मुझे अचानक से घर पर देखकर भैया और मां कितने खुश होंगे, मां का हंसता चेहरा, उनकी आंखों की चमक, सोच-
सोचकर मीता मन ही मन उत्साहित हो रही थी। जैसे बचपन में चोर पुलिस का खेल खेलते हुए पीछे से धप्पा मारते थे, मैं
भी भैया के साथ इस बार ऐसा ही करूंगी। बचपन की यादें, फिर से ताजा हो जाएगी। हर बात पर मीता के चेहरे पर एक
लंबी सी मुस्कान फैल जाती।
सामने की बर्थ पर एक बुजुर्ग महिला उसे एकटक देख रही थी, जब मीता की नजर उनसे मिली, तो वो झेंप गई।
मायके जा रही हो,उन्होंने भी मुस्कुराकर कहा
हां…
मायके गए हुए बहुत साल हो गए हैं…
हां, चार साल बाद जा रही हूं। इनकी गुवाहाटी में पोस्टिंग थी, इसलिए आना नहीं हो पाया।
अकेली जा रही हो, बच्चे साथ नहीं जा रहे।
वो अगले हफ्ते से बच्चों के एग्जाम हैं। अब तो इधर ही आ गई हूं, जब उनकी छुट्टी होगी, फिर से घर आ जाऊंगी, घर के
नाम से मीता के चेहरे पर फिर मुस्कान आ गई।
अचानक से ट्रेन रुकी, मीता ने खिड़की से बाहर देखा, ट्रेन मथुरा जंक्शन से पहले खड़ी हो गई थी। शायद प्लेटफार्म पर
दूसरी गाड़ी खड़ी हैं।
पता नहीं और कितनी देर लगेगी। वैसे ही एक घंटा लेट हैं। अब दस बजे तक ही घर पहुंचूंगी। भैया ऑफिस चले जाएंगे,
तो मैं धप्पा किसे मारूंगी…
मायके की खुशबू से ही मीता अपने बचपन में लौट गई थी, पिछली पुरानी सारी बातें याद आ रही थी, कि ट्रेन ने फिर से
स्पीड पकड़ी और चलने लगी।
घर पहुंच कर, डोर बेल बजाने से पहले मीता ने सोचा, क्यों ना एक खेल खेला जाए… भैया को फोन करके पूछती हूं
कि मेरी राखी मिल गई या नहीं… फिर अचानक से घर पहुंच कर सबको हैरान कर दूंगी। और मजा आएगा…
सच में मीता, आज पहले वाली मीता बन गई थी, जो बात-बात में अपने दोनों भाइयों को परेशान करती थी। घर में
सबसे छोटी होने के कारण लाडली भी बहुत थी। किसी की मजाल थी कि उसे एक शब्द भी कोई जोर से बोल दे, पापा की
पूरी शह थी।
हेलो भैया…मैं मीता…
हां मीता, कैसी हैं तू…
सब ठीक, आपको मेरी राखी मिल गई क्या…
हां, हां… वह तो दो-तीन दिन पहले ही मिल गई थी।
अच्छा, पर मैंने तो राखी भेजी ही नहीं कह कर मीता फोन पर ही खिल खिलाकर हंस पड़ी।
अरे, वह पिछले साल वाली… तेरी भाभी को कल ही अलमारी में रखी मिली, मीता की हंसी सुनकर, आलोक सकपका
गया।
अरे छोड़ो आप… मैं कल राखी पर घर आ रही हूं। आप समय पर स्टेशन आ जाना।
अरे… प्रोग्राम बनाने से पहले पूछना तो चाहिए था ना… मैं तो कंपनी के काम से हैदराबाद में हूं और तेरी भाभी मायके
गई हुई है।
अच्छा… फिर मां कहां है…
मां को तो अनु अपने साथ ले गई है। बीमार है ना… तो उन्हें अकेला भी नहीं छोड़ सकते।
हां, यह बात तो ठीक है,कहते हुए मीता का चेहरा लटक गया।सारी खुशियां पल भर में काफूर हो गई।
अब क्या करूंगी घर पर तो कोई नहीं है। मुझे भी सरप्राइज देने की सूझ रही थी। अब भुगतो … सरप्राइज पर सरप्राइज
का मजा…
मीता अपने विचारों में खोई हुई थी कि अचानक उसे भैया की आवाज सुनाई दी। वह स्कूटर पर बैठे हुए थे और भाभी से
कुछ पूछ रहे थे।
भैया भाभी तो यहीं पर है, फिर उन्होंने मुझसे झूठ क्यों बोला? कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं… मीता जैसे ही सामान उठाकर
दरवाजे तक पहुंची, भैया जा चुके थे।
मीता ने डोर बेल बजाई…
भाभी ने दरवाजा खोला, दीदी आप… अचानक से कैसे आना हुआ? कोई फोन भी नहीं किया आपने, नहीं तो ये ही
आपको स्टेशन से ले आते।
रुको तो सही …सब कुछ बताती हूं, प्रोग्राम तो मेरा कल ही आने का था, पर आपको सरप्राइज देने के लिए बिना बताए
आज ही आ गई। भैया कहीं गए हैं क्या…
हां, हां… अभी ऑफिस गए हैं।
शायद आप भी तो मायके जाने वाली थी।
प्रोग्राम तो था, पर मां जी की तबीयत अचानक से ज्यादा खराब हो गई, इसीलिए घर जाना कैंसिल करना पड़ा। अनीता
की समझ में नहीं आ रहा था कि मीता ऐसे क्यों पूछ रही है?
