“स्वाभिमानी” – डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

राजीव ने पिताजी को बालकनी में टहलते हुए देखकर   कहा -” सुबह- सुबह मॉर्निंग वॉक के बहुत सारे फायदे हैं पिताजी.. सेहत के लिए ! घर के बालकनी में टहलने से नहीं होगा कल से सुबह उठकर जाइए खुली जगह पर। 

पहले तो वे तैयार नहीं हुए लेकिन सबके दबाव पर आखिरकार मान गए। हामी भरते हुए बोले-” ठीक है कहते हो तुम लोग तो चला जाऊँगा।”

चार दिन तक लगातार गए उसके बाद माँ से बोले-” सुनो, मुझे थैला दे दिया करो टहलने के साथ ही साथ उधर से सब्जी भाजी भी लेता आऊंगा एक पंथ दो काज हो जाएगा ।”

इस तरह से उन्होंने अपनी दिनचर्या बना ली थी। रोज सुबह घूमने जाते और लौटते समय सब्जी लेकर लौटते।

 आज सुबह -सुबह माँ कुछ घबड़ाते हुए  बोली-” राजीव जरा जाकर देखो तो पिताजी आए क्यों नहीं अभी तक!”

राजीव ने घड़ी देखी तो उसे भी चिंता हुई क्या बात है अब तक तो पिताजी लौट आते हैं। उसने बाइक निकाली और निकल गया पिताजी को देखने….

लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर चौक से सटे पार्क में इक्का दुक्का आदमी के अलावा कोई नहीं था। पिताजी वहां नहीं दिखे तो राजीव  दूसरे रास्ते से वापस लौट रहा था तो उसने रास्ते में कुछ लोगों की भीड़ देखी। उत्सुकता वश सोचा कि रुक कर देख लूँ क्या हुआ?  देखा तो दंग रह गए पिताजी एक सब्जी वाले से भिड़े थे। इकठ्ठा हुए लोगों में कुछ पिताजी के तरफ से बोल रहे थे और कुछ लोग सब्जी वाले पर  चिल्ला रहे थे।

राजीव कुछ समझ पाता उतने में एक पुलिस की गाड़ी आकर खड़ी हो गई ।भीड़ में से किसी ने पुलिस को सूचना दे दी थी। एकाएक पुलिस ने दो डंडा सब्जी वाले को दिया और उसके ठेले को धक्का देकर गिरा दिया। सब्जी बिखरा देख सब्जी वाला जोर -जोर से रोने लगा।

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राजीव लोगों को चीरते हुए भीड़ में घुसकर पिताजी से बोला ” क्या हुआ पिताजी? “

“होगा क्या ! चोर है यह एक नंबर का ,अब जाएगा न जेल में तब इसका अंदाज बदल जाएगा दादागीरी दिखाने का! एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी।”

  “अरे!पिताजी लेकिन क्या किया इसने जो आप लोग इसे पुलिस के हवाले कर रहे हैं?”

पिताजी बौखलाकर बोले-“बदतमीजी किया है इसने एक तो कम तौल रहा है और साले को टोका तो मुझसे बहस लगा रहा है।”

भैया समझ गए कि पिताजी भले रिटायर हो गए हैं लेकिन उनके अंदर का डीएसपी वाला रौब अक्सर उनके ऊपर हावी हो जाता था। आज वही हुआ होगा। इतने में दो पुलिस वाले ने सब्जी वाले को गाली देते हुए घसीटते पुलिस की गाड़ी की ओर ले जाने लगे। वह बेचारा उन दोनों का पैर पकड़-पकड़कर रो रहा था-” साहेब हमें छोड़ दीजिये हमने कोई गलती नहीं किया है।”

 

अच्छा गलती नहीं किया..चार दिन रहेगा जेल में सारी हेकड़ी निकल जाएगी। जैसे ही सब्जीवाले को डंडा मारने के लिए पुलिसवाले ने हाथ ऊपर उठाया राजीव ने उसका हाथ पकड़ लिया। पहले तो वह पुलिसवाला राजीव पर गुर्राया लेकिन जब पिताजी ने बताया कि राजीव उनका बेटा है तो पुलिसवाला थोड़ा ठण्डा हो गया।

सब्जी वाले ने राजीव का पैर पकड़ लिया और रोते हुए कहा-” भैया जी, मुझे बचा लीजिये मेरे छोटे- छोटे बच्चे हैं भूखे पेट मर जायेंगे। मुझे साहेब ने चोर कहा था, मैंने बस “चोर” कहने का विरोध किया था। भैया हम गरीब हैं लेकिन चोर नहीं हैं ।”

राजीव ने उसे पैर पर से उठाकर बैठाया और समझा- बुझाकर माहौल शांत कराया।पुलिस वालों से माफ़ी मांगी और फिर पिताजी को लेकर घर आ गया । पिताजी ने वहां तो कुछ नहीं कहा पर घर आकर बेटे पर बरस गए कि क्यों उसने उस सब्जी वाले को बचाया।

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पहली बार राजीव पिताजी पर नाराज हो गया और बोला -” पिताजी शायद आपलोग भूल जाते हैं कि हर एक आदमी के अंदर भी स्वाभिमान होता है। आप समाज में प्रतिष्ठित हैं इसका मतलब यह नहीं है कि आप किसी को भी अपशब्द कहेंगे और वह आपका दबंगई बर्दाश्त कर लेगा।सब्जी वाला अपनी जगह बिल्कुल सही था। वह भले ही गरीब था लेकिन स्वाभिमानी था। “

 

 

स्वरचित एंव मौलिक

डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

मुजफ्फरपुर ,बिहार 

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