मां के असमय गुजर जाने के बाद,सबसे छोटी पायल वास्तव में अनाथ हो गई।बड़ा सा घर था पुश्तैनी।बचपन में बिजली और पानी की समुचित सुविधा नहीं थी।घर की छोटी होने के कारण,
हैंडपंप से पानी उसे ही लाना पड़ता था।मिक्सी नहीं था तो, सिलबट्टे पर मसाला पीसना भी उसी के जिम्मे आता था।खाने की शौकीन थी वह। घर के किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय में उसके सलाह की कभी किसी ने जरूरत ही नहीं समझी।
बड़ी बहन होने के नाते मीना ही संरक्षण देती रही उसे,पापा के जाने के बाद।मंझली बहन की शादी में मां के साथ मिलकर पूरी तैयारी की थी उसने पहली बार।
तैयारियां देखकर मीना ने भाई से कहा भी था”देख ले भाई,कितनी समझदार हो गई है अपनी पायल।अब इसे कभी चिढ़ाना मत, बेवकूफ कहकर।बहुत सीधी है, पर बेवकूफ नहीं। भाई नागपुर में प्राइवेट जॉब में था, तभी मां को बीमारी ने आ घेरा। देखते-देखते छह महीने के अंदर ही मां चल बसी।
मां की देखभाल की पायल ने ही।बिस्तर में ही मां को नित्य कर्म करवाया उसने।मां के गुजर जाने के बाद, मामा रुके थे पायल के साथ।भाई भी वापस चला गया।मंझली बहन भी ससुराल चली गई।अब मीना को भी लौटना था अपने घर।आते समय जैसे ही पायल को गले लगाया,
उसने जोर से भींच लिया मीना को, और धीरे से कहा” मैं तुम्हारे साथ चलूं दीदी?” उसकी धीमी आवाज में दबा हुआ दर्द मानो मीना स्पष्ट सुन सकती थी।मामा , मीना से चार साल ही बड़े थे।एक घर में पायल और मामा का रहना बिलकुल भी तर्क संगत नहीं था।
मीना ने पति अमित से जब पूछा , उन्होंने तुरंत सहमति जता दी।पायल खुशी-खुशी आ गई मीना के साथ।बहन की ससुराल में स्वछंद माहौल मिलना असंभव ही होता है।मीना की सास ने पायल को अपनी बेटी की तरह अपना लिया था,जो मीना के लिए बहुत बड़ा वरदान साबित हुआ।कंपनी के क्वार्टर में कमरे सीमित थे।एक में सास अपने पोते-पोतियों के साथ सोचतीं,दूसरे में मीना और उसके पति(अमित)।
मीना की सास पायल का खूब ख्याल रखती थी,पर यह उसका घर तो नहीं था।जो सबके लिए(खासकर बच्चों के लिए)बनता,वही वह खुशी-खुशी खाती।टी वी पर जो सीरियल सास देखती,वही उसे भी देखना पड़ता।कभी मुंह से कुछ ऐतराज नहीं किया उसने।मीना समझ सकती थी,पर कोई और चारा नहीं था।
एक बार भाई आया मीना के घर।मीना को कहा उसने”दीदी,बस कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास रखो पायल को।मेरा ट्रांसफर होने वाला है।जैसे ही मैं घर आ जाऊंगा,पायल आ जाएगी वहीं।भाई -बहन एक साथ रहेंगे।” उस दिन भाई की बात सुनकर पायल की आंखों की खुशी पलकों से छलक पड़ी।
सास ने भी देखा था पायल को रोते हुए,एक बहुत अच्छी सास ही ऐसा कह पाई भाई से”बेटा जल्दी से अब पायल के लिए लड़का ढूंढ़ना शुरू कर दो।तुम भाई -बहनों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है यह।फिर तुम भी शादी करोगे,तो बहनों का मायका नहीं छूटेगा।” अपनी सास की सोच पर मीना को आज और अधिक अभिमान हुआ।
