Moral stories in hindi : रमा देखो,, भगवानदास आया हैं… कुछ कहना हैं शायद उसे… 80 वर्षीय विनोद जी अपनी पत्नी से बोले…
भगवानदास का नाम सुन आंगन बुहारती रमाजी के पूरे शरीर में बिजली कौंध गयी… क्या भगवानदास … आज इतने सालों के बाद यहां क्यूँ आय़ा हैं… उस निर्लज्ज को अब मुझसे क्या काम आन पड़ा ….
सुनिये जी,, आप ही क्यूँ नहीं पूछ लेते क्या काम हैं उस नाशपीटे को मुझसे….
अरे , ऐसा मत बोल… जो हो गया उसे बिसार दें … जा देख ले क्या हाल हो गया हैं उसका…तेरी ही बद्दुआ लग गयी शायद… बहुत बिमार सा लग रहा हैं… इतना बोल अपनी चिलम सुलगाकर चारपाई पर बैठ गए विनोद जी..
बिमार शब्द सुन रमाजी जल्दी से झाड़ूँ छोड़ , साड़ी में हाथ पोंछ,,दौड़ती हुई बाहर गयी…
भगवानदास वही जमीन पर लाठी टिकाकर दोनों हाथ जमीन पर रखे बस रमाजी के घर की तरफ टकटकी लगाये निहार रहा था …
तू आ गयी रमा …. मुझे पूरा विश्वास था … अंत समय में मुरली मनोहर मुझे तेरे दर्शन ज़रूर करायेगा .. कंपकपाती आवाज में भगवानदास बोला…
अरे बेशर्म ,, अब क्यूँ आया हैं मुझे ये अपनी मनहूस शक्ल दिखाने… तेरी वो अप्सरा कहां गयी ज़िसकी खातिर कच्ची उम्र में तीन बच्चों के साथ मुझे अकेला छोड़ चला गया था …सिर्फ क्यूँ,क्यूँकि मैं तेरी उस मीना जैसी खूबसूरत नहीं थी …कभी तूने मुड़कर भी देखा मैं कैसे भरी जवानी में तीन बच्चों के साथ रह रही हूँ… कैसे उन्हे पाल रही हूँ… मुझे तो तूने कभी माना ही नहीं, कम से कम बच्चों की तरफ तो देखता… वो तो तेरे खून के थे ….
जो बोलना हैं तू बोल ले आज.. प्रायश्चित ही करने आया हूँ आज तेरे द्वार …. बहुत बुरा आदमी हूँ मैं… तेरे जाने के बाद मीना भी एक दूधमुंही बच्ची को छोड़ पराये मर्द के साथ चली गयी… उसके पालन पोषण में पूरा जीवन निकल गया… आया था एक बार तेरा पता खोजते हुए… पता चला कि तू किसी विनोद के साथ बहुत हंसी ख़ुशी रह रही हैं…. तेरे बसे बसाये जीवन में तूफान नहीं लाना चाहता था … बाहर ही मेरा बिट्टू खेल रहा था …मन तो हुआ उसे उठा जी भरकर प्यार कर लूँ… उसे अपने साथ लेता जाऊँ … पर हिम्मत नहीं हुई… तू बावरी हो ज़ाती … इसलिये रूक गया … इतना बोल विनोद जी की सांसे उखड़ने लगी…
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बहुत सालों तक तेरा इंतजार किया … पढ़ी लिखी तो थी नहीं जो कोई नौकरी कर लेती … विनोद जी की खान पर मजदूरी करने लगी… वो कभी कभी बच्चों को कपड़े य़ा कुछ सामान दिला देते… रहने को अपने घर के पीछे एक कमरा भी दे दिया… पर ये समाज अकेली औरत को अपनी जायदाद समझता हैं… सब मुझ पर बुरी नजर रखते… पड़ोसी ने मेरी इज्जत पर हाथ डालना चाहा ….विनोद जी ना होते तो मर ही ज़ाती … पूरा समाज कहता- क्या लगती हैं ये तेरी… उसने बोल दिया … मेरी पत्नी हैं ये… कोई इसकी तरफ देखे तो सही …. मुझसे बुरा कोई ना होगा… समाज में सम्मान के साथ इसी आदमी की वजह से जी पायी…आज बोलते बोलते रमाजी का सालों का मन का गुबार बाहर आ गया था ….
तुझे और तेरे आदमी को भगवान खूब खुश रखे…माफ कर देना मुझे रमा…शायद तेरी माफी से भगवान कुछ दुख हर ले….तंग आ गया हूँ अपनी इस लाईलाज बिमारी से…इतना बोलते बोलते भगवानदास के मुंह से खून निकलने लगा … वह वहीं जमीन पर लुढ़क गया … शायद अब सांसे नहीं बची थी …
रमा जी जोर से चीखी …. कोई तो बचा लो मेरे भगवान को … कोई तो आओ…. रमा जी ने उसका हाथ छुआ … शरीर ठंडा पड़ चुका था … यह देख रमा जी भी जमीन पर गिर पड़ी … एक झटके में वो भी इस दुनिया से विदा हो गयी…
तभी दौड़ते हुए नहाकर विनोदजी बाहर आयें … सभी गांव वाले उन्हे चारों तरफ से घेरे हुए थे ….भीड़ में से जगह बनाते हुए वो पास आयें … भगवानदास और रमाजी के हाथों में हाथों देख उनके चेहरे पर एक संतुष्टि की मुस्कान तैर गयी…
मन ही मन सोचे … एक औरत अगर किसी आदमी को दिल में बसा ले तो उसके जीवन में कितने भी पुरूष आ जाये ,, उसका दिल उसी आदमी में बसता हैं.. इसका जीता जागता उदाहरण आज सामने था ज़िसे देख सभी की आँखें नम थी …
मीनाक्षी सिंह की कलम से
आगरा