वे सुबह-सुबह मंडी जाते, ताज़ी सब्जियां चुनते। घर आकर मसाले कूटते। उनका रसोई घर उनकी प्रयोगशाला बन गया था और सुमन उनकी मैनेजर।
एक दिन, शहर के एक बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस से बल्क आर्डर आया। पचास लोगों का लंच।
हरीश बाबू घबरा गए। “सुमन, पचास लोग? अकेले कैसे होगा? अगर गड़बड़ हो गई तो?”
सुमन ने उनके कंधे पर हाथ रखा। “अकेले कहाँ हैं आप पापा? मैं हूँ ना। मैंने आज की छुट्टी ले ली है। और चिंटू भी स्कूल से आकर पैकिंग में मदद करेगा। हम एक टीम हैं।”
उस दिन रसोई में जो दृश्य था, वह किसी युद्ध स्तर की तैयारी से कम नहीं था। हरीश बाबू मुख्य रसोइया थे, सुमन सब्जियां काट रही थी और रजत (जो लंच में घर आया था) पैकिंग के डिब्बे बना रहा था।
काम के बीच में हरीश बाबू ने एक पल रुककर अपने परिवार को देखा। पसीने से लथपथ, लेकिन चेहरों पर मुस्कान। उन्हें लगा जैसे उन्होंने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमाई आज की है।
आर्डर समय पर डिलीवर हुआ। शाम को उस कंपनी के बॉस का फोन आया।
“हेलो, क्या मैं हरीश जी से बात कर सकता हूँ?”
“जी, मैं हरीश बोल रहा हूँ,” हरीश बाबू ने डरते हुए कहा।
“सर, मैं मल्होत्रा बोल रहा हूँ। आज आपके यहाँ से खाना आया था। सच कहूँ सर, पिछले दस सालों से मैं बाहर का खाना खा रहा हूँ, लेकिन आज पहली बार लगा कि पेट नहीं, आत्मा तृप्त हो गई। आपके हाथों में साक्षात अन्नपूर्णा का वास है। बहुत-बहुत शुक्रिया।”
हरीश बाबू की आँखों से आंसू बह निकले। फोन रखकर वे सोफे पर बैठ गए। सुमन दौड़कर पानी लाई।
“क्या हुआ पापा? कोई शिकायत थी क्या?”
हरीश बाबू ने न में सिर हिलाया और सुमन को गले लगा लिया।
“नहीं बेटा… तारीफ थी। और यह तारीफ मेरी नहीं, तुम्हारी है। अगर तुम उस दिन मुझे उस खालीपन से खींचकर बाहर न लाती, तो मैं शायद उसी कुर्सी पर बैठा-बैठा सूख जाता। तुमने मुझे सिर्फ काम नहीं दिया, तुमने मुझे मेरी ‘ज़िंदगी’ वापस दी है।”
सुमन की भी आँखें भर आईं। “पापा, आप हमारे घर की नींव हैं। नींव कभी रिटायर नहीं होती, बस उस पर नई इमारतें बनती रहती हैं।”
समय बीतता गया। ‘दादूज़ डिलाइट’ अब शहर का जाना-माना नाम बन चुका था। हरीश बाबू ने दो सहायकों को नौकरी पर रख लिया था, लेकिन मसालों का मिश्रण वे आज भी खुद तैयार करते थे।
एक शाम, एक पत्रकार उनका इंटरव्यू लेने आया।
पत्रकार ने पूछा, “हरीश जी, 60 साल की उम्र में लोग रिटायर होकर तीर्थ यात्रा पर जाते हैं, आपने बिजनेस शुरू किया। यह प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?”
हरीश बाबू ने मुस्कुराते हुए अपनी बहू सुमन की ओर देखा, जो बगल में खड़ी थी।
“अक्सर लोग कहते हैं कि बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है। मेरे पास बेटा भी है जो मेरा बहुत ख्याल रखता है। लेकिन मेरी बहू… वो मेरी लाठी नहीं बनी, उसने मुझे ‘पंख’ दिए। उसने मुझे समझाया कि उम्र सिर्फ एक नंबर है, और सपने देखने की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। आज मैं जो कुछ भी हूँ, अपनी इस बेटी की बदौलत हूँ।”
रजत दूर खड़ा यह सब सुन रहा था। उसे अपनी पत्नी पर और अपने पिता पर इतना गर्व महसूस हो रहा था कि शब्द कम पड़ गए। उसने देखा कि कैसे एक छोटी सी कोशिश ने एक मुरझाए हुए चेहरे को फिर से खिला दिया था। घर का वो कोना, जहाँ हरीश बाबू पहले निढाल होकर बैठते थे, अब वहां पैकिंग के डिब्बे रखे रहते थे और दीवारों पर ‘बेस्ट शेफ’ के अवार्ड टंगे थे।
उस रात, सबने मिलकर जश्न मनाया। हरीश बाबू ने सबको अपनी स्पेशल खीर खिलाई।
चिंटू ने पूछा, “दादू, अब आप कभी बोर नहीं होते?”
हरीश बाबू ने चिंटू को गोद में उठाया और हँसते हुए बोले, “बोर होने का वक्त ही किसके पास है बेटा? अभी तो मुझे शहर का सबसे बड़ा शेफ बनना है!”
वंदना जी (कहानी की शुरुआत वाली) की तरह ही हरीश बाबू ने भी जीवन का एक पड़ाव खोया था—अपनी नौकरी और अपनी पत्नी। लेकिन जहाँ वंदना जी को एक दुखद परिस्थिति में जिम्मेदारी उठानी पड़ी, वहीं हरीश बाबू को एक सुखद प्रयास ने नई दिशा दी। फर्क सिर्फ इतना था कि यहाँ एक बहू ने अपने ससुर को ‘बोझ’ नहीं, बल्कि ‘संसाधन’ समझा। उसने उनकी काबिलियत को पहचाना और उन्हें वह सम्मान दिया जिसके वे हकदार थे।
इस घर की दीवारों में अब सन्नाटा नहीं गूंजता था, बल्कि मसालों की खुशबू और हंसी के ठहाके गूंजते थे। यह कहानी सिर्फ खाने की नहीं थी, यह कहानी थी एक रिटायर इंसान के पुनर्जन्म की, और उस पुनर्जन्म की सूत्रधार—उसकी बहू की। रिश्तों में अगर समझदारी और एक-दूसरे के सपनों का सम्मान हो, तो पतझड़ में भी वसंत लाया जा सकता है।
दोस्तों, हमारे घरों में अक्सर बुजुर्ग रिटायरमेंट के बाद खुद को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं। हम उनकी ज़रूरतें तो पूरी करते हैं, पर उनके सपनों को भूल जाते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि प्यार और थोड़ा सा प्रोत्साहन किसी की भी ज़िंदगी बदल सकता है।
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मूल लेखिका : रीमा साहनी