सूने कमरों की गूंज – विभा गुप्ता

“ईंट और सीमेंट से दीवारें तो खड़ी हो सकती हैं, लेकिन उन दीवारों को थामने के लिए जिन रिश्तों की जरूरत होती है, अगर वही खोखले हो जाएं, तो करोड़ों का महल भी एक आलीशान खंडहर से ज्यादा कुछ नहीं होता। क्या एक पिता की पुरानी कुर्सी बेटे के नए इटालियन मार्बल की शोभा बिगाड़ सकती है?”

“बाऊजी! आपको पता भी है यह कितने का था? तीन लाख रुपये का! मैंने आपसे कहा था न कि आप आराम से अंदर वाले कमरे में बैठिए। यहाँ भीड़ में आने की क्या ज़रूरत थी? अब देखो, कर दिया न नुकसान! आपको इन चीज़ों की कीमत का अंदाज़ा भी नहीं है। गांव के उस कच्चे घर में रहने की आदत है, यहाँ की नज़ाकत आप क्या समझोगे?” आलोक चिल्ला पड़ा। मेहमानों के सामने उसका यह रूप देखकर रिया ने उसे शांत करने की कोशिश की, “आलोक, जाने दो, गलती से हो गया।”

‘रॉयल पाम्स सोसाइटी’ के सबसे महंगे विला, नंबर 101 के बाहर आज कारों की लंबी कतार लगी थी। शहर के मशहूर आर्किटेक्ट ने इस घर को डिज़ाइन किया था। दूर से देखने पर यह किसी फाइव स्टार होटल से कम नहीं लगता था। आज आलोक और उसकी पत्नी रिया का गृह-प्रवेश था। आलोक ने अपनी मेहनत और बिजनेस की सफलता से आज वह मुकाम हासिल कर लिया था, जिसका सपना उसने कभी अपने छोटे से कस्बे की तंग गलियों में देखा था।

घर के अंदर झूमर की रोशनी आँखों को चकाचौंध कर रही थी। इटालियन मार्बल का फर्श ऐसा चमक रहा था कि कोई भी अपनी शक्ल देख ले। हर कोने में विदेशी फूलदान और महंगी पेंटिंग्स लगी थीं। मेहमान आ रहे थे और आलोक की पीठ थपथपा कर कह रहे थे, “क्या महल बनाया है यार! मान गए तेरी चॉइस को।” आलोक गर्व से फूलकर कुप्पा हो रहा था। रिया भी अपनी डिज़ाइनर साड़ी में मेहमानों की खातिरदारी में व्यस्त थी।

इस चकाचौंध के बीच, हॉल के एक कोने में सोफे पर सिकुड़कर बैठे थे आलोक के माता-पिता, बाऊजी (रामेश्वर) और माँ (सुधा)। रामेश्वर जी ने एक साधारण सा धोती-कुर्ता पहना था और सुधा जी ने सूती साड़ी। उस आलीशान हॉल में वे दोनों किसी बेमेल सामान की तरह लग रहे थे। रामेश्वर जी बार-बार अपनी धोती ठीक करते और डरते कि कहीं उनके पैरों की धूल से यह कीमती सोफा गंदा न हो जाए।

कुछ देर पहले ही एक वाकया हुआ था जिसने रामेश्वर जी के उत्साह पर पानी फेर दिया था। जब वे गांव से आए थे, तो अपने साथ एक पुरानी, लकड़ी की तुलसी-चौरा और अपने पिता की एक बड़ी सी तैलचित्र वाली तस्वीर लाए थे।

जैसे ही आलोक ने वह देखा था, उसका माथा ठनक गया था। उसने ड्राइवर से कहकर वह तस्वीर और तुलसी का गमला पीछे सर्वेंट क्वार्टर की तरफ रखवा दिया था। जब रामेश्वर जी ने पूछा, “बेटा, इसे आंगन में नहीं रखोगे?” तो आलोक ने झुंझलाते हुए कहा था, “बाऊजी, प्लीज। यह मॉडर्न विला है। यहाँ आपका वह पुराना लकड़ी का गमला और वह भारी-भरकम फोटो इंटीरियर के साथ मैच नहीं करता। लोग क्या कहेंगे? इतना पैसा लगाकर घर बनाया है, उसे कबाड़खाना नहीं बनाना मुझे।”

वह शब्द ‘कबाड़खाना’ रामेश्वर जी के दिल में फांस की तरह चुभ गया था। वह तस्वीर उनके लिए भगवान समान थी और वह तुलसी उनकी पत्नी की आस्था। लेकिन बेटे की खुशी के लिए वे चुप रह गए।

