“मीरा, आज कंपनी की फाउंडेशन डे पार्टी है, मेरे सम्मान में स्पेशल अवॉर्ड भी मिलने वाला है… शाम को जल्दी तैयार रहना, ऑफिस से लौटकर फ्रेश होकर सीधे क्लब चले जाएँगे,”
आरव ने ड्रॉअर से अपनी घड़ी उठाते हुए कहा।
मीरा चहक उठी,
“सच में? वाह, ये तो बहुत बड़ी खुशखबरी है! तुम्हारे साथ चलूँगी, मुझे भी अच्छा लगेगा… नए लोगों से मिलना, तुम्हारी खुशी शेयर करना…”
आरव ने ठहाका लगाया, पर उस हँसी में अपनापन नहीं, ताना छुपा था।
“मीरा, तुम भी न… मज़ाक मत किया करो यार। तुमने आईने में खुद को देखा है? कॉर्पोरेट पार्टी में सब स्मार्ट, स्टाइलिश लोग आते हैं, और तुम… तुम्हें लेकर जाऊँगा तो लोग हँसेंगे कि आरव की तो किस्मत ही खराब निकली। पिछली बार एंगेजमेंट के बाद कंपनी की स्मॉल गेट-टुगेदर में ले गया था ना तुम्हें? याद है, सब कैसे तुम्हें घूर रहे थे?”
मीरा ने हल्की मुस्कान संभालने की कोशिश की,
“मुझे तो किसी ने सीधे मुँह कुछ नहीं कहा…”
“सीधे मुँह कौन कहता है!” आरव ने मोबाइल उठाते हुए कहा,
“बाद में लड़कों ने मज़ाक उड़ाया—
‘यार, तू तो इतना हैंडसम है, तुझसे ये उम्मीद नहीं थी!’
तुझे अच्छा लगेगा कि फिर वही सब सुनूँ? मुझे अपने इमेज की भी तो फिक्र है।”
मीरा के होठ काँप गए,
“तो… तुम चाहते क्या हो? मैं न चलूँ?”
“तुम्हें समझ तो आ ही गया होगा,”
आरव ने बिना उसकी तरफ देखे कहा,
“जगह-जगह घूमना हो, दोस्तों से मिलना हो, तो तुम्हारी दोस्ती, तुम्हारा रंग, तुम्हारी सादगी सब अच्छी लग सकती है—
पर पब्लिक प्लेस पर पत्नी के रूप में प्रेज़ेंट करने के लिए… सॉरी, तुम सूट नहीं करती हो। घर संभालो, बस। और हाँ, ब्लू शर्ट प्रेस कर देना, बहुत रिंकल्ड है। शाम तक आऊँगा।”
दरवाज़ा बंद होते ही घर में सन्नाटा छा गया।
मीरा के कानों में बार-बार वही शब्द गूंजते रहे—
“तुम सूट नहीं करती हो…”
दो साल हो गए थे उनकी शादी को।
दो साल… जिसमें उसने गिनती की तो पाया कि दोनों ने मिलकर ठीक से शायद दस बातें भी ढंग से नहीं की होंगी।
आरव देर रात लौटता, खाना चुपचाप खा लेता, सोफ़े पर टीवी के सामने लेट जाता, और जब वो पास बैठने की कोशिश करती, तो बस इतना कहकर करवट बदल लेता—
“मीरा, बहुत थका हूँ, प्लीज़ अभी डिस्टर्ब मत करो।”
शादी के बाद पहले-पहले महीने में उसने बहुत कोशिशें की थीं।
कभी अपने लहराते, घुँघराले बाल संवारकर साड़ी पहनती,
कभी हल्का मेकअप करती,
कभी महँगा क्रीम लगाकर सोचती कि शायद कुछ निखार आ जाए।
पर आरव की नज़र में उसकी एक ही पहचान थी—
“गहरी सांवली, सामान्य सी लड़की, जिसका फ़ेस वैल्यू ज़ीरो है।”
फिर भी मीरा ने हमेशा खुद को समझाया—
“शायद वक्त के साथ सब सामान्य हो जाएगा,
शायद वो मुझे जानने लगे,
शायद मेरे मन, मेरी बातों, मेरी हँसी में उसे भी कुछ अच्छा लगे…”
एक दिन उसने हिम्मत करके अपनी माँ से कहा था,
“मम्मी, क्या मैं सच में इतनी… बदसूरत हूँ?”
