माला भाभी को हर समय काम करता हुआ देखकर उनका देवर किशन को बहुत बुरा लगता था वैसे तो मां बाबूजी ने कृष्ण कुंज में खुशियां ही खुशियां बनाई थीं बाबूजी ने ईमानदारी का धन कमा कर और पूजा पाठ कर सारे परिवार के लिए ईमानदारी से घर बनाया था,
जिसका नाम “कृष्ण कुंज” रखा बाबूजी अपने पिताजी से बहुत प्रेम करते थे और बच्चों के बाबा का नाम कृष्ण बिहारी था इसीलिए बाबूजी ने मकान का नाम कृष्ण कुंज रखा हम सब बहुत खुश रहते थे।
बड़े भैया राम की नौकरी प्राइवेट थी और माला भाभी पढ़ी-लिखी तो थीं पर घरेलू महिला थीं, बीच वाले भैया महेश बैंक में मैनेजर थे और भाभी शिवानी प्राइवेट कंपनी में मैनेजर थीं
पर शिवानी भाभी को अपनी नौकरी का बहुत घमंड था उन्हें लगता था कि मैं और मेरे पति ही घर में सबसे ज्यादा खर्च करते हैं हमेशा इसी बात पर भी घर में क्लेश करती थीं और पैसे भी बड़े एहसान से घर खर्च के लिए देती थीं, किशन सबसे छोटा भाई था वह पढ़- लिख तो गया था लेकिन,
उसकी नौकरी नहीं लग पा रही थी कई जगह उसने ट्राई किया पर उसका भाग्य साथ नहीं देता था तीनों भाइयों से छोटी बहन गायत्री ने भी ऐम.ए पास कर लिया था उसकी शादी की बातें चल रही थीं। माला भाभी सबके नखरे उठातीं रहती हैं कभी कभी मां-बाबूजी भी काम करते थे पर माला भाभी उन्हें करने नहीं देती थीं।
उज्जैन में मां श्यामा देवी और बाबूजी हरिप्रसाद जी का भक्ति में बहुत नाम था और उनके कृष्ण कुंज का भी बहुत नाम था की बाबूजी अपने कृष्ण कुंज में शिवरात्रि को बहुत बड़ा उत्सव मनाया करते थे सारे मोहल्ले वाले कृष्ण कुंज के उत्सव में शामिल होते थे और धूमधाम से शिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता था।
बाबूजी शिवजी की बहुत उपासना करते थे और एक अच्छे योग्य और ईमानदार टीचर थे उनके बहुत सारे शिष्य थे और भक्त भी हो गये अधिकतर महाकाल के मंदिर पर वह पूजा पाठ करवाया करते थे, लेकिन बीच वाली बहू शिवानी घर का माहौल बिगाड़ देती थी और घर में क्लेश होता रहता था
कि बड़े भैया तो छोटी मोटी नौकरी करते हैं ज्यादा घर में पैसे नहीं देते और माला भाभी तो घर के कामों में लगी रहती हैं उनसे तो कोई उम्मीद ही नहीं है हमारी एक लड़की है
उसके लिए भी हमें जोड़ना है प्रियांशी हमारी जिम्मेदारी है। किशन का तो लक साथ ही नहीं देता और हमारा सारा पैसा घर में ही लगता रहता है बस यही उनके दिमाग में रहता था और वह महेश भैया से सब की शिकायत लगाती रहती थीं।
बीच वाली भाभी शिवानी लालची थीं देवर किशन को यह सब समझ में आता था कि उनकी निगाह “कृष्ण कुंज” पर है कि किसी तरह कृष्ण कुंज को अपने कब्जे में ले लें लेकिन किशन अपनी तेज बुद्धि से उनको कामयाब नहीं होने देता था और अपने माता-पिता का पक्ष लेता था अपनी माला भाभी का पक्ष लेता था धीरे-धीरे घर में क्लेश बढ़ने लगा।
शिवानी ने महेश भैया के कान भरने शुरू कर दिए कि आप तो बैंक मैनेजर हैं सारा पैसा अपना घर में खर्च हो जाता है और मैं भी प्राइवेट कंपनी में बहुत मेहनत करती हूं और कैसे भी पैसे कमाती हूं मेरा पैसा भी सब घर के खर्चों में ही लगता है आप सबसे कहो कि सब लोग मिलकर काम करें या अपने घर “कृष्ण कुंज” में से हमारा हिस्सा हमें दे दें।
एक दिन अचानक महेश भैया छुट्टी के दिन मां बाबूजी से और दोनों भाई राम और किशन से और माला भाभी से बोलते हैं तुम लोग ज्यादा नहीं कमाते और घर के खर्चे बढ़ते जा रहे हैं हमारी भी बेटी है प्रियांशी उसके लिए भी हमें पैसा जोड़ना है सब शिवानी भाभी की कहे अनुसार वह बोलते चले गए बाबूजी को देखकर सदमा सा लग गया
बाबूजी बोले तुम यह मत भूलो बेटा यह कृष्ण कुंज अभी भी मेरे नाम है और यह मेरी जायदात है अगर दो भाई में से एक भाई कम कमाता है और छोटे बेटे की नौकरी अभी नहीं लग पाई है मुझे पेंशन मिलती है हम मिलकर गुजारा कर लेंगे लेकिन मकान के हिस्से नहीं करेंगे
अपने संबंधों में दरार नहीं आने देंगे यह सुनकर महेश जो शिवानी के कहे अनुसार बोल रहा था मन में सोचता है बाबूजी सही तो कह रहे हैं बेटी परिवार में पल रही है दादी- बाबा, चाचा-चाची, सबका प्यार मिल रहा है और अच्छे संस्कार मिल रहे हैं फिर शिवानी को क्या परेशानी है।
