स्वाभिमान मेरा भी है। – संजय सिंह

रात के 10:00 बज रहे थे ।एक छोटा सा बिजली का बल्ब उम्मीद से ज्यादा कमरे में रोशनी कर रहा था। एक कमरा जिसमें दो कुर्सियां ,एक मेज जिनके ऊपर उथल-पुथल अवस्था में रखी हुई किताबें और कुछ कपड़े साथ ही एक तरफ एक नए जमाने का बिस्तर लगा हुआ था। जिसके ऊपर गोपाल प्रसाद दो तकियों को सहारा बनकर सोने की कोशिश कर रहे थे।

परंतु आज उन्हें नींद नहीं आ रही थी। आज कुछ ऐसा हुआ था कि वह अपने अतीत में जा रहे थे जो उनके साथ घटित हुआ। उसे एक-एक करके अपने ज्ञान की कसौटी पर उतार रहे थे। उन्हें याद आया कि किस प्रकार उन्होंने अपने जीवन में एक अध्यापक पद पर रहते हुए सदैव सच्चाई का साथ दिया।

कोई उनके साथ गलत भी करता था। तो वह अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल समझकर उसे स्वीकार करते थे। सामने वाले को कभी भी बद्दुआ नहीं देते थे।उस घटना से आगे निकलकर समय के साथ कदम मिलाकर अपने जीवन का अगला पड़ाव शुरू कर दिया करते थे ।कई बार उन्हें अपने करीबियों द्वारा धोखा भी दिया गया ।

परंतु उन्होंने जब उस धोखे को पकड़ लिया। तो सामने वाले को शर्मिंदा करने की बजाय वह स्वयं ही अपना दोष निकाल कर सदैव दूसरे पक्ष को माफ करते रहे । सिर्फ यही सोचते रहते हैं कि जीवन में जो भी हो रहा है। वह सब ईश्वर की और उनके कर्मों  का लेनदेन है।

हाल ही में हुई एक घटना का स्मरण उन्हें हो आता है कि किस प्रकार से गांव में रहने वाली एक देहाती औरत अपनी गाय को चराने के लिए उनके घर के आसपास घूम रही होती है ।गाय ने अभी हाल में एक छोटे बछड़े को जन्म दिया था । उस गाय के गले में रस्सी लटक रही थी।

गाय की मालकिन दूर बैठकर उसे देख रही थी । गाय घास चल रही थी ।गोपाल प्रसाद पूरा दिन विद्यालय में बच्चों को पढ़कर घर में वापस आते हैं और देखते हैं कि वह देहाती औरत किस प्रकार से गाय को चरा रही है ।वह उसे कहते हैं कि गाय को किसी खुले स्थान पर चराया करो क्योंकि घर के आस-पास जमीन उबड़-खाबड़ है

और कहीं गाय गलती से गिर गई तो नुकसान हो जाएगा। परंतु देहाती औरत का इस पर कोई भी असर नहीं होता है। वह उसे पर दांत निकाल कर हंसने लगती है ।अभी गोपाल प्रसाद चुपचाप अपने आंगन में बैठकर उस गाय को देखते रहते हैं। एकाएक गाय की रस्सी गोपाल प्रसाद के नल में फंस जाती है।

गाय जोर से उस नेल को खींच देती है। जिससे नल पूरी तरह टूट जाता है ।गोपाल प्रसाद यह देखकर उस देहाती औरत से कहते हैं कि यह बहुत बड़ा नुकसान हो गया ।देहाती औरत उस नुकसान पर दुख व्यक्त करने की बजाय गोपाल प्रसाद को सलाह देती है कि वह नया नल लगवा ले ।

वह भी घर के अंदर लगवाए ताकि आगे कभी भी गाय की रस्सी इसमें ना फंसे। गोपाल प्रसाद चुपचाप उसकी नसीहत को सुनते हुए घर के अंदर चले जाते हैं। वह औरत गाय को लेकर चली जाती है। गोपाल प्रसाद नल की हालत को देखकर काफी चिंतित होते हैं और सोचते हैं कि जिस समय पानी आएगा तो वह पानी फालतू में बह जाएगा ।

अब वह कैसे रोका जाए और उसे बंद करने का प्रयास करते हैं ।परंतु पूरी तरह असफल रहते हैं ।बाद में काफी खर्च करके नल बनवाने वाले को बुलाते हैं और उस नल को फिर से बनाते हैं ।वह मन ही मन में कुढ़ते रहते हैं कि किसकी गलती है ?

किसकी गलती से आज मुझे यह अंजाम भुगतना पड़ा है ।परंतु फिर भी मन महसूस कर यह सोचते हैं कि चलो कोई बात नहीं। जो धन जिसके लिए रखा था ।

वहीं पर लगा है ।इसमें उस औरत की कोई गलती नहीं है। हो सकता है मेरी ही गलती है। परंतु आज सोए सोए गोपाल प्रसाद अपनी इस आदत से बहुत परेशान है और मन ही मन में सोच रहे हैं कि हर गलती को जो किसी और के द्वारा की जाती है।  वह अन्याय जो किसी और के द्वारा उस पर लादा जाता है ।

वह उसके कर्मों और ईश्वर की रजा नहीं हो सकती। यह उसकी कमजोरी है क्योंकि कहीं ना कहीं वह अपनी इस कमजोरी से धीरे-धीरे करके अपने स्वाभिमान को ठेस पहुंचा रहे हैं।

यदि यही हाल रहा तो वह  दिन दूर नहीं। जिस दिन वह अपने स्वाभिमान को सदा सदा के लिए समाप्त कर देंगे। परंतु अब गोपाल प्रसाद ने मन में ठान लिया था कि अब वह अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएंगे और जो भी व्यक्ति गलती करता है। उसको उसी समय उस गलती का एहसास करवाएंगे। 

हर बात जो गलत होती है। वह उसके मुंह पर ही बोलेंगे। ताकि बाद में उनके मन पर किसी प्रकार का कोई बोझ ना रहे ।क्योंकि आज गोपाल प्रसाद को स्वयं ही एहसास हो रहा था कि #स्वाभिमान मेरा भी है और मुझे इसे बचाना है।

धन्यवाद।

 लेखक :संजय सिंह।

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