अस्पताल की सफेद, ठंडी दीवारों के बीच एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी, जिसे सिर्फ वेंटिलेटर की एकरस ‘बीप-बीप’ की आवाज़ ही तोड़ रही थी। आईसीयू के बाहर, कांच की दीवार से माथा टिकाए विक्रम खड़ा था। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए थे और चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता थी। कांच के उस पार, उसकी दुनिया, उसकी पत्नी नंदिनी, ढेरों नलियों और तारों से घिरी पड़ी थी। ऐसा लग रहा था मानो वह किसी गहरी, कभी न खत्म होने वाली नींद में सो गई हो।
तभी पीछे से किसी ने विक्रम के कंधे पर हाथ रखा। वह उसका बचपन का दोस्त और उसी अस्पताल का सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट, डॉ. समीर था। समीर की आँखों में दोस्त के लिए दर्द था, लेकिन एक डॉक्टर की बेबसी भी।
“विक्रम, मेरी बात समझने की कोशिश कर,” समीर ने विक्रम को अपनी ओर घुमाते हुए बहुत ही नरम स्वर में कहा। “यहाँ जो भी हो सकता था, हमने कर लिया है। ये मेडिकल साइंस का बेस्ट ट्रीटमेंट है। तू चाहे तो नंदिनी को अमेरिका ले जा, लेकिन मेडिकल प्रोटोकॉल के हिसाब से अब हम सिर्फ इंतज़ार कर सकते हैं। उसके ब्रेन ने रिस्पॉन्ड करना बंद कर दिया है। मैं तुझे एक डॉक्टर की हैसियत से नहीं, बल्कि तेरा भाई समझ कर कह रहा हूँ… तुझे अब सच का सामना करना होगा। खुद को सँभाल मेरे दोस्त।”
विक्रम ने झटके से समीर का हाथ हटा दिया। “तू डॉक्टर है समीर, भगवान नहीं! तू कैसे कह सकता है कि सब खत्म हो गया? मैं उसे ऐसे मरने नहीं दूँगा।”
तभी पास ही खड़ा नंदिनी का छोटा भाई, रोहन, आगे आया और उसने विक्रम को सहारा देने की कोशिश की। “जीजू, समीर भैया सही कह रहे हैं। दीदी को आईसीयू में ऐसे तड़पते देखना हम में से किसी के लिए भी आसान नहीं है। आप प्लीज हिम्मत रखिए।”
विक्रम ने रोहन की तरफ देखा, उसकी आँखें लाल सुर्ख हो रही थीं। वह बिना कुछ कहे वहीं ज़मीन पर बैठ गया और अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। आज चौथा दिन था। चार दिन पहले तक सब कुछ कितना सामान्य था। वे दोनों अपनी शादी की तीसरी सालगिरह मनाने के लिए एक हिल स्टेशन की ट्रिप प्लान कर रहे थे। फिर अचानक वह कार एक्सीडेंट… और उसके बाद से विक्रम की दुनिया जैसे ठहर सी गई थी।
अस्पताल के वेटिंग एरिया में नंदिनी और विक्रम के सारे रिश्तेदार जमा थे। माहौल में एक बोझिल सी उदासी थी। कोई धीरे-धीरे रो रहा था, तो कोई भगवान को कोस रहा था। नंदिनी की ताईजी, जो उम्र में काफी बड़ी थीं, वे आँसू पोंछते हुए बड़बड़ा रही थीं, “अरे भगवान, कैसी लीला है तेरी! हम जैसे बूढ़ों को क्यों नहीं उठा लेता? इस बच्ची ने तो अभी दुनिया देखी ही कहाँ थी। अभी तो इसकी गोद भी सूनी है, और तूने इसे बिस्तर पर डाल दिया। क्या बिगड़ा था इसका?”
