गर्मियों की वह शाम हल्की सुनहरी धूप में नहाई हुई थी। गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बुज़ुर्गों की चौपाल जमी थी और पास ही बच्चे उछल-कूद कर रहे थे। वहीं, चौपाल से थोड़ा दूर, आँगन में बैठी शुभा अपने पुराने संदूक में कुछ तलाश रही थी। संदूक की लकड़ी वक्त के साथ जर्जर हो चुकी थी, मगर उसमें बंद यादें आज भी महकती थीं।
अचानक उसकी उंगलियां एक पुरानी रेशमी रुमाल पर आकर ठहर गईं। हल्के गुलाबी रंग पर कढ़ाई से दो अक्षर उकेरे हुए थे — “रवि”। शुभा की आँखें भर आईं। वह रुमाल नहीं, अतीत के दरवाज़े की एक चाबी थी, जिसने बीते दिनों की यादें खोल दीं।
शुभा और रवि बचपन के साथी थे। पड़ोस के घरों में पले-बढ़े, खेल-कूद में लड़ते-झगड़ते कब एक-दूसरे के सुख-दुख का हिस्सा बन गए, पता ही नहीं चला। रवि के माता-पिता के गुज़र जाने के बाद वह शुभा के परिवार के साथ ही रहने लगा। दोनों के बीच न कोई खून का रिश्ता था, न कोई सामाजिक बंधन — बस एक अनकहा स्नेह था, जो वक्त के साथ और गहराता गया।
रवि अक्सर कहता, “शुभा, तू मेरी बहन नहीं, माँ है माँ। तू नहीं होती तो मैं कब का बिखर जाता।” और शुभा हंसकर कहती, “बस, तू हमेशा मेरे साथ रहना, फिर मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
समय बीतता गया। पढ़ाई के बाद रवि को नौकरी के लिए शहर जाना पड़ा। जाते वक्त उसने शुभा से वादा किया था कि वह जल्दी लौट आएगा। लेकिन ज़िंदगी की दौड़ में वह कहीं खो सा गया। शुभा हर त्योहार, हर राखी पर उसके आने की राह देखती, पर रवि के पत्र भी धीरे-धीरे कम होते गए।
इधर शुभा रवि की राह तकती और उसके मात-पिता ऊ की शादी के लिए चिंतित रहते।वे चाहते थे कि उनके जीते-जी शुभा की शादी हो जाए तो वह भी निश्चित हों।उनकी भी उम्र बढ़ रही थी। वे भी चाहते थे कि रवि जल्द से जल्द घर लौट आए तो शुभा की शादी हो सके। लेकिन जब बहुत सालों तक रवि की कोई खबर न मिली तो निहारने शुभा के लिए एक अच्छा घर और लड़का देखकर उसकी शादी कर दी।
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शादी के बाद वह अपने घर-परिवार में रम गई लेकिन रवि को वह हर समय याद करती रहती।उसके पति ने भी रवि को खोजने की बहुत कोशिश की लेकिन नाकामयाबी ही हाथ लगी।अब तो शुभा के माता-पिता भी नहीं रहे और उसके मन में भी उसके लौटने की उम्मीद धुमिल सी होने लगी। लेकिन उसने उम्मीद का दिया अपने मन से बुझने नहीं दिया।
उधर रवि जब शहर गया तो उसको एक बहुत बड़ी कम्पनी में जाॅब मिल गई। वह बहुत ही मेहनत और ईनामदारी से कार्य करता था तो मालिक का चहेता बन गया।मालिक ने उसको अपना पीए बना दिया।यह देखकर उसके सहयोग उससे ईर्ष्या-द्वेष रखने लगे और उसको फंसाने का नया-नया बहाना खोजने लगे और एक दिन धोखे से उन सबने उसके खिलाफ झूठे तथ्य जुटाकर उसको जेल भिजवा दिया। वह कोशिश करता ही रह गया लेकिन खुद को बेगुनाह साबित करने में नाकाम रहा।
जेल में उसके अच्छे व्यवहार को देखते हुए जेलर ने उसकी सजा माफ करवा दी लेकिन तब तक बहुत समय बीत चुका था।
उसकी सजा माफ हो गई तो वह रिहा होकर सीधे घर पहुँचा।वह देहरी पर ही ठहर गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। तभी दरवाज़े पर आहट हुई। शुभा ने सिर उठाकर देखा — सामने एक परिचित चेहरा खड़ा था। बालों में हल्की सफेदी, आँखों में पछतावे की नमी और हाथ में वही पुराना रुमाल।
“शुभा…” आवाज़ कांप रही थी।
शुभा अवाक् उसे देखती रह गई। वर्षों की शिकायतें, इंतज़ार और दर्द — सब कुछ उन दो अक्षरों में घुलकर बह गया। वह दौड़कर रवि के गले लग गई।
उस शाम बरगद के नीचे बैठे बुज़ुर्गों ने देखा कि आँगन में दो भाई-बहन, बरसों की दूरियों को भुलाकर, स्नेह के बंधन में बंधे बैठे थे। आसमान में सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था, मगर उस घर में रिश्तों की रोशनी फिर से जगमगा उठी थी।
मीरा सजवान ‘मानवी’
स्वरचित मौलिक