पार्टी शवाब पर थी। वेटर ड्रिंक्स और स्नैक्स लेकर घूम रहे थे। आलोक अपने बिजनेस पार्टनर्स के साथ हंसी-ठिठोली कर रहा था। तभी आलोक का बॉस, मिस्टर खन्ना, रामेश्वर जी की तरफ बढ़ा।

“हेलो! आप आलोक के फादर हैं?” मिस्टर खन्ना ने हाथ बढ़ाया।

रामेश्वर जी हड़बड़ा कर खड़े हो गए। उन्होंने हाथ जोड़ने की कोशिश की, फिर याद आया कि हाथ मिलाना है। इस हड़बड़ाहट में उनकी कोहनी पास रखे एक छोटे से मेज से टकरा गई। मेज पर रखा एक बहुत ही कीमती क्रिस्टल का शो-पीस, जो आलोक ने खास दुबई से मंगवाया था, नीचे गिरकर चकनाचूर हो गया।

हॉल में सन्नाटा छा गया। संगीत बंद हो गया। सबकी निगाहें टूटे हुए कांच और सहमे हुए रामेश्वर जी पर थीं।

आलोक दौड़कर आया। उसने टूटे हुए टुकड़ों को देखा और फिर अपने पिता को। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

“बाऊजी! आपको पता भी है यह कितने का था? तीन लाख रुपये का! मैंने आपसे कहा था न कि आप आराम से अंदर वाले कमरे में बैठिए। यहाँ भीड़ में आने की क्या ज़रूरत थी? अब देखो, कर दिया न नुकसान! आपको इन चीज़ों की कीमत का अंदाज़ा भी नहीं है। गांव के उस कच्चे घर में रहने की आदत है, यहाँ की नज़ाकत आप क्या समझोगे?” आलोक चिल्ला पड़ा। मेहमानों के सामने उसका यह रूप देखकर रिया ने उसे शांत करने की कोशिश की, “आलोक, जाने दो, गलती से हो गया।”

“कैसी गलती रिया? सुबह से देख रहा हूँ, कभी जूतों के निशान बना रहे हैं, कभी ज़ोर-ज़ोर से बातें कर रहे हैं। मुझे अपनी रेपुटेशन का ख्याल रखना पड़ता है। इन्हें तो बस…” आलोक ने बात अधूरी छोड़ दी, लेकिन जो कहा गया था, वह काफी था।

रामेश्वर जी की आँखों में आंसू थे, लेकिन वे बहे नहीं। उन्होंने कांपते हाथों से नीचे झुककर कांच के टुकड़े उठाने की कोशिश की।

“रहने दीजिए! अब और तमाशा मत बनाइए। वेटर साफ कर देगा,” आलोक ने झिड़क दिया और मेहमानों की तरफ मुड़कर जबरदस्ती मुस्कुराते हुए बोला, “सॉरी एवरीवन, थोड़ा डिस्टर्बेंस हो गया। प्लीज एंजॉय द पार्टी।”

रामेश्वर जी और सुधा जी चुपचाप वहां से उठकर उस कमरे में चले गए जो उन्हें दिया गया था। वह कमरा भी किसी फाइव स्टार होटल के कमरे जैसा था, लेकिन वहां हवा में एक अजीब सी घुटन थी।

सुधा जी ने रामेश्वर जी के कंधे पर हाथ रखा। रामेश्वर जी बिस्तर के किनारे बैठकर शून्य में ताक रहे थे।

“सुधा,” रामेश्वर जी की आवाज़ भारी थी। “तुम्हें हमारा वो पुराना घर याद है? जिसकी छत बारिश में टपकती थी?”

सुधा जी ने सिर हिलाया।

“वहाँ जब आलोक छोटा था और एक बार क्रिकेट खेलते हुए उसने घर की एकमात्र घड़ी तोड़ दी थी, तो मैंने क्या किया था?”

