पहला प्यार – प्रतिमा पाठक

कभी-कभी जीवन में कुछ मुलाक़ातें शोर नहीं मचातीं, बस मन में चुपचाप जगह बना लेती हैं। नेहा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। बस एक सादा-सा एहसास, जो धीरे-धीरे गहराता चला गया।

नेहा शहर के सरकारी कॉलेज में पढ़ती थी। रोज़ वही बस, वही रास्ता, वही भीड़। लेकिन उस भीड़ में एक चेहरा था, जो उसे हर बार अलग लगता वह था-आदित्य। वह अक्सर खिड़की वाली सीट पर बैठता, हाथ में किताब और आँखों में किसी अनकही दुनिया का सुकून लिए। नेहा ने कभी उससे बात नहीं की थी, पर उसकी मौजूदगी उसे अजीब-सा भरोसा देती थी।

पहली बार बातचीत तब हुई, जब बस अचानक बीच रास्ते में ख़राब हो गई। बारिश शुरू हो चुकी थी और सब यात्री परेशान थे। नेहा की फ़ाइल ज़मीन पर गिर पड़ी। आदित्य ने झुककर फ़ाइल उठाई और मुस्कराकर बोला, लगता है बारिश ने भी आज परीक्षा लेने की ठान ली है। नेहा हँस दी। वही हँसी उनके रिश्ते की पहली सीढ़ी बन गई।

इसके बाद बातें होने लगीं,कभी बस स्टॉप पर, कभी कैंटीन में। विषय साधारण होते -किताबें, घर, सपने आदि। आदित्य कम बोलता था, लेकिन जो कहता, साफ़ और सच कहता। नेहा को उसकी यही सहजता भाने लगी। उसे एहसास हुआ कि पहला प्यार हमेशा बेचैन नहीं होता, कभी-कभी वह ठहराव भी देता है।

समय के साथ दोनों एक-दूसरे की आदत बन गए। परीक्षा से पहले साथ नोट्स देखना, रिज़ल्ट के दिन एक-दूसरे को सबसे पहले ढूँढना ये सब बिना कहे उनके रिश्ते को नाम दे रहे थे। फिर भी, न नेहा ने कुछ कहा, न आदित्य ने। शायद दोनों डरते थे कि शब्द कहीं इस सादगी को तोड़ न दें।

एक दिन कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। नेहा ने कविता-पाठ किया। उसकी कविता सपनों और भरोसे पर थी। मंच से उतरते ही आदित्य ने कहा, “तुम्हारी कविता में डर नहीं था।” नेहा ने पूछा, “और तुम्हें डर लगता है?” आदित्य कुछ पल चुप रहा, फिर बोला “पहला प्यार खो देने का।”

उस वाक्य ने नेहा के भीतर साहस भर दिया। उसे लगा अब चुप रहना सही नहीं। उसी शाम, दोनों कॉलेज के पीछे वाले पार्क में बैठे थे। आसमान गुलाबी हो रहा था। नेहा ने धीरे से कहा, “अगर पहला प्यार मिल जाए, तो?”

आदित्य ने उसकी ओर देखा-बिलकुल सीधे, बिना हिचक। “तो उसे थाम लेना चाहिए,” उसने कहा, “क्योंकि हर बार जीवन दूसरा मौका नहीं देता।”

उस पल कोई प्रस्ताव नहीं था, कोई बड़े शब्द नहीं। बस दो दिल थे, जो एक-दूसरे की सच्चाई स्वीकार कर रहे थे। नेहा को लगा, जैसे उसके भीतर की सारी उलझनें शांत हो गई हों।

कॉलेज खत्म हुआ। रास्ते अलग हुए, लेकिन रिश्ता नहीं। कभी संदेश, कभी मुलाक़ात दोनों ने सीख लिया था । आदित्य नौकरी के लिए दूसरे शहर चला गया, नेहा ने आगे की पढ़ाई शुरू की। मुश्किलें आईं, असहमति भी हुई, पर भरोसा बना रहा।

सालों बाद, उसी पार्क में दोनों फिर बैठे थे। इस बार हाथों में कॉफ़ी नहीं थी, बल्कि समय की परतों में सहेजी हुई स्मृतियाँ थीं। आदित्य ने आकाश की ओर देखते हुए कहा, “ज़िंदगी ने हमें बहुत कुछ सिखाया है।”

नेहा मुस्कराई। उसने महसूस किया कि प्रेम हमेशा साथ चलने का नाम नहीं होता, बल्कि सही समय पर सही एहसास बनने का नाम होता है। दोनों समझ चुके थे कि उनका रिश्ता मंज़िल नहीं, बल्कि एक सुंदर यात्रा था।

आदित्य ने धीरे से कहा, “अगर हम अलग न होते, तो शायद इतने सच्चे न बन पाते।”

नेहा ने सहमति में सिर हिलाया। उसके मन में कोई कसक नहीं थी, सिर्फ़ आभार था—उस पहले प्यार के लिए, जिसने उसे मजबूत बनाया, खुद से मिलाया।

वे उठे, अलग-अलग दिशाओं में चले गए। कोई वादा नहीं, कोई अफ़सोस नहीं।

नेहा जानती थी,कुछ पहले प्यार जीवन भर साथ नहीं रहते, पर वे हमें जीवन भर के लिए तैयार कर देते हैं। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी पूर्णता होती है।

    प्रतिमा पाठक

         दिल्ली

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