माँ हड़बड़ा गईं,
“ये कैसी बात कर रही है तू? तेरी आँखें देखी हैं तूने? तेरी मुस्कान? तेरी आवाज़? तू तो हमारी सबसे प्यारी बेटी है।”
“पर मम्मी, बाहर की दुनिया… और आरव…”
माँ ने गहरी साँस ली,
“बेटा, तू जानती है, ये रिश्ता उन्होंने खुद लेकर आकर किया था।
तुझे देखकर ही पसंद किया था।
हमने तो पूछा भी था—‘तुमको रंग से कोई प्रॉब्लम तो नहीं?’
तो बोले—‘हमें पढ़ी-लिखी, शांत स्वभाव की लड़की चाहिए, खूबसूरती तो दो दिन की बात है।’
पता नहीं शादी के बाद ऐसा क्या बदला…”
पापा ने भी उसे समझाया था,
“हर शादी में वक्त लगता है बहन-बेटी।
मर्दों को अक्सर भावनाएँ समझने में देर हो जाती है।
थोड़ा समय दे, सब ठीक हो जाएगा।”
पर समय तो अपनी पूरी दौड़ लगा चुका था—
दो साल कम नहीं होते।
मीरा ने अपना धैर्य, आत्मविश्वास, सब थोड़ा-थोड़ा करके खो दिया था।
आज, पार्टी वाली बात सुनकर अंदर कहीं कुछ टूट गया था।
उसने पहली बार महसूस किया कि ये सिर्फ रंग की बात नहीं,
ये उसकी पूरी इज़्ज़त, पूरी अस्तित्व की बात है।
शाम ढलने लगी।
खिड़की के शीशे में अपनी परछाई देखते हुए उसने खुद से पूछा,
“क्या सच में मैं सिर्फ अपने रंग भर हूँ?
मेरी मेहनत, मेरी नौकरी, मेरे सपने, कुछ मायने नहीं रखते?
और अगर किसी को मेरे सपनों, मेरे सम्मान से कोई मतलब ही नहीं,
तो क्या मैं ऐसे ही जीवन भर उसकी बातों का बोझ ढोती रहूँ?”
उसने धीरे से रोते-रोते एक फैसला कर लिया।
आज बात साफ होगी।
या तो रिश्ता बदलेगा,
या वो खुद अपनी राह चुन लेगी।
दरवाज़े की घंटी बजी।
आरव मोबाइल पर किसी से हँसते हुए बात कर रहा था,
“हाँ भाई, मैं टाइम पर पहुँच जाऊँगा… हाँ-हाँ, आज की पार्टी यादगार होगी!”
मीरा ने उसके हाथ से मोबाइल लेकर टेबल पर रख दिया।
“मुझे तुमसे बात करनी है, अभी, इसी वक्त।”
आरव झुंझला उठा,
“ये क्या बदतमीज़ी है, मीरा? मुझे लेट हो रहा है, बाद में—”
“दो साल से ‘बाद में’ सुनती आ रही हूँ।
आज नहीं सुनूँगी।
आज या तो तुम सच बताओगे,
या मैं अपना सच खुद तय कर लूँगी।”
आरव ने उसकी तरफ तीखी नज़र से देखा,
“ठीक है, पूछो, क्या जानना है?”
मीरा ने काँपती आवाज़ में पूछा,
“मैं तुम्हारी पत्नी हूँ…
फिर भी तुम दो साल से मुझसे ऐसे बर्ताव करते हो जैसे मैं तुम पर थोप दी गई हूँ।
तुम मुझे देखकर नज़रें फेर लेते हो,
कभी पास नहीं आते,
मुझे छूना तक नहीं चाहते।
अगर मैं तुम्हें इतनी ही नापसंद थी,
तो तुमने मुझसे शादी क्यों की?”