सुधा जी की आँखों में पानी भर आया। “आपने उसे गोद में उठा लिया था और कहा था कि शुक्र है मेरे बेटे के पैर में कांच नहीं लगा। घड़ी तो दूसरी आ जाएगी।”

रामेश्वर जी फीकी हंसी हंसे। “हाँ। क्योंकि तब घर छोटा था, लेकिन दिल बड़े थे। आज मकान इतना बड़ा है कि इसमें आवाज़ गूंजती है, लेकिन दिल इतने छोटे हो गए हैं कि वहां पिता की गलती के लिए कोई जगह नहीं है। तीन लाख का कांच टूट गया, इसका उसे दुख है। लेकिन उसके पिता का स्वाभिमान टूट गया, इसकी उसे खबर भी नहीं।”

उन्होंने एक पुराना झोला उठाया और उसमें अपने कपड़े भरने लगे।

“यह क्या कर रहे हैं आप?” सुधा जी ने घबराकर पूछा।

“तैयारी कर लो सुधा। हम अभी रात की बस से वापस गांव जा रहे हैं,” रामेश्वर जी ने दृढ़ता से कहा। “मकान तो आलोक ने बहुत शानदार बना लिया है, लेकिन यह ‘घर’ नहीं बन पाया। घर वो होता है जहाँ गलतियों पर पर्दा डाला जाता है, न कि नुमाइश की जाती है। यहाँ हम शो-पीस से ज्यादा कुछ नहीं हैं, और वो भी ऐसे शो-पीस जो अब आउट ऑफ फैशन हो चुके हैं।”

सुधा जी ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। वह जानती थीं कि जब आत्मसम्मान पर चोट लगती है, तो मखमल का गद्दा भी कांटों जैसा चुभता है।

दोनों ने अपना सामान उठाया और पिछले दरवाजे से निकलने लगे। हॉल में अभी भी जश्न चल रहा था। किसी को खबर नहीं थी कि इस महल की नींव, यानी माता-पिता, उसे छोड़कर जा रहे हैं।

जैसे ही वे गेट तक पहुँचे, वॉचमैन ने उन्हें रोका नहीं, बस हैरान होकर देखा। तभी पीछे से एक छोटी सी आवाज़ आई।

“दादू! दादी!”

यह आलोक का सात साल का बेटा, कबीर था। वह दौड़ता हुआ आया और रामेश्वर जी के पैरों से लिपट गया। “आप कहाँ जा रहे हो? अभी तो हमने केक भी नहीं काटा।”

रामेश्वर जी ने झुककर पोते को गले लगाया। उनकी आँखों से अब आंसू बह निकले। “बेटा, हम गांव जा रहे हैं। वहां हमारे पेड़-पौधे अकेले हैं न।”

“लेकिन दादू, यह घर तो आपके बिना अच्छा नहीं लगता। पापा ने इतना बड़ा घर बनाया, मेरे पास वीडियो गेम रूम है, थिएटर है, लेकिन मुझे तो आपके साथ वो परियों वाली कहानी सुननी है। इस घर में मुझे डर लगता है दादू, यहाँ सब चुप रहते हैं। आप होते हो तो लगता है कि कोई अपना है।” बच्चे की मासूमियत ने वह सच बोल दिया जो बड़े नहीं समझ पा रहे थे।

तभी आलोक, जो कबीर को ढूंढते हुए वहां आया था, ठिठक गया। उसने अपने बूढ़े माता-पिता को हाथ में झोला लिए और बेटे को रोते हुए देखा। उसने सुना जो कबीर ने कहा – “इस घर में मुझे डर लगता है।”

आलोक के कानों में बाऊजी के वो शब्द गूंजने लगे जो उन्होंने बचपन में कहे थे – “बेटा आलोक, मकान ईंटों से बनता है, उसे कोई भी मिस्त्री बना सकता है। लेकिन घर परिवार के प्यार, त्याग और एक-दूसरे की इज्ज़त से बनता है। जिस घर में बड़ों की इज़्ज़त नहीं, वह घर नहीं, सराय है।”

अचानक आलोक की नज़र उस टूटे हुए क्रिस्टल के टुकड़े पर पड़ी जो शायद उसके जूते में फंसकर यहाँ तक आ गया था। उसे अपनी तीन लाख की उस ‘चीज़’ और सामने खड़े अनमोल माता-पिता के बीच का फर्क समझ आने लगा। उसने देखा कि बाऊजी के जूते कितने घिस चुके थे। वह आदमी जिसने अपनी पूरी पीएफ की रकम आलोक की इंजीनियरिंग की पढ़ाई में लगा दी, ताकि आलोक एसी ऑफिस में बैठ सके, आज वही आलोक उन्हें धक्के मारकर अपनी ‘सफलता’ से बाहर निकाल रहा था।

आलोक का नशा, उसका अहंकार, सब कुछ आंसुओं के साथ बह गया। वह दौड़कर गया और रामेश्वर जी के पैरों में गिर पड़ा। उसने उनके जूतों को पकड़ लिया।

