भोर का तारा चमकने के साथ ही कमला बिस्तर छोड़ कर उठ बैठी और अपने नित्य कर्म में लग गई।
उसने घर की साफ सफाई की, बच्चों का नाश्ता बनाया, टिफिन बनाया, दोपहर का खाना बना कर रख दिया।
सास ससुर को चाय दी और अपने दोनों छोटे बच्चों को उठा कर तैयार कर दिया। उनके बैग में टिफिन रखे। टिफिन में हमेशा की तरह पराठा और अचार था।
“मम्मी आज तो टिफिन में कुछ अच्छा भर दो। कम से कम वो चीज वाली सैंडविच ही रख दो!” उसकी 7 साल की बेटी बोली।
“अच्छा तनख्वाह मिलेगी जब चीज लाऊंगी और तुमको टिफिन में चीज वाली सैंडविच बना कर रख दूंगी, चलो अभी जाओ, देर हो जाएगी।”
उसके ससुर उन दोनों को स्कूल छोड़ने चले गए। दोनों बच्चे पास की ही सरकारी स्कूल में पढ़ते थे।
कमला बड़े बड़े घरों में साफ सफाई और खाना बनाने का काम करती थी।
कमला विधवा थी। पति के गुजर जाने के बाद रिश्तेदारों ने सहानुभूति तो दी, लेकिन साथ नहीं। लोगों की नज़र में वह “बेचारी” थी, पर कमला खुद को कभी बेचारी नहीं मानती थी। उसके भीतर एक अडिग आत्मसम्मान था, जिसे वह किसी भी कीमत पर टूटने नहीं देना चाहती थी।
उस दिन वह रोज़ की तरह शर्मा जी के घर काम पर पहुँची। घर में उनकी बहू की सहेलियां आई हुई थी। कमला चुपचाप अपने काम में लग गई।
ड्राइंग रूम में बैठी महिलाओं की बातचीत अचानक उसके कानों में पड़ी।
“आजकल कामवालियों का भी कितना रौब हो गया है,” एक महिला बोली, “दो पैसे क्या कमा लेती हैं, खुद को बराबरी पर समझने लगती हैं।”
सब हँस पड़ीं।
” बराबरी नहीं,,खुद को हमसे ऊपर समझती है क्योंकि जानती है हम उन लोगों पर निर्भर है और उसी का फायदा उठाती है वो!” दूसरी महिला बोली और एक बार वहां ठहाके गूंज उठे।
कमला के हाथ थम गए। उसने सिर झुका लिया, लेकिन दिल के भीतर कुछ चुभ गया। वह चुपचाप अपना काम करती रही।
थोड़ी देर बाद शर्मा जी की बहू ने आवाज़ लगाई ,
“कमला! जल्दी चाय बना, और ध्यान रहे कप साफ हों… पिछली बार जैसे दाग नहीं होने चाहिए।” उसकी आवाज़ में आदेश कम, तिरस्कार ज़्यादा था।
कमला ने चाय बना दी। पर जब उसने ट्रे आगे बढ़ाई तो देखा वहां सबने बहुत सारा नाश्ता झूठा छोड़ दिया था।
उसकी आंखों के सामने अपने बच्चे घूम गए जो ऐसे पकवान खाने को तरस जाते है। वो जब भी उनको बाजार ले कर जाती है तो इन नाश्ते की दुकानों के सामने उसके मासूम बच्चे टकटकी लगा कर ताकते रहते है और वो बेबस सी उनको देखती रह जाती है।
“कमला, ये सारा नाश्ता तुम थैली में भर कर ले जाना। तुम्हारे बच्चे खुश हो जाएंगे!” शर्मा जी की बहू ने प्लेटों में पड़े झूठे नाश्ते की तरफ इशारा करते हुए एहसानजनक शब्दों में कहा।
कमला को दिल में कुछ फंसता सा महसूस हुआ। चेहरा अपमान से लाल हो गया।
उसने सिर उठाकर सीधे उनकी आँखों में देखा। उसने धीमे किंतु दृढ़ शब्दों में कहा,
“मैडम जी मैं अपने बच्चों को किसी का झूठा नहीं खिलाती हूं!”
ये सुन कर बहू होंठ टेढ़े करके व्यंग्य से बोली,
“लेकिन तुम लोगों को तो आदत होती है, हमारे घरों का बचा हुआ खाना खाने की। तुम कौनसी अनोखी हो!”
कमला साफ शब्दों में बोली,
“कामवाली हूं लेकिन मेरा और मेरे बच्चों का भी सम्मान है। मैं अपनी मेहनत से अपने बच्चों को स्वाभिमान की सुखी रोटी खिला सकती हूं लेकिन किसी का झूठा नहीं खिला सकती!”
बहू चौंक गई — “क्या मतलब?”
कमला ने शांत स्वर में कहा,
“मैं काम करती हूं, मेहनत करती हूं, किसी से भीख नहीं मांगती हूं। आपके यहां साफ सफाई करती हूं इसका मतलब ये नहीं कि मेरा आत्मसम्मान नहीं है, मेरा भी स्वाभिमान है।
हर इंसान का स्वाभिमान होता है, चाहे वो कामवाली ही क्यों न हो।” कमला ने वहां बैठे मेहमानों की ओर देखते हुए कहा। कमला की बात सुन कर वहां बैठी सभी महिलाओं की नजरें झुक गई।
कमला ने आगे कहा,
“कल से अब मैं यहां काम करने नहीं आऊंगी!”
ये सुन कर शर्मा जी की बहू सकपका गई।
“सॉरी कमला! मेरी बात का बुरा लगा तुमको…मेरा वो मतलब नहीं था। तुम काम छोड़ कर चली जाओगी तो काम कौन करेगा।”
कमला कुछ नहीं बोली और खामोशी से उसे देखती रही।
शर्मा जी की बहू ने उसने दोनों हाथ पकड़ लिए,
“प्लीज़ कमला!”
“ठीक है लेकिन मैडम याद रखना सभी का सम्मान होता है। कोई इंसान छोटा बड़ा नहीं होता सिर्फ परिस्थितियां उन्हें ऐसा काम करने को मजबूर करती है लेकिन इसका कतई ये मतलब नहीं कि हम आपका बचा खुचा झूठा खाएंगे!”
बोल कर कमला वापस साफ सफाई में जुट गई। अब उसके चेहरे पर एक अलग ही सम्मान भरी मुस्कान थी और आंखों में चमक थी।
रेखा जैन
अहमदाबाद, गुजरात