मीना के स्कूल की सिस्टर से विनती कर उन्होंने ही पायल को भी स्कूल में नौकरी लगवा दी।हर महीने की तनख्वाह से पायल कुछ पैसे सास के हांथ में देती,बाकी वो खुद साथ चलकर पोस्ट ऑफिस में जमा करने लगी।अब पड़ गईं पीछे मीना के”ऐसे चुप चाप बैठे रहने से लड़का मिलेगा क्या?भाई भी ढूंढ़ रहा होगा,तुम भी ढूंढ़ो अब।” मीना की सांस अटका दी थी उन्होंने पायल की शादी की बात कर-कर।
मीना ने एक दिन भाई से फोन पर औपचारिक रूप से पूछा”भाई,यहां मेरी सास जिस तेजी से लड़कों की ढुंढ़ाई शुरू कर दी हैं, बिना पक्की करें नहीं मानेंगी।अब हमें शादी में होने वाले ख़र्च के बारे में गंभीर होकर सोचना पड़ेगा।मंझली बहन से भी करूंगी बात।बुआ से भी पूछूंगी।पर तू तो बता , तू कितना कर पाएगा? “
भाई ने बड़ी आसानी से कहा”तुम क्यों चिंता करती हो।मेरी सेविंग्स है।मां के कुछ गहने भी तो हैं,उन्हें तुड़वाकर नए डिजाइन के बनवा देंगे।पर हां दीदी,शादी में ज्यादा आडंबर नहीं करेंगे।मैंने एक नैकलेस किश्तों में बनवाना शुरू कर दिया है।तुम चिंता मत करो, सब ठीक से हो जाएगा।तुम और तुम्हारी सास पायल के लिए जो लड़का चुनोगी,
वही सबसे उत्तम होगा।मुझे इसमें कोई संशय नहीं।पायल हमारी सबसे छोटी बहन है, लाड़ प्यार से शादी करेंगे हम मिलकर।”आज पहली बार मन से बहुत बड़ा बोझ उतरा था।सच ही है, मैं बड़ी बहन के साथ-साथ मां हूं, बीवी हूं, बहू हूं, कितना ही कर पाऊंगी? पर भाई सचमुच पायल का सबसे बड़ा मित्र या गाइड है।उसके रहते किसी और के आगे हांथ फ़ैलाने ही नहीं पड़ेंगे।
अब शांति मिली मन को।अमित ,सास,और मीना जाकर पास में ही लड़का पसंद कर आए थे। उन्होंने भी आकर पायल को देखकर पसंद किया।शादी की बातचीत के लिए अमित के साथ ही जाती थी मीना।कभी सास भी चलतीं।मामला लगभग तय हो चुका था।कुछ विशेष मांग नहीं थी
उनकी तरफ से।बस शादी अपने यहां के एक होटल से करना चाहते थे।लड़के के पिता के अधिकतर रिश्तेदार बुजुर्ग थे,तो बस में हमारे अपने घर(कैमोर ) नहीं जाना चाहते थे।लड़के वालों ने तो हमारा घर ही बस देखा ।
तिथि को लेकर कुछ अड़चनें आ रहीं थीं, और तभी भाग्य का ऐसा संयोग हुआ कि, भाई के लिए मैरिज ब्यूरो से एक अच्छी लड़की का रिश्ता आया।मंझली बहन बीच में थी इस रिश्ते के।लड़के -लड़की ने आपस में एक दूसरे को पसंद भी कर लिया।भाई अपनी बड़ी बहन को मान देते हुए, होने वाले सास-ससुर को मीना के लेकर आया।इस शादी की बातचीत भी हुई।दोनों पक्षों में सहमति से बहन की शादी के बाद विवाह होना तय हुआ।