“बाऊजी! मत जाइए। मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं अंधा हो गया था। इस चकाचौंध ने मुझे अंधा कर दिया था,” आलोक फूट-फूट कर रो रहा था। मेहमान, जो अब बाहर आ चुके थे, हैरान होकर देख रहे थे। लेकिन आलोक को अब किसी की परवाह नहीं थी।

“मैं भूल गया था कि यह फर्श, यह दीवारें, यह झूमर… यह सब बेजान हैं। इस घर की असली रौनक आप हैं। अगर आप चले गए, तो यह विला तो रहेगा, लेकिन मेरा ‘घर’ उजड़ जाएगा। मुझे नहीं चाहिए यह तीन लाख का शो-पीस, मुझे मेरा बाऊजी चाहिए जो मेरी गलतियों पर मुझे सीने से लगा ले।”

रामेश्वर जी ने झुककर बेटे को उठाया। उनका गुस्सा तो कब का पिघल चुका था, बस दर्द बाकी था, जो बेटे के आंसुओं ने धो दिया। उन्होंने अपने कांपते हाथों से आलोक के आंसू पोंछे।

“पगले, पिता का दिल तो मोम का होता है। तूने धुतकारा, तब भी मुझे तेरी ही चिंता थी कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन याद रखना आलोक, पेड़ कितना भी ऊंचा हो जाए, अगर जड़ों से कट गया तो सूख जाएगा।”

आलोक ने उसी वक्त ड्राइवर को बुलाया। “जाओ, अभी सर्वेंट क्वार्टर से बाऊजी की तुलसी और दादाजी की तस्वीर लेकर आओ।”

उसने खुद अपने हाथों से वह भारी तस्वीर उठाई और ले जाकर हॉल के ठीक बीचो-बीच सबसे प्रमुख दीवार पर लगा दी, जहाँ पहले एक महंगी मॉडर्न आर्ट लगी थी। उसने तुलसी का गमला मेन गेट के पास रखा।

फिर उसने माइक लिया और मेहमानों से कहा, “माफ़ कीजिएगा दोस्तों। आज मैं आपको अपना ‘घर’ दिखाना भूल गया था। अभी तक आप जो देख रहे थे, वो सिर्फ एक मकान था, एक बिल्डिंग थी। लेकिन अब…” उसने अपने माता-पिता को अपने अगल-बगल खड़ा किया, “अब यह मेरा घर है। क्योंकि मेरे भगवान मेरे मंदिर में स्थापित हो गए हैं।”

हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। आज वह घर सच में रोशन लग रहा था। उस रोशनी में झूमर की चमक नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट थी। कबीर खुशी से नाच रहा था क्योंकि उसे उसका “घर” मिल गया था।

रात को जब सारे मेहमान चले गए, तो आलोक, रिया, कबीर और उसके माता-पिता उसी आंगन में ज़मीन पर बैठकर खाना खा रहे थे। इटालियन डाइनिंग टेबल खाली पड़ी थी।

रामेश्वर जी ने एक निवाला आलोक के मुंह में दिया और बोले, “मकान तो कोई भी बना सकता है, लेकिन आज तूने इसे घर बना दिया।”

आलोक ने महसूस किया कि इस साधारण दाल-चावल में जो स्वाद था, वह दुनिया के किसी भी फाइव स्टार होटल के खाने में नहीं था। उसने सीख लिया था कि सीमेंट रिश्तों को नहीं जोड़ता, प्रेम जोड़ता है।


कहानी का सार:

दोस्तों, हम अपनी पूरी जिंदगी बड़ा मकान, बड़ी गाड़ी और बड़ा नाम कमाने में लगा देते हैं। लेकिन इस दौड़ में हम अक्सर उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं जिन्होंने हमें चलना सिखाया। याद रखें, मकान का नक्शा आर्किटेक्ट बनाता है, लेकिन घर का माहौल परिवार के संस्कार बनाते हैं। अपने माता-पिता को अपने घर का कोना नहीं, बल्कि अपने दिल का केंद्र बनाएं।

प्रश्न आपके लिए:

क्या आलोक को अपनी गलती का एहसास सही समय पर हुआ? क्या आज की पीढ़ी प्राइवेसी और स्टेटस के नाम पर अपने बुजुर्गों को अपने से दूर कर रही है? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।


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मूल लेखिका : विभा गुप्ता

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