किशन की भी नौकरी लग जाएगी, बाबूजी भी तो पेंशन घर में खर्च करते हैं माला भाभी हर समय सबके काम करती हैं लेकिन मुंह पर शिकन भी नहीं आती राम भैया भले ही छोटी नौकरी कर रहे हैं लेकिन शांत स्वभाव के हैं वह चुपचाप सब की बातें सुनकर और बाबूजी और मां की बात सुनकर अपने कमरे में चले जाते हैं
यह सब देखकर महेश शिवानी से बोलते हैं कि तुम्हें कृष्ण कुंज में नहीं रहना तो तुम अपने मायके चली जाओ और अपने पैसों के बल पर अच्छा बड़ा मकान बना कर रहो मैं तो अपने माता-पिता को नहीं छोड़ सकता————– “मेरा भी स्वाभिमान है” मेरे माता-पिता ने स्वाभिमान से जीना सिखाया है! आज उनका जो “स्वाभिमान”
है पूरे उज्जैन में पंडित जी के नाम से जाने जाते हैं महाकाल के भक्त हैं और मैं उन्हें दुख नहीं दे सकता छोटी बहन गायत्री उसकी भी शादी करना है आज हमारे माता-पिता ने हम सबको पढ़ा लिखा के बड़ा कर दिया तो हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम सब मिलकर छोटी बहन गायत्री की और छोटे भाई किशन की भी शादी करें बस इंतजार है
तो किशन की नौकरी का यह सुनकर शिवानी धक्क रह जाती है और आश्चर्यचकित होकर अपने पति महेश को देखती है, कि महेश के ऊपर तो परिवार का प्यार का रंग चढ़ा हुआ है उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा लेकिन अगर मैं घर छोड़ कर चली गई तो मायके की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है
यहां तो मैं रानी महारानी की तरह रहती हूं पति भी बैंक मैनेजर है यह सोचकर वह महेश से माफी मांग लेती है अच्छा आज से मैं भी आपकी तरह सबका ध्यान रखूंगी शिवानी धीरे-धीरे अपने में बदलाव लाती है यह देखकर माता-पिता को खुशी होती है और बड़ी बहू माला के कामों में भी थोड़ा-थोड़ा हाथ बटाने लगी यह देखकर माला भाभी को भी आश्चर्य होने लगता है।
किशन नौकरी की पढ़ाई के लिए व्यस्त रहता है कि कोई अच्छी सरकारी नौकरी लग जाए और देखते-देखते किशन की मेहनत सफल हो जाती है किशन की नौकरी एक सरकारी ऑफिस में ट्रेजरी ऑफिसर की पोस्ट पर लग जाती है सारे घर में खुशियां छा जाती हैं
और उसके शादी के लिए रिश्ते भी आना शुरू हो जाते हैं बाबूजी के एक दोस्त बहुत बड़े व्यापारी थे उनकी बेटी भी सरकारी स्कूल में टीचर थी ऋषिका बहुत अच्छे परिवार की लड़की थी भरा पूरा परिवार था संस्कारी लड़की थी लेकिन उसका मन था कि वह अपने पैरों पर खड़े होकर ही शादी करेगी और उसकी भी गवर्नमेंट सर्विस लग जाती है
कृष्ण और ऋषिका की जोड़ी बहुत सुंदर लगती है “कृष्ण कुंज” में फिर से धूम मच जाती है क्या आज ऋषिका और किशन की शादी है? दोनों परिवार बहुत खुश होते हैं! शिवानी को भी लगता है कि कृष्ण और ऋषिका भी तो कमाते हैं कृष्ण कुंज पर केवल उसका अकेले का हक नहीं है
यह तो माता-पिता की धरोहर है जो सबको आशीर्वाद देती रहेगी और सब के संबंध अच्छे रहेंगे शिवानी का हृदय परिवर्तन हो जाता है और उसे लगता है कि हां सही बात है मेरे पति ने सही शिक्षा दी कि आज जो उनका “स्वाभिमान” है उसका मुझे ध्यान रखना है साथ ही मां बाबूजी के भी “स्वाभिमान” का ध्यान रखना है
अगर ऐसा परिवार हो तो घर में खुशियां ही खुशियां छा जाएं देखते-देखते छोटी बहन गायत्री की भी शादी एक गवर्नमेंट ऑफिसर से हो जाती है और सब “स्वाभिमान”से खुशियां मनाते हैं। मां बाबूजी का सर गर्व से ऊंचा हो जाता है।
सारे भाई बहन मिलकर माला भाभी के लिए भी एक बुटीक खोल देते हैं उनको पेंटिंग में बुटीक में बहुत दिलचस्पी थी पर उनकी सर्विस नहीं लग पाई थी और घर के कामों के लिए नौकर चाकर रख लिए जाते हैं ताकि माता-पिता को भी कोई परेशानी ना हो यह सब देखकर मां बाबूजी बहुत खुश होते हैं कि आज हमारी पूजा तपस्या का ही फल है जो संयुक्त परिवार में रहकर सब लोग मान सम्मान बनाए हुए हैं और मिलजुल कर रह रहे हैं माता-पिता को अपने “स्वाभिमान” से ज्यादा क्या चाहिए।
सुनीता माथुर
अप्रकाशित रचना
पुणे महाराष्ट्र
# विषय- स्वाभिमान मेरा भी है