आखिरी ख़त – मंजू ओमर
अभय जी आपकी मम्मी का देहांत हो गया ,आप उनके पार्थिव शरीर को लेने आएंगे या हम लोग ही उनका अंतिम संस्कार कर दें और हां उन्होंने एक लिफाफा भी छोड़ा है आपके लिए। नहीं नहीं मैं आ रहा हूं श्याम लाल जी अभय बोला।
वृद्धाश्रम से मां का पार्थिव शरीर लेकर अभय घर आया ।उनका अंतिम संस्कार करने के बाद अभय ने वो लिफाफा खोला जिसमें कुछ पैसे और एक पत्र रखा था।पत्र में लिखा था बेटे ये पैसे हैं जो तुमने दिए थे मुझे जरूरत नहीं थी । जीवन के आखिरी समय में तुमने वृद्धाश्रम में
छोड़ दिया मेरी #ममता का ये सिला दिया । मेरे संस्कारों में शायद कोई कभी यह गई थी । अपने बच्चे को अच्छे संस्कार देना ताकि वो तुम लोगों को वृद्धाश्रम में न छोड़ें।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
,20 सितम्बर
मां की ममता – अमिता कुचया
कमला जी ने पूछा -तुम यहां बच्चों को क्यों ले आई, तुम्हारा ध्यान तो तुम्हारे बच्चों पर ही होगा। तुम काम कैसे करोगी! तब वह कहती- बच्चों को किसके सहारे छोड़ू, इसलिए मैं ले आई। वह छोटू मुन्नी से कहती- मैं जब तक काम कर रही, यही बैठना। और वह मालकिन का बरतन झाड़ू पोंछा करके घर चमका देती। जैसे ही उसे चाय बिस्किट खाने मिलते तो वह बच्चों को खाने दे देती, तब कमला जी देखती कि बच्चों की कैसे नाक बह रही है, कितने फटे और गंदे से कपड़े है ,उनको देखकर कहती- देखो रीना जहाँ बच्चे बैठे थे, वहां पोंछते हुए जाना ,वहां देखो कितना गंदा लग रहा है। तब वह उनके पप्पी को देखती,,कभी बिस्तर पर,कभी उनकी गोद पर चढ़ रहा तो कुछ नहीं खैर…फिर भी मन मारकर काम करती और वह बच्चों की बीच- बीच में कभी नाक पोंछ देती कभी कोई रोता तो झुनझुना बजाकर काम करने लगती। इस तरह उनका वह ख्याल रखती। आखिर एक मां जो ठहरी।
स्वरचित मौलिक रचना
अमिता कुचया
ममता – संगीता अग्रवाल
रीना को आज अपने बेटे के प्रति अपनी अंधी ममता से ही नफरत होने लगी थी । कितना समझाते थे राजेश कि बच्चो की हर जिद्द पूरी करना उन्हे बागी बना देता है वही हुआ । उसे पता ही नही लगा कि बचपन मे खिलौनों की ज़िद्द करता रोहान कब इतना जिद्दी बन गया कि किसी लड़की को अपना बनाने की जिद्द मे वो अपराधी बन गया । बचपन से बेटे की हर ज़िद्द पूरी करती रीना किसी लड़की के मन मे तो अपने बेटे के लिए प्यार नही भर सकती थी बस यहीं से हुआ रोहान के अपराधी बनने का सिलसिला। लड़की को तंग करना , उसका रास्ता रोकना , उसे धमकी देना और आज जब उस लड़की ने रोहान की बत्तमीजी के खिलाफ आवाज़ उठा उसके थप्पड़ मार दिया तो रोहान ने ये कहते हुए एसिड फेंक दिया कि मेरी नही तो किसी की नही।
अब रोहान सलाखों के पीछे है और वो लड़की जिंदगी मौत से लड़ रही है । अपनी अंधी ममता का ये हश्र तो रीना ने भी नही सोचा था।
संगीता अग्रवाल
मातृ सम्मेलन – लतिका श्रीवास्तव
मीनू तुम अकेली आई हो तुम्हारी मां क्यों नहीं आईं।
मैंने कहा था हर बच्चा अपनी मां को लेकर आयेगा आज.. मेरे डपटते ही मीनू का चेहरा और भी बुझ गया।
मैडम जी मेरे पिताजी आए हैं … उदास मीनू ने एक कागज बढ़ाया।
मातृ सम्मेलन है आज….पिताजी को नहीं लाना है .. नाराज हो मैंने कागज खोला।
मैडम जी मेरी बेटी कल से बहुत रो रही है.. जो मुझसे देखा नही जा रहा है।इसकी मां इसको जन्म देकर भगवान के पास चली गई तब से आज तक मैं ही इसकी मां हूं ।मां जैसी ममता तो शायद मुझमें नहीं है फिर भी अगर आप अनुमति दे क्या मैं आ सकता हूं मातृ सम्मेलन में अपनी बेटी की मां बन कर!!
मैं सोच में पड़ गई ममता पर सिर्फ मां का हक है क्या? पिता भी तो मां की तरह ममता लुटाते हैं!!
