विश्वास की डोर –   बालेश्वर गुप्ता

  देखो,तुम्हारे भरोसे,तुमसे प्यार करके ही मैंने अपने परिवार से विद्रोह किया है।परिवार का एक सदस्य भी तो मेरे पक्ष में नहीं।रिश्तेदार तक यही समझाते हैं कि पगली प्रेम विवाह क्या कभी सफल हुए हैं?देख लेना कुछ ही दिनों में तू कहीं की नही रहेगी।

अब तुम्ही बताओ इतनी बड़ी बड़ी बातें भला मैं क्या समझूँ?तुम्हीं बताओ मैं करूँ तो क्या करूँ?

       मधु आज अपनी मित्रो के साथ पिकनिक पर गयी है और मैं घर पर बिल्कुल अकेला।अचानक ही न जाने क्यों मैं अपने जीवन के 48 वर्ष के फ्लैश बैक में चला गया।मधु मुझे झकझोर रही थी, मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो गया था।बिल्कुल ये ही स्थिति तो मेरे घर की भी थी।मेरे घर पर भी कोई इस अंतर्जातीय विवाह को तैयार नही था।पर मधु तो मेरे साथ मेरे पास आनी थी सो जवाब भी तो मुझे ही देना था।

       आकर्षण होना बिल्कुल अलग होता है, आकर्षण कभी भी समाप्त हो सकता है पर प्रेम है तो वो हार कैसे माने?आखिर सोचना तो मुझे ही था कि कैसे आगे निर्वहन होना है और कैसे समाज के विरोधों का सामना कर उसे परास्त करना है।मुझे अपने को ही टटोलना था कि मुझमें आखिर कितनी हिम्मत है?मधु ने तो अपनी हिम्मत दिखा दी थी।फैसला मुझे लेना था।

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       इस तरह मुझे सोचते देख मधु ससंकित सी हो मेरा हाथ पकड़ बोली, देखो अब मैं किसी अन्य से शादी करने की कल्पना भी नही कर सकती, अब पीछे मत हटना,सच में मैं मर जाऊंगी।उसकी शंका भरी वाणी और मेरे प्रति समर्पण को देख मैं अंदर तक हिल गया, मैंने अचकचा कर मधु को अपनी बाहों में समेटते हुए कहा अरे तुमने ऐसा सोच भी कैसे लिया कि मैं अपनी कल्पना तुम्हारे बिना कर भी सकता हूँ।सुनो मधु दुनिया कुछ भी कहे ,कितना भी हमारा विरोध हो हम जल्द ही शादी कर रहे हैं, तुम निश्चिंत रहो। मुझे आज48 वर्ष बाद भी अच्छी तरह याद है कि मेरी बात सुन मधु ने मेरा हाथ किस तरह कस कर दबा लिया था।शायद ये मेरे प्रति उसके विश्वास की पराकाष्ठा थी।

        कुछ समय और व्यतीत हो गया।मैंने भी अपनी वकालत शुरू कर दी और एक दिन मैंने मन को दृढ़ कर शादी का निर्णय कर 14 मई1975 की तिथि निश्चित कर ही ली और उस दिन आर्य समाज में मधु से शादी कर उसके विश्वास को पुख्ता कर दिया।

        2025 में हमारी शादी के50 वर्ष पूर्ण हो जायेंगे।आज मेरा सोचना था कि हमने समाज के चैलेंज को भी परास्त किया और एक मिथक कि प्रेम विवाह सफल नही होते,को भी तोड़ा।सच पूछो तो यह हिम्मत और सफलता हमारे एक दूसरे के प्रति विश्वास और समर्पण के कारण ही प्राप्त हो सकी।

#भरोसा

     बालेश्वर गुप्ता

         पुणे(महाराष्ट्र)

मौलिक,अप्रकाशित और आपबीती।

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