आरव एक पल को चुप रहा,
फिर हल्की हँसी के साथ बोला,
“तुम सच सुनना चाहती हो न? तो सुनो।
तुम्हें मैंने पसंद नहीं किया था—
मैंने पसंद किया था तुम्हारे पापा का बिज़नेस।
तुम उनकी इकलौती बेटी,
तीन दुकानें, दो फ्लैट, बैंक बैलेंस…
मेरे दिमाग में साफ था—
थोड़ा टाइम निकालकर शादी कर लो, बहू भी अच्छे घर की मिल जाएगी,
और धीरे-धीरे प्रॉपर्टी पर मेरा कंट्रोल हो जाएगा।
बस यही लॉजिक था।
तुम्हारा रंग, तुम्हारा चेहरा, तुम्हारी पसंद मुझे क्या करनी थी?
तुम तो बस माध्यम थीं।”
मीरा ने विस्फार आँखों से उसे देखा।
“मतलब… तुमने मेरे अंदर झाँकने की कोशिश भी नहीं की?
तुम्हारी नज़रों में मैं बस ‘चालती-फिरती चाबी’ हूँ प्रॉपर्टी की?”
आरव ने कंधे उचकाए,
“देखो, दुनिया ऐसे ही चलती है, मीरा।
शादी भी एक तरह का सौदा ही तो है।
तुम्हारे माँ-बाप ने यही सोचा होगा—
‘अच्छे घर, अच्छे काम करने वाले लड़के से रिश्ता हो जाए।’
मैंने भी सोचा—
‘सेटल लड़के को सेटल लड़की मिल जाए तो बढ़िया है।’
बस दोनों का हिसाब किताब मिल गया।”
मीरा के अंदर की सारी हिचक, सारी शर्म जैसे एक पल में घुल गई।
उसकी आँखों से आँसू गिरना बंद हो गया,
चहरे पर एक अजीब-सी दृढ़ता उतर आई।
“लेकिन एक चीज़ का हिसाब तुम भूल गए, आरव,”
वो शांत आवाज़ में बोली,
“ये कि मैं कोई सामान नहीं हूँ जो तुमने खरीदा है।
मैं इंसान हूँ, अपनी सोच, अपने दम, अपनी मेहनत वाली।
तुमने मुझे कभी पत्नी माना ही नहीं,
तुम्हें सिर्फ जायदाद चाहिए थी।
अब सुनो—तुम्हारी ये गणित पूरी तरह गलत हो चुकी है।”
आरव ने भौंहे चढ़ाईं,
“मतलब?”
“मतलब… मैं जा रही हूँ,”
मीरा ने साफ-साफ कहा,
“अभी, इसी वक्त।
तुम्हारी पार्टी है न? तुम्हारे प्रमोशन की?
जाओ, तुम्हारी दुनिया में तुम्हारे जैसा सोचने वाले बहुत मिलेंगे।
लेकिन मेरी दुनिया में तुम्हारे जैसे के लिए अब कोई जगह नहीं होगी।
ना मेरी ज़िंदगी में,
ना मेरे पापा के बिज़नेस में,
ना एक फूटी कौड़ी तुम्हें मिलेगी।”
आरव तिलमिला उठा,
“तुम जाओगी कहाँ? लोग क्या कहेंगे?
‘शादी के दो साल में ही घर छोड़कर आ गई’?
तुम्हारे माँ-बाप तुम्हें वापस ले लेंगे?”
मीरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“शादी निभाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ लड़की के सिर पर नहीं होती,
ये दोनों का रिश्ता है।
और लोग… लोग तो कुछ भी कहेंगे,
पर मैं अब खुद की नज़र में गिरकर जीना नहीं चाहती।”
उसने अलमारी से अपना बैग निकाला,
कुछ ज़रूरी कपड़े, डॉक्यूमेंट्स, और अपनी संगीत डायरी उठाई।
घर की आख़िरी नज़र ऐसी नज़र थी जिसमें कोई मोह नहीं,
सिर्फ एक खामोश विदाई थी।
“मीरा, ये ज़िद है, या ड्रामा?”
आरव ने आखिरी कोशिश की।
“ये ज़िद नहीं, आत्मसम्मान है,”
मीरा ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा,
“और ड्रामा तो तुमने किया था—
जब प्यार का दिखावा करके जायदाद का ख्वाब देख रहे थे।”
मीरा मायके पहुँची तो माँ घबराकर उठ बैठीं,
“अरे, इतनी रात को… सब ठीक तो है न?”