रिश्तेदारों की ये फुसफुसाहटें विक्रम के कानों तक पहुँच रही थीं और उसके सीने में जैसे सीसे की तरह उतर रही थीं। तभी नंदिनी की बुआ, जो हमेशा से थोड़ी व्यावहारिक और स्पष्ट बोलने वाली महिला रही थीं, वे अपनी जगह से उठीं और विक्रम के पास आईं। उन्होंने विक्रम के पास ज़मीन पर बैठकर उसके कंधे को सहलाया।
“बेटा विक्रम,” बुआ ने भारी आवाज़ में कहा, “मैं जानती हूँ तुम पर क्या बीत रही है। लेकिन हमें भी अपनी बच्ची की ये हालत नहीं देखी जाती। डॉक्टर भी जवाब दे रहे हैं। अब तुम अपने दिल को कड़ा करो और नंदिनी को और तकलीफ मत दो। उसके शरीर को इन मशीनों के सहारे कब तक बांध कर रखोगे? उसे शांति से जाने दो… उसे घर ले चलो बेटा।”
बुआ के ये शब्द सुनते ही विक्रम जैसे किसी गहरी नींद से झटके से जाग गया। उसकी आँखों में एक अजीब सी आग थी। उसने बुआ की तरफ देखा और तरेरते हुए बोला, “ये आप क्या कह रही हैं बुआजी? आप लोग कैसे इतनी आसानी से उम्मीद छोड़ सकते हैं? वो मेरी पत्नी है, मेरी ज़िंदगी है! मैं उसे घर तब तक नहीं ले जाऊँगा जब तक वो अपने पैरों पर चलकर नहीं जाती। आप लोगों को रोना है तो बाहर जाकर रोइए, मेरी नंदिनी कहीं नहीं जा रही है।”
बुआ चुप हो गईं और वहाँ से हट गईं। विक्रम की ज़िद को देखकर सब उसे पागल समझने लगे थे। लेकिन विक्रम के लिए यह सिर्फ ज़िद नहीं थी, यह उसका विश्वास था।
रात गहरी हो चुकी थी। रिश्तेदार धीरे-धीरे घर लौट गए थे। सिर्फ विक्रम और रोहन अस्पताल में रुके थे। विक्रम आईसीयू के कांच के पास एक कुर्सी खींच कर बैठ गया। उसने नंदिनी को देखा। उसका पीला पड़ा चेहरा, वो होंठ जो हमेशा मुस्कुराते रहते थे, आज एकदम शांत थे। विक्रम को याद आया कि एक्सीडेंट से ठीक पहले नंदिनी ने उससे क्या कहा था। उसने कहा था, “विक्रम, चाहे कुछ भी हो जाए, हमारा साथ कभी नहीं छूटेगा।”
विक्रम ने मन ही मन खुद से वादा किया कि वह उस वादे को टूटने नहीं देगा।
अगले दिन सुबह, डॉ. समीर राउंड पर आए। उन्होंने नंदिनी के मॉनिटर चेक किए और निराशा से सिर हिलाया। विक्रम वहीं खड़ा था। “कुछ सुधार है समीर?” उसने उम्मीद भरी नज़रों से पूछा।
समीर ने एक लंबी साँस ली, “नहीं विक्रम। बल्कि उसके वाइटल्स और गिर रहे हैं। मुझे लगता है हमें वेंटिलेटर हटाने के बारे में सोचना चाहिए। इट्स टाइम टू लेट हर गो (उसे जाने देने का वक्त आ गया है)।”
“बिल्कुल नहीं!” विक्रम लगभग चिल्ला पड़ा। “जब तक उसकी साँस चल रही है, मशीन नहीं हटेगी। तुम अपना काम करो, मैं अपना काम करूँगा।”
विक्रम ने अब एक नया रास्ता चुना। वह पूरा दिन नंदिनी के पास बैठा रहता (जितना भी आईसीयू में अंदर जाने की इजाज़त मिलती)। वह उसका हाथ अपने हाथों में लेकर उससे बातें करता रहता। वह उसे उन सारी जगहों के बारे में बताता जहाँ वे छुट्टियाँ बिताने जाने वाले थे। वह उसे उसके पसंदीदा गाने सुनाता। कई बार नर्से उसे अजीब नज़रों से देखतीं, लेकिन विक्रम को किसी की परवाह नहीं थी।
एक दिन, जब विक्रम नंदिनी के पास बैठा था, उसने अपने मोबाइल पर नंदिनी की फेवरेट फिल्म का एक गाना बजाया और उसके कान के पास रख दिया। गाना सुनते-सुनते विक्रम रोने लगा। उसके आँसू नंदिनी के हाथ पर गिर रहे थे। “नंदू… प्लीज वापस आ जाओ। मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता। तुमने वादा किया था कि हम साथ रहेंगे। तुम ऐसे हार नहीं मान सकती।”
