उल्टा दांव – परमा दत्त झा : Moral Stories in Hindi

आज संजना सिर पटक रही थी कारण श्वसुर जी को उसने छोड़ दिया था परिणाम आज पूरे एक करोड़ रूपए की पुरस्कार राशि से हाथ धोना पड़ा।

अरे कुछ करो,सारे पैसे वह डाइन मधु डकार लेगी।-संजना अपने पति राकेश को चिल्लाते बोली।

मैं क्या करूं,तुमने झगड़ा किया, तुम अलग हुई ,जब दीदी के पति मरे तो तुमने तमाशा किया।-राकेश दुखी मन से बोला।

आज संजना हाथ मल रही थी।उसे अपने फैसले पर अफसोस हो रहा था।वह हाथ मलती हुई अतीत की याद में खो गई।

आज से दस साल पहले इसकी सास की मृत्यु हो गई और सारे परिवार का बोझ  इसपर आ गया।

मैं इतने सारे लोगों का खाना नहीं बना सकती, मैं इस घर की बहू हूं, नौकरानी नहीं।

पापा अकेले कैसे रहेंगे, मां भी नहीं रही -लगभग गिड़गिड़ाते वह बोला।

अरे यह तुम्हारी समस्या है, मैं इस देहाती बूढ़े को झेल नहीं सकती।-वह गुस्से से फुफकारती बोली।

फिर दोनों ने कलह किया और तेरही पूरी होते भाग गये।पापा की ओर पलटकर नहीं देखा।वैसे भी बेकार बूढा खांसता रहता है अपने पास रखकर बीमारी खरीद 

नहीं लाना है।

फिर इसके बहन के पति मरे और तीन बेटियां छोड़ कर उसके ससुराल वाले चले गये ,यह तब भी नहीं गयी।

नतीजा गांव में बेटी के परिवार के साथ पापा रहने लगे।आज दस साल हो चुके हैं।उधर उसके पापा आज सेवानिवृत्त होने पर भी खेती और पंडिताई द्वारा घर चलाने लगे। फिर जहां चाह वहां राह -सो लेखनी चलने लगी और आज इसका परिणाम सामने है।

सो जैसे ही इस एक करोड़ के पुरस्कार की घोषणा हुई बेटे और बहू को तो सांप लोटने लगे।

पूरे एक करोड़ बूढ़ा बेटी, नातिन पर खर्च करेगा।हम तो जैसे औलाद ही नहीं हैं।

कुछ करना चाहिए,वह अपनी तीनों बेटियों के साथ पूरे दस साल बाद ससुराल पहुंच गई।

पक्का तीन मंजिला इमारत है।दालान पर बाबूजी बैठे हुए चाय पीते हुए बेटी के साथ शादी की तैयारी कर रहे थे।

बड़ी नातिन की शादी एक हफ्ते बाद होनी थी।

बाबूजी प्रणाम।-वह पांव छूते बोली।साथ ही तीनों पोतियों ने प्रणाम किया।

बेटी रमा,शहर से कुछ लोग आए हैं।चाय पानी कराओ, बात करो-कहते उठकर चल दिए।

बहू देखती रह गई।बेटा सामने आकर बोला -बाबूजी मैं हूं,आपका बेटा।

अच्छा ,अरे राकेश साहब भी आये हैं,हम गरीब के दरवाजे।-देखलेना बेटी , मैं थोड़ा आधे घंटे से आ रहा हूं।

वे चले गये और सभी को दालान पर बिठा चाय नाश्ता कराया।

आज वे लोग बस लालच में आकर आये थे।

जब लौटकर बाबूजी आये तो बहू ने मुद्दे की बात शुरू की।

पापा के पैसे और संपत्ति पर बेटे बहू का अधिकार होता है,न कि बेटी का-वह चिल्लाते हुए बोली।

बस कैसा अधिकार,इसकी मां मर गयी और तुमने एक बार भी झांका।मेरी बेटी विधवा हुई,उसके बारे में सोचा।अरे एक बार भी उस बाप के बारे में सोचा।

बिल्कुल नहीं,अपने मतलब के लिए पेपर में छपा और लार टपक गया।

सो जाओ,हमारा आपसे कोई नाता नहीं है। मुझे आपसे रिश्ता नहीं रखना।मेरे लिए उसी दिन मर गये।-जब बाबूजी ने डांटकर भगा दिया तो समझ में आ गया कि दांव #उल्टा हो गया।

वे थके कदमों से गाड़ी में बैठ कर रात ही वापस लौट आये।

#कुल शब्द संख्या -कम से कम 700

#रचनाकार-परमा दत्त झा, भोपाल।

(रचना मौलिक और अप्रकाशित है इसे मात्र यहीं प्रेषित कर रहा हूं।)

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