अब तो मीना के ऊपर दो -दो शादियों की जिम्मेदारी थी,बड़ी जो थी।एक दिन फिर भाई से गहनों के बारे में बात की,तो बोला”हां हैं ना लॉकर में कैमोर के बैंक में।ज्यादा नहीं हैं पर काम आ जाएंगे।अब मेरा ट्रांसफर भी होने वाला है।अगर हो गया ,तो पायल की शादी यहीं से करेंगे,अगर नहीं तो तुम्हें करनी पड़ेगी
अपने घर से।मेरी शादी में भी तो खर्च आएगा दीदी।सोचता हूं पास की जमीन बेच दें(बुआ की दी हुई)।मीना ने भी अपना गिरेबान झांका।छोटी बहन को तो देना ही होगा,पर बड़ी दीदी होने के नाते,छोटे भाई की पत्नी के नेंग तो भी देने होंगें।मीना ने स्कूल से लोन ले लिया,अमित की सलाह पर।हार तो बनवा ही रहा था भाई। बाकी के गहने मीना ही दे देगी।
यहां से लौटते ही भाई के ससुर ने शादी जल्दी करने का दवाब बनाना शुरू कर दिया,और इधर पायल की शादी का शुभ मुहूर्त ही नहीं मिल रहा था तब।
अब असली परीक्षा शुरू हुई भाई-बहन और मीना की।भाई तो जैसे लट्टू हो चुका था(सीमा पर)।होना भी लाजिमी था।कभी कोई लड़की दोस्त भी नहीं बना पाया वह। उसकी दोस्त उसकी मां और बहनें ही थीं।अब भाई के ससुर की आवाज में कातरता थीआदी जल्दी करने की,यहां पायल की शादी की तिथि निर्धारित होने में समय था।भाई अब ताना मरने लगा था
“तुम लोगों को क्या लगता है,शादी के बाद मैं क्या बदल जाऊंगा अपनी जबान से।उनके बारे में भी तो सोचना पड़ेगा ना हमें।तुम तो बड़ी हो,मेरी शादी के बाद मेरी बीवी तुम्हारे साथ मिलकर पायल की शादी की पूरी जिम्मेदारी लें लेगी। मैंने पहले ही बात कर ली है जॉली से।तुम राजी हो जाओ ना दीदी,सब ठीक होगा।
मां होती ना,तो वो पहले मेरी ही शादी करवाती।राजा की शादी पूरे राजकीय सम्मान के साथ ही होती।बैंड बाजा,रथ,कुछ भी नहीं छोड़ती मां।अब मां नहीं है ,तो कितना एडजस्ट करना पड़ रहा है।”
मीना के साथ यही एक बीमारी थी।दिखती बहुत कठोर थी,पर मन बहुत नरम ।अमित से विचार-विमर्श किया तो वे भी राजी हो गए कि साले की बारात पहले निकलेगी,फिर पायल की
होगी , धूमधाम से शादी अपने घर से।भाई की शादी की तिथि पड़ी फरवरी में,और पायल की पड़ी नवंबरमें।सास इस निर्णय से खुश नहीं थी।उनकी बार -बार की एक ही बात,लड़की की शादी पहले करो।बहू इस जुग में अपने खून का भी कोई भरोसा नहीं।कब रंग बदल दे क्या जाने? लड़की कीशादी ह़ो जाए,तब लड़का की करना। खर्च अनंत हो जाते हैं,पहली शादि में।पता थोड़े चलता है,पैसा कहां उड़ गया।”
उनकी वास्तविक व्यवहारिकता तब दिखाई देती।
अंत में वही हुआ।भाई की शादी पहले ही होनी तय हुई।सास की बातों से मीना के मन में भी चिंता समाने लगी। ऐसा नहीं था कि भाई की शादी की खुशी नहीं हो रही थी,पर सास के अनुसार पहली शादी में यदि अनर्थक खर्च बढ़ गया ,तो उसका असर पायल की शादी में दिखेगा ही।इन सबके बावजूद, पायल बड़ी खुश लग रही थी।मीना ने छेड़ते हुए पूछा” तेरी शादी तो कई महीनो़ बाद है,फिर खुशी के पीछे दुख छिपा रही है तू क्या?