उसने भी ऐसे ही हां में हां मिलाकर बात बना दी।
अच्छा भाभी, मैं मां से मिल लेती हूं, आप प्लीज एक कप चाय बना दो, कहती हुई मीता मां के कमरे की ओर मुड़ गई।
यह क्या… मां के कमरे से कितनी बदबू आ रही है। झूठे बर्तन भी ऐसे ही पड़े हैं… और मां ने साड़ी भी नहीं पहनी। यहां
हो क्या रहा है…
मीता ने भाभी को आवाज दी,भाभी यह क्या… यहां कुछ साफ सफाई नहीं और मां ने साड़ी क्यों नहीं पहनी?
कुछ नहीं दीदी, काम करने वाली दो दिन से नहीं आई और मुझे भी काम से फुर्सत नहीं मिलती,अनीता एकदम से सफेद
झूठ बोल गई।
काम से फुर्सत नहीं …घर में तीन लोग रहते हैं। बच्चे बाहर पढ़ने गए हैं। भैया सुबह ही ऑफिस चले जाते हैं, फिर काम ही
क्या है… बाद में बात करती हूं, पहले मां को देख लूं, सोचती हुई मीता कमरे में चली गई।
डोर बेल की आवाज सुनकर अनीता तेज कदमों से दरवाजे की ओर चली गई।
अब कौन आ गया…
आप… क्या हुआ… वापस क्यों लौट आए?
बड़ी गड़बड़ हो गई, सुबह मीता का फोन आया था। वह कल यहां आने को कह रही थी। मैंने कह दिया कि मैं तो कंपनी के
काम से हैदराबाद आया हुआ हूं और तुम भी मां को लेकर मायके गई हो। कहीं वह तुम्हारे मोबाइल पर फोन करके मां के
बारे में पूछने लगी और तुमने कुछ अलग कह दिया तो सब झूठ पकड़ा जाएगा।
अब कुछ नहीं हो सकता, झूठ भी पकड़ा गया और अब सफाई देने की भी कोई जरूरत नहीं रह गई। दीदी आज ही आ गई
है।
आपको जाने से पहले बता कर जाना चाहिए था ना …तभी मैं कहूं, दीदी आज इतनी पूछताछ क्यों कर रही हैं?
क्या मीता आ गई… पर वह तो कल आने वाली थी।
हां भैया मेरा प्रोग्राम तो कल ही आने का था। सोचा था कि आपको सरप्राइज दूंगी पर यहां तो आप दोनों ने ही मुझे
सरप्राइज दे दिया।
है ना भैया… भैया नमस्ते, कहती हुई मीता मुस्कुरा दी।
तू कब आई, कह देती तो मैं ही स्टेशन आ जाता। वो पर्स भूल गया था, रास्ते में याद आया तो वही लेने आया हूं। अच्छा
तो ठीक है, शाम को मिलते हैं,बातों को गोल-गोल घुमा कर भैया तुरंत रफूचक्कर हो गए।
थोड़ी देर बाद… भाभी, मैं बाजार जा रही हूं। मां की दवाइयां खत्म हो गई है। आपको कुछ मंगवाना है।
नहीं दीदी, शाम को आपको जो सब्जी खाने का मन हो, वही लेती आना
अनीता ने रसोई से ही जवाब दिया।
नौ बज गए, भैया अभी तक घर नहीं आए। कहीं सुबह की बात से परेशान तो नहीं… जब वह आएंगे तो मैं,सुबह की कोई
बात नहीं करूंगी।
थोड़ी देर बाद… आलोक घर आए और आते ही कमरे में घुस गए। शायद मुझसे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा
रहे। बेकार बात आगे बढ़े, इसलिए मुझे भी चुप रहना चाहिए। अगर वही शुरुआत करेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा।
नींद आंखों से कोसों दूर थी। मन में एक अलग ही तरह की बेचैनी थी। अगर भैया कुछ देर बात कर लेते तो अच्छा रहता।
भाभी भी सारे दिन कटी कटी सी रही। मैं भी तो अनमनी ही रही, मैं भी तो बात कर सकती थी। इसी ऊहापोह में काफी
समय बीत गया।
प्यास लग रही है पानी पीकर आती हूं, शायद नींद आ जाए। मीता किचन में गई तो देखा भैया के कमरे की लाइट जल
