उपहार ना बने उपहास – रश्मि प्रकाश : Moral Stories in Hindi

“रमा बहू बिटिया की शादी का न्योता सबको दे दिया हो तो जरा मुझे भी वो लिस्ट दिखा देना… एक बार देख लूँ  कोई रह तो नहीं गया है?” सुलोचना जी बहू से बोली

रमा जो बेटी की ब्याह की तैयारियों में व्यस्त थी पास रखी एक डायरी उठा कर सास को पकड़ा दी।

सुलोचना जी सरसरी निगाह से पूरे नाम पढ़ने के बाद रमा से बोली,”बहू तुमने बरखा दीदी को क्यों नहीं बुलाया…. वो तुम्हारी ताई सास है …. न्योता नहीं दोगी तो पूरे  परिवार समाज में बदनामी कर के रख देगी…अभी भी समय है उनको भी न्योता भेज दो… चलो मैं खुद ही रमन से बात कर लूँगी।”

“ पर माँ उन्होंने ही कहा है इस बार बरखा ताई जी को हम न्योता नहीं देंगे… पिछली बार की सारी घटना आप भूल गई है क्या?” रमा ने कहा 

“ बहू कुछ भी नहीं भूलीं हूँ पर क्या वो सही वजह है उन्हें ना बुलाने की सोच कर देखो… उनकी उतनी ही समझदारी पर तुम लोग तो समझदार हो ।” वहाँ से जाते जाते सुलोचना जी बोल कर चली गई 

रमा सुलोचना जी की बात सुन कर बिस्तर पर हाथ रख कर बैठ गई और दो साल पहले अपने बेटे की शादी का दिन याद करने लगी …

कितने धूमधाम से शादी का जश्न मनाया जा रहा था….सुलोचना जी ने अपने पोते विभोर की शादी में सब रिश्तेदारों को न्योता दिया था…. अपने बेटे रमन से कहकर सबके लिए अच्छे उपहार भी मँगवा लिए थे रमन का भी अच्छा ख़ासा बिज़नेस था पैसे की कोई कमी नहीं थी इसलिए उसने भी माँ की इच्छा का पूरा मान दिया सब कुछ अच्छे से निपट गया उसके बाद जब विभोर की पत्नी वर्तिका के घर से सबके लिए जो उपहार आए थे वो सुलोचना जी और रमा मिल कर सबको देने लगे ।

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बरखा ताई के लिए साड़ी आई थी पर उन्होंने जैसे ही उसे देखा वो बिफरते हुए बोली,” ये कैसी साड़ी दिया है उन लोगों ने…..अरे हमारी कोई इज़्ज़त भी है कि नहीं…. अपनी दादी सास के लिए महँगी साड़ी लाई होगी पर हम तो ठहरे दूर के रिश्तेदार हमें क्यों अच्छा दिया जाएगा।”

“ आप ऐसा क्यों कह रही है दीदी ..… पोत बहू के घर से हम सबके लिए एक जैसा ही उपहार आया है…. रमा की ओर देखते हुए बोली जा बहू मेरे नाम वाला पैकेट भी ला कर दीदी को दिखा दे… दीदी आपको वो पसंद आए तो आप वो साड़ी रख लेना पर ऐसे किसी के दिए उपहार का अपमान तो नहीं करना चाहिए…. उपहार की क़ीमत नहीं देने वाले का दिल देखा जाता है ।”सुलोचना जी ने कहा 

रमा जल्दी से वो पैकेट ले कर आई और सुलोचना जी को थमा दी 

सुलोचना जी वो पैकेट दिखाते हुए बोली,” देख लो दीदी कुछ अलग नहीं किया है उन्होंने…. ।”

सुलोचना जी का मन कर रहा था कह दे सब आपकी तरह सोच नहीं रखते दीदी… शादी ब्याह के घर में हमेशा आप ऐसे ही करती रही हो… अपने बेटे की बहू को सोने के झुमके दिए और मेरी रमा बहू को क्या दिया था आपने कप प्लेट का सेट … वो भी आपकी बहू के घर से आया हुआ था जिसमें दो कप देख कर ऐसा लग रहा था मानो प्रयोग कर रख कर पैक कर दिया हो… मैं तो नहीं कर सकी थी वैसा… आपकी बहू को कान के दिए तो अपनी बहू को भी….. मेरे लिए तो दोनों घर की ही बहू थी पर आपने भेद किया… पोते की बहुओं के लिए भी आप एक जैसी ना कर पाई…..आपने तो हर बार उपहार को लेकर ताने कसे और हमने कुछ ना कहा बस यही समझा आपने जो उपहार दिए दिल से ही दिए होंगे ।