चिंता मत करना।तेरी शादी बहुत अच्छी तरह होगी।तब उसने कहा “,दीदी,अभी भाई की शादी की खरीदारी करते हैं।भाभी के लिए साड़ियां,सूटकेस, कास्मेटिक सब जबलपुर से ले लेंगे।मैंने एक अंगूठी बनवाई थी,भाभी को वही दे देंगे।भाई ने जो नेकलेस बनवाया है,भाभी को ही देना तुम।पराए घरकी लड़की हमारी भाभी बनकर आएगी,उनसे ही हमारा मायका बना रहेगा।मेरे लिए तो अभी समय है।”,
उसकी बातों ने आंखों में पानी ला दिया।ये निःस्वार्थ प्रेम तो था उसका पर साथ में भाई-भाभी के साथ अपने घर में रहने का मोह भी था,और खुशी भी।
भाई की शादी में जो बन पड़ा दोनों क्या तीनों बहनों ने किया।बहू का शरीर गहनों से भर गया।मायके से भी मिले थे गहने।शादी के बाद घूमकर वापस आकर पायल को हमेशा के लिए अपने साथ ले जाएंगे,ऐसा वादा दोनों पति पत्नी ने किया था।शादी में अनर्थक ख़र्च इतने हुए कि बजट से ज्यादा की पड़ी शादी।
बैंड-बाजा,और भी दिखावा करने के चक्कर में सेविंग्स पूरी खत्म होने की कगार पर थी। रिसेप्शन में नॉनवेज की ऐसी मारामारी हुई,मिठाई लोग बाल्टी में भर कर घरों में ले गए।ससुराल वालों ने समय से पहले ही विदा कर दिया था बेटी दामाद को। खर्च की कॉपी बनाकर मीना ने रखा था अपने पास।घटता बैलेंस देखकर मीना का सर चकराने लगा।अब इस समय तो बड़ी होकर भी कुछ बोल नहीं सकती ना।
मीना के बोलने के इंतजार में ही था भाई।बहन के लिए बनवाए हार को सहर्ष ही अपनी पत्नी को भेंट के रूप में दे दिया।जो गहने उसने बनवाए थे वो भी मां के लाकर से लाकर,तुड़वाकर ।मतलब अब पायल के लिए ना तो कोई जमा-पूंजी बची,ना ही गहने।मीना को इस बात से बहुत दुख भी हुआ।
शादी के बाद अब भाई से कुछ पूछना उचित नहीं लगा।खैर,शादी संपन्न हुई।सब लौटने लगे अपने-अपने घर,मीना ने पायल की तरफ देखा,तो उसने कहा”,दीदी,अब मैं यहीं रहूंगी। भैया-भाभी के पास।तुम लोगों को बहुत परेशानी झेलनी पड़ी मेरी वजह से।यहां स्कूल में नौकरी भी मिल जाएगी।
तुम चिंता मत करना।मैं अच्छी तरह से भाभी के साथ रहूंगी।काम में भी हांथ बटाऊंगी।”पायल की पीड़ा का अब अंत होना था।सच ही तो है,अपने घर में हम अपने मन का कुछ भी कर सकते हैं,पर दूसरों के यहां पल-पल परीक्षा ही देनी पड़ती है।मीना खुश थी पायल को लेकर।अब तो बारात भी वहीं जाएगी।आस पड़ोस और पहचान वाले बहुत सारे कामों में अपना योगदान देते न हैं।
मीना सास को लेकर ही गई थी।घर पंहुचते ही सास ने फिर से शादी की खर्च की बात शुरू ही की थी,कि मीना ने रोक दिया”मां,वो हमारा है तो भाई।अपनी बहनों की भलाई के लिए वो कुछ भी कर सकता है।थोड़ा राजसी ठाठ है उसमें,पर बहुत प्यार करता है पायल से।
पायल को गए अभी आठ ही दिन हुए थे,तभी दृढ़ निश्चय के साथ फोन पर कहा उसने “दीदी,मैं वापस आ सकती हूं क्या?वहीं रह लूंगीं।यहां थोड़ी परेशानी हो रही दादा -भाभी को।अभी नई नई शादी हुई है लेकिन मेरी वजह से दोनों अकेले में साथ नहीं रह पाते।बड़ा अटपटा सा लग रहा है मुझे।
” मीना ने पूछा”और कोई बात तो नहीं ना?”उसने हंसते हुए कहा” नहीं दीदी,कोई और बात नहीं।”मीना ने अमित को बताया पायल के आने के विषय में।थोड़ी देर वे चुप रहे ,फिर कहा बुला लो।अगले ही दिन जितने बैग भरकर गई थी,अपनी शादी की कुछ खरीदारी के साथ,वैसे ही बैरंग लौटी वह।
