अंकित हॉस्पिटल के बिस्तर पर लेटा हुआ छत को घूर रहा था। उसकी आंखे पीड़ा से भरी हुई थी। बिस्तर के पास उसकी पत्नी अदिति बैठी हुई उसे ही देख रही थी। वो स्वयं को असहाय महसूस कर रही थी।
तभी डॉक्टर वहां आए और बोले,
“अभी इनकी तबियत ठीक है। दो दिन बाद डिस्चार्ज कर देंगे।”
अंकित को अपने मां, पापा, और भाई भाभी बहुत याद आ रहे थे। एक साल हो गया था उसे घर छोड़े हुए और इस बीते एक वर्ष में वो अपने परिवार वालों से मिला नहीं था।
एक साल पहले वो अपने परिवार वालों से लड़ झगड़ कर अलग हो गया था और अपनी अकड़ की वजह से वो उनसे कभी मिलने भी नहीं गया था।
बात कुछ ज्यादा बड़ी भी नहीं थी,,लेकिन आपस की बहस ने बड़े झगड़े का रूप ले लिया था।
उसके बड़े भैया दिव्य उसके पापा का बिजनेस संभालते है और वो खुद एक बैंक में नौकरी करता है।
दो साल पहले उसकी शादी अदिति से हुई जो उसके साथ ही बैंक में नौकरी करती है।
उसकी भाभी और उसकी मम्मी घर संभालती है। अदिति भी शाम को बैंक से आकर घर के कामों में भाभी की मदद कर देती थी। सब मिल कर हंसी खुशी से रहते थे। कोई घरेलु काम का या पैसों का झगड़ा नहीं था।
लेकिन एक दिन उनकी खुशियों को नजर लग गई।
एक दिन अंकित ने शाम को खाना खाते समय सबसे कहा,
“मैं और अदिति सोच रहे है कि दिवाली की चार दिन की छुट्टियां है और तीन दिन की छुट्टियां ले कर हम कहीं घूम आए!”
तब उसके बड़े भैया ने कहा,
” अच्छी बात है तुम लोग घूम आओ लेकिन अगर संभव हो तो दिवाली के बाद जाओ क्योंकि अभी दिवाली पर हमारी दुकान में बहुत भीड़ रहती है और पापा की तबियत भी ठीक नहीं है कि वो दुकान में मेरी मदद कर सके। इसलिए अगर हो सके तो तुम छुट्टियों में दुकान में मेरी मदद कर दो और दिवाली के बाद घूमने चले जाओ।”
चूंकि उसके भैया की कपड़ों की बड़ी दुकान है और दिवाली पर कपड़ों की दुकानों में भीड़ रहती है और उस समय उसके पापा की तबियत भी खराब चल रही थी इसी वजह से उसके भैया ने अंकित से दुकान के लिए मदद मांगी थी।
लेकिन अंकित ने अपने भैया की बात का गलत मतलब निकाल लिया और लड़ाई पर उतर आया। वो हमेशा से ही थोड़ा तेज स्वभाव का ही था।
“मुझे पता है आपको मेरा घूमना फिरना पसंद नहीं है। आप तो कभी अपनी दुकान एक दिन के लिए बंद करके कहीं जाते नहीं है और अब हमको भी जाने नहीं देना चाहते है। मुझे अच्छे से पता है कि मेरी और आदित की कमाई आपसे ज्यादा है इसलिए आप हमसे जलते है।” वो जो जी में आया बोलता चला गया।
बड़े भैया ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की। मां पापा ने भी समझाया। लेकिन वो समझना ही नहीं चाहता था। उसकी पत्नी अदिति ने उसे बोलने से रोका तो उसे भी डांट दिया।
बात बात में बात बढ़ गई और उसने गुस्से में अलग रहने का फैसला कर लिया।
दो तीन दिन में ही उसने एक किराए का घर ढूंढ लिया और अपनी पत्नी के साथ अलग घर में चला गया।