मीरा खुद पर काबू नहीं रख पाई,
माँ के गले लगते ही फूट-फूट कर रो पड़ी।
पापा भी कमरे में आ गए।
“क्या हुआ बेटा? रो क्यों रही है?”
मीरा ने हिचकियाँ लेते हुए सब कुछ बता दिया—
आरव के ताने, रंग को लेकर अपमान,
पत्नी के रूप में न अपनाना,
और आज सचमुच ये जानना कि वो तो बस जायदाद के लिए शादी करके बैठा था।
माँ की आँखों में आँसू भर आए,
“हे भगवान… हमने तो सोचा था, इतना पढ़ा-लिखा, अच्छी नौकरी वाला लड़का है,
मेरी बेटी को खुश रखेगा।
ये तो…”
पापा का चेहरा पत्थर-सा हो गया,
“तू ठीक किया जो लौट आई, मीरा।
तू अगर आज यह सब जानकर भी वहाँ रहती,
तो हर दिन अपनी आत्मा की हत्या करती।
हमने तुझे हमेशा अपने दम पर खड़े होना सिखाया है।
आज वही सीख काम आएगी।”
मीरा ने धीमे से कहा,
“पापा, मैं आपसे बस एक वादा चाहती हूँ—
आप मुझे फिर कभी वापस वहाँ भेजने की बात मत कीजिएगा।
जो रिश्ता छल पर बना हो,
वो टूटे तो ही बेहतर है।”
पापा ने उसकी पीठ सहलाई,
“तू इस घर की बेटी है, बोझ नहीं।
जितने दिन चाहे यहाँ रह,
या हमेशा के लिए…
ये घर तेरी ही तो है।”
थोड़ी देर चुप्पी के बाद माँ ने पूछा,
“पर बेटा, आगे का क्या सोच रही है तू?
ज़िंदगी लंबी है… अकेले कैसे काटेगी?”
मीरा ने आँसू पोंछे,
“अकेला शब्द सिर्फ उस इंसान के लिए होता है जिसका खुद के साथ भी रिश्ता न बचा हो, मम्मी।
मेरे पास मेरा हुनर है, मेरी नौकरी है, मेरा परिवार है।
और हाँ, शादी ही जीवन का अकेला लक्ष्य नहीं होता।
अगर जीवन साथी सम्मान न दे,
तो अकेली ज़िंदगी कम दर्दनाक होती है।”
माँ ने हल्की-सी मुस्कान के साथ उसका हाथ थाम लिया।
मीरा बचपन से ही शास्त्रीय संगीत सीखती आई थी।
उसने यूँ ही कहा,
“आपने ही तो कहा था न कि मेरी आवाज़ में राग बसते हैं…
मैं सोच रही हूँ, क्यों न उसी कला को अपना रास्ता बना लूँ?
कॉलेज की नौकरी तो है ही,
साथ में एक छोटा-सा म्यूजिक क्लास शुरू करना चाहती हूँ।
बच्चों को गाना सिखाऊँगी,
संगीत के ज़रिए खुद को भी फिर से जोड़ूँगी।
और अगर आप चाहें, तो पापा के बिज़नेस की ऑनलाइन ब्रांच संभाल सकती हूँ—
आपका काम भी हल्का हो जाएगा,
और मेरी ज़िंदगी को नई दिशा मिल जाएगी।”
पापा के चेहरे पर गर्व की चमक आ गई,
“ये हुई न मेरी बहादुर बेटी वाली बात।
देखा, तू खुद ही अपना रास्ता खोज रही है।
हमें तेरे फैसले पर पूरा भरोसा है।”
माँ ने उसकी पेशानी चूमकर कहा,
“तू खुश रहे, बस यही प्रार्थना है हमारी।
हम तेरा साथ कभी नहीं छोड़ेंगे।”
कुछ ही महीनों में मीरा ने अपने घर की ऊपरी मंज़िल पर छोटा-सा ‘सुरमंच’ नाम का म्यूजिक क्लास शुरू किया।
शुरू में चार बच्चे आए,
फिर आठ,
फिर मोहल्ले के लोग कहने लगे—
“मीरा बिटिया की आवाज़ तो पहले भी अच्छी थी,
अब तो जैसे उसमें नई ताकत आ गई है।”
कॉलेज में उसके पढ़ाने का अंदाज़ भी बदल गया था।
पहले वो खुद को दबी हुई आवाज़ में रखती,
अब उस पर आत्मविश्वास की चादर बिछ चुकी थी।
एक दिन पापा ने फ़ाइल रखते हुए कहा,
“मीरा, तेरी वजह से हमारी दुकान का ऑनलाइन ऑर्डर डबल हो गया है।
तूने वेबसाइट बनवाई, सोशल मीडिया पर पेज बनाया,
अब बाहर शहरों से भी लोग सामान मँगाने लगे हैं।
हम तो सोच भी नहीं पाए थे कभी।”
मीरा मुस्कुरा उठी,
“पापा, आपकी ईमानदारी की पहचान पुरानी है,
मुझे बस उसे नए प्लेटफॉर्म पर रख देना था।”
समय बीतता गया।
एक साल बाद उसे पता चला कि आरव के घर केस की नोटिस पहुँच चुकी है।
कानूनी कागज़ात वकील के ज़रिए भिजवाए गए थे—
तलाक़ के, संपत्ति से कोई दावा न करने के,
सब क्लियर।
कुछ रिश्तेदारों ने ज़रूर तंज कसा,
“अरे, तलाक़ ले लिया?