वहां से यहां तक कि एक साड़ी भी भाभी ने विदा करते हुए नहीं दिया।मीना का माथा तो ठनक चुका था।अब फिर से पायल मीना के स्कूल में जाने लगी।
अब फिर से शादी के खर्चो को लेकर बातें होने लगीं।मीना ने पहले ही लोन ले लिया था।अमित का पिछला लोन बकाया था।तब मीना ने बुआ से मिलकर खाली पड़ी जमीन बेचने की बात की। उन्होंने सीधे तौर पर कह दिया”हम और कुछ नहीं दे पाएंगे।बिस्तर और गद्दा देंगे।जमीन बेचकर यदि शादी करनी है ,तो जैसा तुम लोगों को ठीक लगे।”
अब मीना का अगला पड़ाव था जमीन बेचना।खरीददार ढूंढ़ रखा था भाई ने।पड़ोसी ही लेना चाहता था।औने-पोने भाव में सौदा हुआ।उसी पैसों से शादी निपटाना था।
कागजात में साइन करते समय भाई ,जो कभी बहन के लिए कुछ भी करने को तैयार था,ने कहा”दीदी,मुझे इस जमीन का तो पूरा हिस्सा मिलना चाहिए।छोटी बुआ ने मेरे नाम लिखी थी।पर पायल की शादी में बेचनी पड़ी।इसमें से दो लाख मुझे चाहिए।एक अच्छी बाईक लूंगा।जॉली को कहीं ले जाने में दिक्कत होती है।
और घर का रेनुएशन भी करवाना है।” मीना के शरीर में अंगारे लोटने लगे।इतना ही कह पाई”भैया बस एक बार इसकी शादी हो जाए अच्छे से,फिर जो भी पैसा बचेगा तू और मंझली बहन ले लेना।अभी हमारे पास कुछ भी नहीं है।सब खरीदना पड़ेगा। तूने तो शादी यहां से करने से मना कर दिया,
तो वहां होटल का भी खर्च ज्यादा ही होगा।खैर!चल हम सभी भाई बहन मिलकर चलतें हैं जबलपुर।वहीं से गहने और कपड़े ले लेंगे।दस दिन का समय बचाहै बस।भाभी निर्विकार ही रहीं।रास्ते में जबलपुर पहुंचते ही भाई ने कहा”सुन ना दीदी,तुम लोग शॉपिंग कर लो।मुझे तो ससुराल जाना पड़ेगा।
सासू मां ने हिलसा बनाकर रखा है मेरे लिए।मैं वहीं से निकल जाऊंगा वापस कैमैर।तुम लोग कल अपने घर चले जाना।” मन कड़वा हो गया था अब मीना का।अब तो सब अच्छा ही खरीदेगी पायल के लिए।
शॉपिंग करके आते ही पैकिंग भी कर दी मीना की बेटी ने।मौसियां आईंथीं कलकत्ता से।शादी की तैयारीहोटल में देखकर बहुत खुश हुईं।बोलीं भी”तेरी मां भी होती तो, इतनी अच्छी व्यवस्था नहीं कर पाती। बहुत बढ़िया तैयारी की है मीना,तूने शादी की।तय तिथि को हम लड़के वालों के यहां होटल में पहुंच गए थे।
भाई दोपहर में आया पर अकेला।भाभी की जरूरत नहीं पड़ेगी,ऐसा बोला उसने। कन्यादान उसी से करवाया।सुबह होते ही जाने के लिए तैयार होने लगा वह।उसे अब और कुछ बोलना व्यर्थ था।मीना इतना ही बोली” भाई शादी का कुल खर्च जो भी आया ,उसे चुकाने के बाद ज्यादा पैसे बचेंगे नहीं। तुम्हारी गाड़ी कुछ महीनों बाद ले लेना।बस आशीर्वाद देकर विदा करो,छोटी बहन को।
चिढ़ तो गया था वह पैसे ना बचने की बात पर,बार भी आशीर्वाद दिया उसने नव वर वधू को।पगफेरे में पायल को अपनी दीदी के घर ही आना पड़ा(यही उसका मायका था)।इन वादियों से वैसे सीख तो कई मिलीं,पर जो सबसे
बड़ा तजुर्बा हुआ,वह भाई के बारे में।पत्नी को मीना दोष देना नहीं चाहती।खून का रिश्ता तो भाई के साथ है ना।वह कैसे अपनी बहन की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ सकता है?इसके सामने तो बाहर के शत्रु की ताकत कम है।
शुभ्रा बैनर्जी
#भाई से बड़ा कोई मित्र नहीं ना भाई से बड़ा शत्रु