मीनू…. अपने पिता को बुला लाओ
मेरे कहते ही मीनू खुश होकर पिता को बुलाने दौड़ पड़ी।
लतिका श्रीवास्तव
श्रेय – हेमलता गुप्ता
आज की पार्टी मैंने मेरे बेटे शुभम के आई आई.ए.ऐस की परीक्षा पास होने की खुशी में दी है मुझे मेरे बेटे पर बहुत गर्व है मैंने जो संस्कार इसे दिए हैं यह उन पर खरा उतरा है! तभी शुभम ने पापा के हाथ से माइक लेते हुए कहा… पापा बिल्कुल सही कह रहे हैं पर इससे भी बड़ा योगदान मेरी मां का है, जिस किसी ने नहीं देखा, जब भी मैं कोई गलत काम करता पापा ने उसका दोष मम्मी को दिया और मेरे हर अच्छे काम पर उसका श्रेय स्वयं लिया और आज भी वही सब है किंतु यह मेरी मां का की ममता और त्याग का परिणाम है कि आज उनका बेटा यहां तक पहुंचा है! बेटे की बात सुनकर दूर खड़ी स्नेहा जी की आंखें नम हो गई और पिता का सर झुक गया!
हेमलता गुप्ता स्वरचित
*संघर्ष* – बालेश्वर गुप्ता
पूरे तीन दिनो बाद फ्लैट का दरवाजा खोला तो देखा,बालकोनी में रखे एक खाली बड़े गमले में कबूतर के दो अंडे रखे हैं।मैंने उन्हें हटाने का पाप नही किया।
मैं दिन में एक आध बार बालकोनी में झांक कर देख लेता,जिज्ञासा थी कि अंडो से बच्चे कैसे निकलते है,कैसे लगते हैं।एक दिन देखा कि एक कौवा उन अंडो को अपनी चोंच से तोड़ खाने वाला ही था कि कबूतरी ने आकर उस पर हमला कर दिया।हड़बड़ा कर कौवा हट कर ताक में थोड़ी दूर मुंडेरी पर बैठ गया।कबूतरी ने अपने दोनो पंख फैला कर उन अंडो को ढक लिया।उस दिन वह अपने लिये दाना चुगने भी नही गयी।
अब वह दाना चुगने दूर नही जाती थी,आशंकित हो पास ही रहती थी,मैंने बाजरे के दाने उसके लिये बालकोनी में ही डालने प्रारम्भ कर दिये।वह अब निश्चिंत थी,उसके होने वाले बच्चों का उसके होते कोई कुछ नही बिगाड़ सकता।
बालेश्वर गुप्ता,नोयडा
मौलिक एवम अप्रकाशित।
घाटे का सौदा – अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
लाटरी लग गयी थी रानी की। बस अपनी कोख नौ महीने के लिए किराए पर ही तो दी थी और बदले में दस लाख मिलने वाले थे।
पर जबसे पेट में पलते बच्चे ने अपने अस्तित्व का एहसास दिलाना शुरु किया था, उसका मन बगावत करने लगा था। उस अजन्मे बच्चे में वैसे ही मोह हो रहा था जैसेकि अपने बच्चों रधिया और बाबू पर।
खुश है कि अब उसका परिवार खुशहाल हो जाएगा…पर अजन्मे बच्चे की धडकनों को महसूस करते हुए उसे अब ये सौदा… “घाटे का सौदा” लग रहा था।
अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
ममता – पूनम
शीला की गोद में उसकी बेटी स्नेहा खेल रही थी। शीला ने धीरे से स्नेहा के बालों को सहलाया, तो वह मुस्कुरा उठी। पिछले कुछ महीनों से घर की आर्थिक स्थिति खराब थी, पति का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। लेकिन स्नेहा की मासूम हंसी जैसे हर दुख मिटा देती थी। एक दिन पति ने गुस्से में स्नेहा पर हाथ उठा दिया। शीला ने तुरंत स्नेहा को अपनी गोद में समेट लिया, उसकी आंखों में आँसू थे, पर होंठों पर सख्त फैसला। उसने ठान लिया, अब चाहे हालात जैसे भी हों, स्नेहा की सुरक्षा और उसकी ममता पर कोई आंच नहीं आने देगी।
पूनम
आंचल – भगवती सक्सेना गौड़
“आंटी, मम्मा कहाँ है?”
“कहीं बाहर गयी हैं, बस आती ही होंगी, बेटा, आओ स्कूल ड्रेस बदलवा दूँ।”
तभी कार रुकने की आवाज़ आयी और जीन्स वाली मिसेज सिंह ने घर मे पदार्पण किया।
ओ मेरा हनी आ गया, नैनी लंच करा दो, फिर मेरे रूम में ले आना ।
थोड़ी देर में हनी बेटा,” मम्मा, ये बताओ ममता का आँचल क्या होता है ? आज हिंदी वाली मैम कोई विद्यासागर के बचपन की कहानी सुना रही थी।”
बार बार बता रहीं थी, “माँ की ममता का आंचल उनके सिर पर था।”
स्वरचित
भगवती सक्सेना गौड़
बेंगलुरु
अधिकार – मनीषा सिंह
अरे हर्ष ये क्या– सुबह से ही बेडरूम में घुसा पड़ा है कमरे से बाहर निकल—। जब देखो तब “जोरू का गुलाम” बना फिरता है!
” गायत्री देवी” हाल फिलहाल के नवीन जोड़े को एक जोरदार फटकार लगाते हुए बोलीं ।
‘बेचारा हर्ष’ मां की कड़क आवाज सुनते ही पत्नी रिद्धिमा को छोड़ गायत्री देवी के पास जाकर बैठ गया–!
शादी के कुछ महीने ही हुए थे– बेचारी रिद्धिमा ये सोच के परेशान हुई पड़ी थी कि क्या पत्नी को— “पति से प्यार का अधिकार” पाने के लिए तब तक इंतजार करना पड़ता है जब तक की– सासू मां जिंदा हो– और तब तक उम्र ही निकल जानी है–!
“बहू के मन में खटास” तो भरेगा ही—।
धन्यवाद।
मनीषा सिंह