क्या कमी थी लड़की में?
या ज़्यादा पढ़-लिख गई थी?”
पापा हँसकर कहते,
“कमी यही थी कि हमारी बेटी को खुद का सम्मान प्यारा है।
और हाँ, ज़्यादा पढ़-लिखना हमेशा अच्छा ही होता है।”
मीरा अब जब आईने में खुद को देखती,
तो उसे अपना गहरा रंग बुरा नहीं लगता था।
उसे अपनी आँखों में दिखाई देती थी—
एक ऐसी औरत,
जो टूटकर भी खुद को जोड़ना जानती है,
जो ठुकराए जाने के बाद भी खुद का मूल्य समझती है।
कभी-कभी क्लास के बाद जब वो छोटी-सी अंजलि को राग सिखाती,
तो अंजलि अचानक पूछ लेती,
“दीदी, आप शादी करोगी?”
मीरा मुस्कुरा देती,
“शादी… अगर कभी किसी ऐसे इंसान से हो जो मेरे अंदर की मीरा को भी देख सके,
तो शायद कर लूँ।
पर सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए?
नहीं, ये गलती अब दोबारा नहीं करूँगी।”
अंजलि कुछ समझती, कुछ नहीं,
पर इतना ज़रूर कहती,
“दीदी, आप बहुत अच्छी हो, आपके गाने से मन खुश हो जाता है।”
मीरा मन ही मन सोचती,
“शायद यही असली जीत है—
किसी एक गलत इंसान की वजह से खुद के बारे में राय खराब न होने देना।”
एक शाम माँ ने चाय रखते हुए पूछा,
“कभी-कभी दिल नहीं करता किसी सहारे की ज़रूरत महसूस करने का?”
मीरा ने चाय का घूँट लेते हुए कहा,
“सहारा अगर बराबरी वाला हो,
तो अच्छा लगता है।
पर अगर सहारा देने वाला ही हमें गिरा हुआ समझे,
तो अकेले खड़ा रहना ज़्यादा बेहतर है।”
माँ ने सिर हिलाया,
“तू जैसी सोच हर लड़की के पास हो जाए,
तो शायद दुनिया की बहुत-सी गलत शादियाँ बच जाएँ।”
बाहर आसमान में बादल थे,
पर मीरा के मन में आसमान साफ था।
उसने अपनी डायरियाँ खोलीं,
एक नया गीत लिखना शुरू किया—
“जो खुद को न पहचान सके,
उसकी पहचान क्या रखनी,
जो दिल को चोट ही दे जाए,
उससे क्या उम्मीद रखनी।”
उसके सुर, उसके शब्द,
अब किसी के लिए रोने नहीं,
खुद को celebrate करने के लिए थे।
और उसके भीतर कहीं एक आवाज़ साफ कह रही थी—
“हाँ, मैंने सही फैसला लिया था।
क्योंकि घर वो नहीं जहाँ सिर्फ चार दीवारें हों,
घर वो है
जहाँ खुद का सम्मान,
खुद का प्यार,
खुद की पहचान ज़िंदा रह सके।”
लेखिका : आरती कुशवाहा