“ रहने दे सुलोचना जो आया है वही दे दो ख़ामख़ा नई बहू को लगेगा बड़ी दादी ने उपहार के लिए उपहास उड़ाया ।” बरखा दीदी की बात सुन सुलोचना जी अपनी सोच से बाहर आ उन्हें विदाई का सामान मिठाई उपहार दे कर विदा की …पर घर का माहौल बोझिल बन गया था 

ये सब सुन कर वर्तिका रमा और सुलोचना के सामने रोते हुए बोली,” मेरे मायके वालों ने सबके लिए अपनी तरफ से अच्छे उपहार ही दिए फिर भी बड़ी दादी ने आप लोगों को इतना सुना दिया मुझे माफ कर दीजिए ।”

“ नहीं वर्तिका बहू रोते नहीं…और तुम्हारे घर से जो भी आया है बहुत अच्छा है उपहार उपहास के लिए नहीं होता वो तो अपनी सोच और हैसियत के अनुसार लोग देते हैं तुम इन सब बातों पर दिल मत लगाओ ।” सुलोचना जी ने समझाते हुए कहा 

जब ये बात रमन को पता चली तो वो ग़ुस्सा करते हुए सुलोचना जी से बोला,” माँ ताई जी बड़ी ज़रूर है पर हरकतें एकदम… आप अब उन्हें हमारे किसी फ़ंक्शन में तो आने बोलना मत बस आती है तमाशा करके जाती है।”

तब सुलोचना जी ने बेटे को शांत करने के लिए हाँ में सिर हिला दिया था पर आज फिर वो ताई जी को बुलाने के लिए बोल रही है ये सुनकर रमन कहीं ग़ुस्सा हो गया तो क्या होगा।

रमा ये सब सोच ही रही थी कि रमन कमरे में आ गए ।

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“ क्या हुआ तुम्हें कब से आवाज़ दे रहा हूँ सुन ही नहीं रही हो… ये देखो जो सामान तुमने लाने को कहा था ले आया।” रमन रमा को ख़यालों में खोया देख बोले

“ सुनो माँ बरखा ताई को न्योता देने बोल रही है ।” रमा ने डरते डरते कहा 

“ क्या ऽऽऽऽऽ माँ का दिमाग सही तो है ना… बेटी के ब्याह में मुझे कोई तमाशा नहीं चाहिए … तुमने बोला नहीं हम उन्हें नहीं बुलाएँगे ।”रमन ग़ुस्से से बोला 

“ सब बोल दिया पर वो बोल रही है परिवार की बड़ी है समाज क्या कहेगा।” रमा ने कहा 

रमन सुलोचना जी के पास जाकर बात की पुष्टि किया तो वो कहने लगी ,”बेटा जाने दे… जो भी हुआ…बेटी की शादी है समाज में जगहँसाई होगी… हमारे घर की बड़ी तो वही है ना…. लेन देन के मामले में थोड़े अलग विचार रखती है पर आएगी तो हमारी वाणी को आशीर्वाद ही देगी उपहार कैसा भी दे….हमें रख ही लेंगे उनका आशीर्वाद समझ ।”

माँ को नाराज़ करके रमन बेटी की शादी नहीं करना चाहते थे इसलिए बरखा दादी को भी न्योता भेज दिया गया ।

सब बस डर रहे थे वो आकर कहीं शादी का माहौल ना बिगाड़ दें ।

शादी की रस्में शुरू होने के साथ ही बरखा दीदी घर आ गईं… और सुलोचना जी के कमरे में अपनी बहू के साथ गई।

“ सुलोचना अपनी बहु को बुला ले ।” बरखा दीदी ने कहा 

सुलोचना जी रमा को बुलवा दी

“ बहू जरा वो उपहार वाला थैला तो निकाल ।” बरखा दीदी ने अपनी बहू से कहा

उनकी बहू ने जब सामान निकाला तो बरखा जी आँखें तरेरते हुए अपनी बहू से धीरे से बोली,” अरे ये सब सामान बदल कैसे गया?”