उसकी पत्नी की अलग रहने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी क्योंकि वो जानती थी कि जहां पति पत्नी दोनों नौकरी करते हो वहां घर वालों का साथ रहना जरूरी है। जब बच्चे होंगे तो दादी दादी और घर वाले ही उनको संभाल पाएंगे, वो अपने बच्चों को समय नहीं दे पाएंगे।
लेकिन अंकित अपनी अकड़ में कुछ समझना ही नहीं चाहता था।
घर से अलग होने के बाद उसने मुड़ कर कभी वापस उस घर में कदम नहीं रखा। अपने मां पापा से फोन पर बात कर लेता था। उनको घर भी बुलाता था।
लेकिन वो उसके घर नहीं आए क्योंकि उनकी नजर में गलती अंकित की ही थी क्योंकि उसने सबका अपमान किया था।
एक साल से अंकित अपने परिवार वालों से अलग रह रहा था।
दो दिन पहले अचानक रात में सोते हुए उसे बेचैनी महसूस होने लगी। पूरा बदन पसीने से भीग गया। उसने अपनी पत्नी अदिति को उठाया। अदिति ने तुरंत एम्बुलेंस बुलवाई और उसे हॉस्पिटल ले आई।
वहां डॉक्टर ने जांच करके कहा,
“इन्हें हार्ट अटैक आया है और तुरंत बायपास करना पड़ेगा।”
अदिति ने अपने पास इकट्ठे पैसे हॉस्पिटल में जमा करवाए और अंकित का ऑपरेशन करवाया।
लेकिन इस मुसीबत की घड़ी में अदिति खुद को नितांत अकेला महसूस कर रही थी। अंकित को देख कर उसकी स्वयं की हालत खराब हो रही थी।
रो रो कर उसके आंसू गालों पर जम गए थे। उसे किसी की मदद की सख्त जरूरत महसूस हो रही थी जो उसे मानसिक तौर पर संभाल सके, उसे हौसला दे सके!
उसका मायका दूसरे शहर था। वहां से भी कोई जल्दी से नहीं आ सकता था।
अंततः उसने अपनी सास को फोन लगाया और अंकित की तबियत के बारे में बताया। अंकित की तबियत के बारे में सुनते ही अंकित के मां, पापा, भाई, भाभी,,सब पिछली सारी बातें भुला कर हॉस्पिटल आ गए।
उन सबको देखते ही अदिति अपनी सास और जेठानी से लिपट कर बिलख पड़ी। सबने मिल कर उसे संभाला और हौसला दिया। अपनों का साथ पा कर अदिति में भी परिस्थितियों का सामना करने की हिम्मत आ गई थी। अंकित के भाई ने हॉस्पिटल में बकाया पैसे जमा करवा दिए थे।
अंकित को ऑपरेशन के बाद दो दिन आई सी यू में रखा गया और अब कमरे में शिफ्ट कर दिया था। जब से उसका ऑपरेशन हुआ था वो बहुत उदास सा था। उसे अपने घर वाले बहुत याद आ रहे थे।
तभी उसके कमरे का दरवाजा खुला और उसके मां पापा अंदर आए। उनको देखते ही उसका चेहरा खुशी से खिल गया।
उसने तुरंत पूछा,
“मां पापा आपके साथ भैया नहीं आए!! क्या वो अब तक मुझसे नाराज है?” उसकी आवाज में उदासी थी।
तभी उसके भाई की आवाज आई,
“अंकित मैं तुझसे कभी नाराज़ था ही नहीं।! तु तो मुझसे छोटा है और अपने से छोटो से क्या नाराज होना!”
अंकित ने मूड कर देखा, कमरे के दरवाजे पर उसके भाई भाभी खड़े थे।
उनको देखते ही दर्द में भी उसके होंठो पर मुस्कराहट आ गई।
तीन दिन बाद उसे डिस्चार्ज करवा कर उसे वापस घर ले आए और सबकी देखभाल से अंकित कुछ ही दिनों में तंदुरुस्त हो गया।
एक दिन वो अपने भैया से बोला,
“भैया मुझे समझ आ गया है कि परिवार ही असली धन है और मुझे यही धन अब हमेशा के लिए चाहिए।” सुन कर उसके भैया ने उसे गले से लगा लिया।
#सबसे बड़ा धन: परिवार
रेखा जैन
अहमदाबाद, गुजरात