यह कलंक कभी ना मिटेगा। – मधु वशिष्ठ

“आप थक गए होगे अब थोड़ी देर गाड़ी मैं चला लेता हूं, आप पापा के पास आकर बैठ जाओ|”

बहुत समय बाद रजत और रमन अपने पिता के साथ गाड़ी में अकेले ही जा रहे थे| दिल्ली की पॉश कॉलोनी में एक दो मंजिला घर, जिसमें कि दोनों भाई ऊपर नीचे रहते थे| हालांकि वर्मा जी ने पूरी कोशिश करी थी कि दोनों भाइयों को सब कुछ बराबर मिले और वह प्रेम से रहें लेकिन ईर्ष्या और लालच में बंधी हुई दोनों भाइयों की पत्नियां घर के प्रत्येक कोने में अपना अधिकार ही जमाती दिखती थीं| भाइयों का प्यार भी उनकी इस ईर्ष्या की अग्नि में स्वाहा हो चुका था|

ज्यों ज्यों वर्मा जी की कमजोरी और उनके भूलने की आदत बढ़ती जा रही थी, त्यों त्यों सब उनके रिटायरमेंट के पैसों का फिक्स डिपॉजिट और लॉकर के बारे में जानने के इच्छुक थे| इस बढ़ते तनाव को वर्मा जी बखूबी समझते थे और नहीं चाहते थे कि उनकी मृत्योपरांत घर का कोई भी तमाशा दुनिया के लिए दर्शनीय हो|

उन्होंने एक दिन दोनों बेटों को अपने पास बुलाया और कहा बेटा मैं अब सब कुछ तुम्हें दिखा कर निश्चिंत होना चाहता हूं| हमें गांव गए काफी साल हो गए हैं, मैं वहां जाकर तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं| कोई भी दूसरे भाई को अकेला भेज कर पिताजी के गांव में रखें सामान के राज से वंचित नहीं होना चाहता था इसलिए दोनों ही इस शनिवार को गाड़ी लेकर पापा के साथ गांव की ओर चले|

पापा को पीछे सीट पर बिठाकर दोनों भाई बारी बारी गाड़ी चला रहे थे| इतने समय बाद तीनों साथ होने पर अपने उस समय को याद करते हुए जा रहे थे  जब वह दोनों कार में पीछे शैतानी करते हुए ऐसे ही घूमा करते थे| गांव पहुंचने तक पुरानी बातें करते हुए उनका पुराना प्रेम भी जागृत हो गया था|

नितांत जर्जर, जाले लगे हुए, खंडहर अवस्था में उस घर को देखकर रजत और रमन हैरान हो उठे| घर के बाहर सारे में खरपतवार भी उगा आई थी | टूटे हुए दरवाजे को खोलने में जरा भी जोर नहीं लगा| पापा उसी खंडहर में टूटी कुर्सी पर बैठकर बच्चों के जैसे जोर जोर से रो दिए| उन्होंने अपने दोनों बेटों को बताया कि इसी गांव में तुम्हारे जैसे हम दोनों भाई भी अपने माता-पिता के साथ रहते थे| हमारी बहुत सी खेती की जमीन भी थी| शादी के बाद तुम्हारी मां और चाची में भी तुम दोनों की पत्नियों के जैसे ही लड़ाई रहती थी| जब सरकार द्वारा भूमि एक्वायर होने का अंदेशा आया तो मैंने अपने पिता से उस भूमि को अपने नाम करवा लिया और छोटे भाई को यह घर दिलवा दिया था| भूमि एक्वायर होने के बाद जब चेक मेरे नाम आया तो मैं उसे लेकर दिल्ली में आ गया और वहीं घर खरीद लिया| अपनी तरफ से यह मेरे द्वारा की गई सबसे बड़ी समझदारी थी| मेरे बाद छोटा भाई भी अपनी पत्नी के साथ, उसकी बहन के पति जो कि दुबई में रहकर व्यापार करते थे, उनके पास चला गया और गुस्से में आकर उसने अपना पता भी किसी को नहीं बताया|

मुझे दिल्ली में सरकारी नौकरी मिल गई थी| उधर गांव में माता पिता अकेले और असहाय अवस्था में आ गए थे| छोटे भाई के देश छोड़कर जाने का कारण भी वह मुझे ही मानते थे| इसलिए वह दोनों कभी मेरे पास भी नहीं आए| तुम्हारी तरह जवानी के नशे में चूर हम दोनों पति पत्नी भी अपने तर्क लेकर अपने आप को निर्दोष ही मानते थे| दुबई से छोटा भाई पिताजी के पास पैसे भेजता था, लेकिन वह कभी उनसे मिलने के लिए नहीं आया| मृत्यु के समय भी मां की आंखें सिर्फ छोटे भाई को और उसके परिवार को ही ढूंढ रही थीं| मां की मृत्यु के बाद मैंने बहुत कोशिश करी कि बाबूजी मेरे पास आ जाएं लेकिन वह कभी नहीं आए|

छोटा भाई दोनों की मृत्यु पर भी घर नहीं आया था| सारे संस्कार करते हुए मैं बेहद अकेला पड़ गया था| शायद ऐसा ही कोई दुख तुम्हारी मम्मी के कैंसर का कारण बना| आज बाबूजी की जगह में मैं बैठा हूं| ना तो मैं अपने आप को माफ कर पाता हूं और ना ही बाबूजी और मां की घूरती नजरों से अपने आप को बचा पाता हूं| मुझे क्या मिला यह तो सबको दिख रहा है, लेकिन मैंने क्या खोया, तुम यह जान जाओ तो शायद मेरी आत्मग्लानि कुछ कम हो जाए| पुरानी यादें मुझे पागल करे दे रही है| आज तुम्हारी मां और अपने भाई के बिना मैं  खुद को बहुत अकेला महसूस करता हूं| परमात्मा ना करें अपने लालच के वशीभूत तुम्हें भी कभी ऐसा दिन देखना पड़े|मेरा तो यह कलंक कभी ना मिटेगा।

मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगा कि तुम दोनों को सब कुछ बराबर मिले लेकिन अगर कहीं कुछ कम ज्यादा भी हो जाए तो प्यारे बच्चों एक दूसरे के प्रति अपने प्यार में कमी ना लाना| बाबूजी शून्य में अपनी यादों में खोए उस खंडहर घर के हर कोने को निहार रहे थे| तभी पड़ोस से चचेरा भाई सतीश कुछ कुर्सियां और चाय लेकर आया| पापा के पैर छूकर उसने सबसे अपने घर आने का अनुरोध किया| उसने बताया कि चाचाजी भी बाबू जी की मृत्यु के बाद एक बार गांव आए थे|

पापा अभी भी शून्य में ही निहार रहे थे| रजत और रमन ने उन्हें प्यार से उठाया और कहा “घर चलो पापा, सब ठीक हो जाएगा”|

सतीश से पूछ कर उन्होंने चाचा जी के बारे में जानने की कोशिश करी और मन ही मन दोनों यह प्रण भी कर रहे थे कि हो सका तो पापा को और चाचा जी को एक बार जरुर मिलवाएंगे|

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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