“ माँ जी आपके बेटे ने कहा हमारे घर की सबसे छोटी और आख़िरी बेटी की शादी हो रही है हम उपहार अपनी हैसियत और खुशी से देना चाहते हैं…ताकि कल को हमें भी लगे हमने जो भी दिया हमारी बेटी को पसंद आए इसलिए आपने जो भी सामान रखने कहा था वो सब हमने निकाल दिया ।” बरखा जी की बहू ने कहा 

“ पर क्यों वो सब सामान खराब था क्या?” बरखा जी बहू को घुरते हुए बोली

“ माँ जी आपको भी पता है वो सब सामान हमारे काम का भी नहीं था जो आप देने की बात कर रही थी… माना उपहार उपहार होता है इसका मतलब ये तो नहीं हम कुछ भी उठा कर दे दे…. आप तो पड़ोसियों तक के लिए उपहार का नहीं सोचती पर कम से कम घर में अपने लोगों को तो उपहार दिल से दे ।” बरखा जी की बहू ने कहा 

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“ दीदी छोड़ो ना जो भी उपहार है…आप आ गई यही हमारे परिवार के लिए सबसे बड़ा उपहार है… आपके सिवा हमारे घर में बड़ा है ही कौन और रही बात उपहार की वो तो कुछ भी हो बस देने वाले का दिल देखना चाहिए….कुछ लोग उपहार देते वक्त अपने लिए तो अच्छे की उम्मीद करते हैं पर जब देना होता है तो घर की पुरानी चीजें भी गिफ़्ट पैक कर पकड़ा देते हैं जिससे लेने वाला ले तो लेता पर उसकी अवधारणा उस इंसान के लिए बदल जाती है….आपकी बहू सही कह रही है दीदी….. थोड़ा अपनी सोच बदल लीजिए… उपहार सस्ता हो या महंगा देने वाले का दिल ही देखा जाता है… रमा बहू ये सब सामान वाणी के लिए रख देना उसकी बड़ी दादी बड़े प्यार से उसके लिए लेकर आई है ।”सुलोचना जी ने रमा से कहा 

बरखा जी समझ रही थी वो आज तक यही करती आ रही थी…. वो अपने उन उपहारों को देखकर हमेशा बातें बनाती जो उन्हें उनके लायक़ नहीं लगता पर जब देने की बारी आती कंजूसी की सारी हदें पार कर देती ।

आज उन्हें अपने बेटे बहू पर ज़रूर ग़ुस्सा आ रहा था पर एहसास भी हो रहा था कि वो सच में उपहार को लेकर कुछ ज़्यादा ही मीनमेख निकालती हैं और देते वक़्त बला टालने वाले काम करती हैं तो उन्हें अपनी सोच पर शर्मिंदगी भी महसूस होने लगी।

इस बार उपहार को लेकर कोई हंगामा नहीं हुआ क्योंकि बरखा जी के बेटे बहू ने समझदारी से सब सँभाल लिया था क्योंकि वो भी समझ गए थे उनकी माँ को समझाने से बेहतर है खुद ही उपहार का लोन देन करें क्योंकि कहीं ना कहीं उस उपहार में उनकी माँ के साथ साथ उनके दिल का भी तो मूल्यांकन किया जाता है ।

दोस्तों आप लोग मेरी इस कहानी से कितने सहमत होंगे ये तो नहीं पता पर सच में बहुत लोग इस मानसिकता के होते हैं जो उपहार देने के लिए दिल नहीं उसे बला समझकर टालने की कोशिश में रहते हैं पर मेरा मानना है आप जो भी दे एक बार ज़रूर सोचें क्या ये उपहार मुझे कोई देता तो कैसा लगता… उपहार देने वाले का दिल उससे ही तो पता चलता है ।

रचना पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा ।

धन्यवाद 

रश्मि प्रकाश 

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