विक्रम लगातार बोल रहा था, तभी… एक चमत्कार हुआ।
विक्रम को लगा जैसे नंदिनी की उंगलियों में कोई हरकत हुई हो। उसने अपने आँसू पोंछे और गौर से देखा। हाँ, नंदिनी की तर्जनी उंगली हल्की सी हिली थी। विक्रम का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसने तुरंत भागकर समीर को बुलाया।
समीर ने आकर चेक किया। पहले तो उसे लगा कि शायद यह कोई इंवोलंटरी मूवमेंट (अनैच्छिक हरकत) है। लेकिन जब उसने नंदिनी के पैरों के तलवों पर एक छोटा सा टेस्ट किया, तो नंदिनी का पैर थोड़ा सा सिकुड़ गया। समीर की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने मॉनिटर की तरफ देखा, ब्रेन वेव्स में एक हल्का सा स्पाइक (उछाल) आया था।
“दिस इज़ अनबिलीवेबल! (यह अविश्वसनीय है!)” समीर बुदबुदाया। उसने विक्रम की तरफ देखा, “विक्रम… शी इज़ रिस्पॉन्डिंग। (वह प्रतिक्रिया दे रही है)। ये बहुत छोटा सा बदलाव है, लेकिन यह एक उम्मीद की किरण है।”
विक्रम के पैरों तले ज़मीन लौट आई। वह वहीं ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया और रोने लगा, लेकिन इस बार ये खुशी के आँसू थे। उसने कर दिखाया था। उसके प्यार ने विज्ञान की सीमाओं को पार कर लिया था।
अगले एक महीने तक विक्रम का संघर्ष जारी रहा। नंदिनी की हालत में बहुत धीरे-धीरे सुधार हो रहा था। पहले उसने आँखें खोलीं, फिर उंगलियाँ हिलाईं। उसे आईसीयू से प्राइवेट वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया। जब पहली बार नंदिनी ने अपनी आँखें पूरी तरह खोलीं और सामने विक्रम को देखा, तो उसके होंठों पर ऑक्सीजन मास्क के पीछे भी एक कमज़ोर सी मुस्कान थी। उसने विक्रम का हाथ कसकर पकड़ लिया, जैसे कह रही हो कि वह भी वापस आना चाहती थी।
रिश्तेदार, जो कुछ दिन पहले उसकी मौत का इंतज़ार कर रहे थे, अब भगवान का चमत्कार देखकर हैरान थे। बुआजी ने जब नंदिनी को वॉर्ड में देखा, तो वे विक्रम के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गईं। “मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं उम्र में बड़ी ज़रूर हूँ, लेकिन प्यार की ताकत क्या होती है, यह आज मैंने तुझसे सीखा है।”
डॉ. समीर ने भी मान लिया कि मेडिकल साइंस हर बार सही नहीं होती। कभी-कभी दुआओं और अटूट विश्वास में वो ताकत होती है जो मशीनों में नहीं होती।
छह महीने बाद।
अस्पताल का मेन गेट खुला। विक्रम ने एक व्हीलचेयर को बाहर की ओर धकेला। उस पर नंदिनी बैठी थी। उसके चेहरे पर अब वो पुरानी चमक लौट आई थी। हालाँकि उसे पूरी तरह ठीक होने में अभी और वक्त लगने वाला था, लेकिन वह खतरे से बाहर थी। रोहन और बाकी परिवार वाले बाहर उनका इंतज़ार कर रहे थे। विक्रम ने नंदिनी को अपनी गोद में उठाया और कार की फ्रंट सीट पर बैठाया।
कार में बैठते हुए नंदिनी ने विक्रम की तरफ देखा और बहुत ही धीमी, लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा, “थैंक यू… मुझे वापस लाने के लिए।”
विक्रम ने मुस्कुराते हुए उसका माथा चूमा, “मैंने तो बस तुम्हें रास्ता दिखाया था, लौटी तो तुम अपनी ज़िद से हो।”
कार घर की तरफ चल पड़ी। पीछे छूट गया था वो अस्पताल, वो निराशा, और वो खौफनाक रातें। आगे सिर्फ उम्मीद थी, एक नई ज़िंदगी थी, जिसे मौत भी नहीं हरा पाई थी।
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