तिरछी मुस्कान – मणि शर्मा

सुमि और आकाश के इकलौते बेटे वंश की बहुत सुंदर तस्वीर बैठक में लगी थी .सुमि चुपचाप तस्वीर निहार रही थी . वंश की तिरछी मुस्कान उसका मन घायल कर रही थी . वह मानने को तैयार ही नहीं हो रही थी कि उसका प्यारा बेटा इस दुनिया से सदा के लिये जा चुका है कभी न आने के लिए ,और जहाँ जाने का कोई रास्ता भी नहीं है .

मिलने वाले तरह तरह से दिलासा दे रहे थे पर सुमि को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था . इतनी भीड़ में उसकी आँखें वंश को ही खोज रही थीं मानो अभी अपनी तिरछी मुस्कान के साथ आकर कहेगा,”मम्मी तुम भी न बड़ी अजीब हो ,जब जल्दी उठ जाता हूँ तो दूध देना भूल जाती हो“.“सॉरी बेटा ! अभी लाई ,”कहती हुई सुमि पता नहीं किस झोंक में रसोई की ओर भागी .

“दीदी !दीदी !”छोटी बहन वर्षा ने उसका हाथ पकड़ कर रोते हुए कहा ,”दीदी ! वंश अब हमारे बीच नहीं है ,वह हमें छोड़ कर चला गया है “.

पथराई आँखों से सुमि ने वंश की तस्वीर की ओर देखा. आने वाले लोग वंश की तस्वीर पर फूल चढ़ा रहे थे .सुमि का कलेजा फटने लगा . ऊपर वाला कैसे इतना निष्ठुर हो सकता है ?क्यों उसने सुमि की ममता की लाज नहीं रखी?क्यों उसका दिल माँ के आँसुओं के सामने नहीं पसीजा?

एक साल पहले ही वंश की गंभीर बीमारी का पता चला था .


आकाश और सुमि ने इलाज में कोई कमी नहीं छोड़ी . साथ ही मंदिर मस्जिद टोने टोटकों किसका सहारा नहीं लिया .कोई कुछ भी सलाह देता सुमि भाग भाग कर पूरा करती कि किसी भी क़ीमत पर वंश की जान बच जाए . उसका बहादुर बेटा भी ज़िंदगी की जंग बिना उफ किए एक योद्धा की तरह लड़ रहा था ,क्योंकि जीतना चाहता था . कुछ सपने थे उसके ,कुछ ज़िम्मेदारियाँ थीं ,जिन्हें पूरा करना चाहता था.

पर जैसा इतिहास कहता है कि अक्सर बहादुर योद्धा ही हार जाते हैं ,बाद में उनकी कहानियाँ सुनाई जाती हैं . उसका प्यारा बेटा भी अथाह मानसिक पीड़ा और असहनीय दर्द से तड़पते हुए आख़िरी साँस तक लड़ते लड़ते जंग हार गया .

“दीदी !फूल चढ़ा दो ,”हाथ में फूल लिए वर्षा की आवाज़ से सुमि का ध्यान टूटा.

वर्षा के हाथ में फूल देख कर सुमि की आँखें झरने लगीं . वह कैसे मान ले कि वंश अब नहीं है . वह बेटा जो उसकी आँखों में एक आँसू नहीं देख पाता था आज इतना रोने और पुकारने पर भी चुप है .सुमि ने फिर वंश की तस्वीर की ओर देखा.

अचानक सुमि को लगा कि जैसे वंश उसी तिरछी मुस्कान के साथ कह रहा है ,”मम्मी रोना नहीं ,मैं तुम्हारे पास हूँ “.

सुमि ने वंश की चिर-परिचित गंध को अपने पास महसूस किया .

“नहीं ! सुमि ने वर्षा का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा .”मैं फूल नहीं चढ़ाऊँगी . तुम सब मत मानो ,पर मैं जानती हूँ कि वंश कहीं नहीं गया है ,वह मेरी साँसों में बसा है ,मेरा प्यारा बेटा मेरी आत्मा में सदैव जीवित है , बस दिख ही तो नहीं रहा है ,मैं कैसे उस पर फूल चढ़ा सकती हूँ ?” वर्षा सुमि से लिपट कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी थी .आकाश भी एक तरफ़ गुमसुम खड़े थे और सुमि वंश की मनमोहक तिरछी मुस्कान में अपने आप को खोज रही थी .

मणि शर्मा

आगरा

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