रही थी। दोनों अभी तक सोए नहीं, भैया से अभी बात करूं या फिर कल सुबह…
सुबह ही सही रहेगा, अब तो रात हो गई हैं, सोचती हुई मीता अपने कमरे की ओर जाने लगी।
तभी गैलरी में भाभी के बोलने की आवाज सुनाई दी। आपने थोड़ा सा झूठ बोल दिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। दीदी
तो घर आ गई ना… अब क्या फर्क पड़ता है कि तब आपने क्या कहा था। आप तो बस हर बार अपने आपको कोसते रहा
करो और वहां गांव में आपका छोटा भाई मौज कर रहा है, ना तो खेती की आमदनी में कोई हिस्सा और ना ही बीमार मां
की जिम्मेदारी…
बस कह दिया,भैया आप तो जानते हैं, गांव में ना तो कोई हॉस्पिटल है और ना ही कोई अच्छा डॉक्टर… आने जाने का
साधन भी नहीं है, अब आप ही बताओ मैं मां का इलाज कैसे करवाऊंगा और जी छोड़ गए मां को हमारे पास… सब
जिम्मेदारियों से हाथ जोड़ लिए। आप तब भी चुप रहे और कुछ ना बोले…
अब दीदी आई हैं, उनका भी पूरा लेना देना करना पड़ेगा, रक्षाबंधन का त्यौहार वो अलग…
बस अब तुम चुप हो जाओ, बहुत रात हो चली है। कहीं मीता ने सुन लिया तो… वैसे भी आज बहुत फजीहत हो चुकी है।
सारा प्रकरण मीता की समझ में आ गया था। दोनों भाइयों के स्वार्थ की वजह से मां भी दो पाटों में पिस रही है। अब वह
मां को यहां नहीं रहने देगी और उन्हें अपने साथ घर ले जाएगी, मीता ने मन ही मन फैसला कर लिया।
अगले दिन भैया को राखी बांधते समय मीता बोली,भैया में मां को हमेशा के लिए अपने साथ ले जाना चाहती हूं, आप
मां का रिजर्वेशन करवा दो।
कल की बात का बुरा मान गई क्या… हकलाते हुए आलोक ने कहा
कल रात मैंने आपकी और भाभी की बात सुन ली थी, भाभी सही कह रही थी, मां की जिम्मेदारी, दोनों भाइयों की
बराबर ही होनी चाहिए। लेकिन मेरा मानना हैं कि मां की जिम्मेदारी केवल बेटों की ही नहीं बेटियों की भी होनी
चाहिए।
दीदी, आप मेरी बात का बुरा मान गई।
आपसे क्या कहूं भाभी, ये तो आप भी जानते हो कि चाहे शादी को कितने भी साल हो जाए, लड़की का मायके का मोह
नहीं छूटता। हम घर में सिर्फ अपनी पुरानी यादों को फिर से जीने आती हैं,ना कि कोई सामान को बटोरने और उपहार
लेने ले लिए,कहते कहते मीता की आंखों में आंसू आ गए।
आपके प्यार के अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए। आपका साथ बना रहे, इसे अधिक मुझे और क्या चाहिए। आप दिल से
मुझे जो भी दोगी,वो ही मेरे लिए अनमोल हैं। उपहार की कीमत नहीं देखी जाती…सिर्फ देने वाले का दिल देखा जाता हैं।
अब मीता से रहा न गया और वो फूट फूटकर रोने लगी।
आलोक और अनीता को भी अहसास हुआ कि दोनों कितनी बड़ी गलती कर रही थे।
तू सही कह रही हैं मीता, मैं ही अपनी राह से भटक गया था। मां और तू मेरे लिए जिम्मेदारी नहीं हैं…
आज मीता को रक्षाबंधन पर अपना मायका फिर से मिल गया था। एक बार फिर मीता के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
स्वरचित एवं मौलिक भाव
अपर्णा गर्ग (नोएडा)
” उपहार की कीमत नहीं… दिल देखा जाता हैं।