सम्मान या अधिकार – एम. पी. सिंह

रानू की रोमिल से शादी हुई तो वो छोटी बहु बनकर ससुराल पहुंची. संयुक्त परिवार मैं सास ससुर और जेठ जेठानी थे.

रोमिल एक पढ़ा लिखा इंजीनियर था और घर परिवार भी अच्छा था. रानु एक पढ़ी लिखी संस्कारी लड़की होने के साथ साथ खाना बनाने मैं भी माहिर थीं इसलिए आते ही घर में सबका दिल जीत लिया सिवाय बड़ी भाभी के। 

कल तक घर में भाभी कीर्ति की इम्पोर्टेंस थी, पर अब रानू को ज्यादा अहमियत मिलने लगी थीं. 

रानू की जेठानी कीर्ति कम पढ़ी लिखी थीं पर पैसे वाले बाप की बेटी थीं, इसलिए उसकी बातो मैं थोड़ा अहंकार छलकता था. 

वो बड़ी बहु होने का और बड़प्पन दिखाने का मौका नहीं चूकती थीं. 

कीर्ति अपने सास ससुर को भी ज्ञान देती रहती थीं, आप दोनों सुबह शाम घूमने जाया करो, घर के छोटे मोटे काम खुद किया करो, हाथ पैर चलते रहेंगे आदि. रानु को भी अक्सर टोकती रहती की तुम खाने मैं तेल ज्यादा डालती हो, नमक कम खाया करो आदि. 

रानू भाभी की इन्ही बातो से थोड़ा परेशान रहती थी। समय बीतता गया और रानू सबके साथ घुल मिल गई. 

रानू सुबह सबसे पहले उठती, चाय बनाती, मॉ बाबूजी को पिलाती, जेठ जेठानी की चाय केतली मैं रख देती ओर उसके बाद पति को  उठाती और दोनो साथ मे चाय पीते। 

कीर्ति देर से उठती और उठते ही कहती, रानू, आज चाय मैं मजा नहीं आया, ठंडी हो गई थीं, दुबारा बना दो, वगैरह वगैरह.

 नाश्ता सब लोग साथ मे करते और फिर आफिस के लिए निकल जाते। रानू सारे घर ओर घर वालों का अच्छे से खयाल रखती, फिर भी चेहरे पर कोई शिकन नही आती।

मॉ जी, सब्जी क्या बनाऊ, बाई की आवाज सुनकर रानू किचन मैं आई और बोली, अरे बाई, तुझे कितनी बार कहा है कि सुबह सुबह मॉ जी को परेशान मत किया कर, मैं आ रही हूं। एक दिन मोहल्ले कि कुछ औरते घर आई तो कीर्ति ने दरवाजा खोला,  नमस्ते आदि के बाद वो बोली  की कल मंदिर में शाम 4 बजे से पूजा है, आप सभी लोग आए. 

अगले दिन पूजा पर मंदिर जाने के लिए रानू ने सूट पहना तो कीर्ति ने साड़ी पहनने कि जिद कि, नई बहु हो साडी पहनो. न चाहते हुए भी रानू ने सूट उतारकर साड़ी पहन ली.

ऐसे ही समय बीतता ज्ञान और फिर एक दिन रानु ने मॉ जी से कहा, मम्मी पापा की याद आ रही है, 2 – 4 दिन के लिए मायके हो आती हूँ,  मॉ जी बोली, ठीक है.

रानू ने मायके जाने के लिए अपना सूटकेस पैक करने के लिए कपड़े एक जगह इकट्ठा करके रख दिए. कीर्ति ने रानू के कमरे मैं कपड़ो को देखा और पूछा तो रानू ने बताया कि वो मायके जा रही है. कीर्ति ने एक एक करके सारे कपड़े हटा दिए, ये कहते हुए कि ये पुराने फैशन का ही, इसका रंग डार्क है, ये गर्मी करेगा आदि. कबोर्ड से सारे नये कपड़े निकल कर सूटकस मैं डाल दिए.

शाम को रानू ने माँ जी कोई बताया तो वो बोली, रात क सूटकेस फिर से अपने हिसाब से लगा लेना, जाने मैं अभी टाइम है.

जब रोमिल ऑफिस से आया तो रानू ने सारी बातें बताई. रोमिल बोला, भाभी कुछ समझती ही नहीं है, और भईया भी कुछ नहीं कहते, मैं माँ से बात करता हूँ, वो ही भाभी को समझेगी.

रोमिल ने माँ से सारी बात बताई और कहा कि भाभी भी बातो से रानू को बुरा लग रहा है पर कुछ बोलती नहीं, अब आप अपने हिसाब से समझा देना.

मायके जाने से पहले एक दिन शॉपिंग करने के लिए रोमिल शाम को जल्दी आ गया. रानू ने अपने लिये काली साड़ी और रोमिल के लिए काला सूट लिकला. रानू और रोमिल जाने लगे तो कीर्ति बोली, रोमिल, ये क्या काला सूट पहना है, बदलो इसे, बाहर बहुत गर्मी है. कीर्ति की बात सुनकर रानू का खून खोल गया. माजी बीच मैं बोली, रोमिल, जल्दी जाओ, नहीं तो लौटने मैं देर हो जायेगी. रोमिल रानू जाने लगे तो कीर्ति फिर बोली, मगर काला सूट, माँ जी ने डांट कर बोला, जल्दी जाओ.

रानू के जाने के बाद सासू माँ बोली, कीर्ति, तुम घर मैं हर किसी के काम मैं दखल अंदाजी करती थीं तो एक बार चल जाता था, अब तुम दूसरों के मर्द हो भी बताओगी कि क्या पहने, क्या न पहने? तुम्हे इतनी तो तमीज़ होनी चाहिए कि किसको क्या बोलना है. 

माँ जी मैं घर कि बड़ी बहू हूँ, दूसरों को सही गलत क्या है ये बताना मेरा अधिकार है. 

कैसा अधिकार! बड़ी बहू होना सम्मान है अधिकार नहीं 

माँ जी बोली, दूसरों कि गलतियां बताने से तुम्हारी गलतियां  छुप नहीं जाती. पहले अपने आप को सुधारो फिर दूसरों को सुधारना.

ससुराल में अक्सर बड़ी बहू अपना अधिकार जमाने की कोशिश मैं अपना फ़र्ज़ भूल जाती है

धन्यवाद 

वाक्य कहानी प्रतियोगिता 

वाक्य -बड़ी बहू होना सम्मान है अधिकार नहीं 

लेखक

एम. पी. सिंह

(Mohindra Singh)

स्वरचित, अप्रकाशित

error: Content is protected !!