“अरे वाह! मुझे हमेशा से पता था कि तुम एक दिन बहुत बड़े अफसर बनोगे। तुम्हारी मेहनत और लगन ही ऐसी थी,” अवंतिका की आंखों में एक सच्चा गर्व झलक रहा था। “मैं यहां हिमाचल यूनिवर्सिटी में बॉटनी (वनस्पति विज्ञान) की एक नेशनल कांफ्रेंस में मुख्य वक्ता के तौर पर आई हूं। मैं चंडीगढ़ की एक यूनिवर्सिटी में बॉटनी की प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हूं।”
सिद्धार्थ की आंखों में चमक आ गई। “प्रोफेसर अवंतिका! सुनकर बहुत अच्छा लगा। लेकिन तुम अकेली हो? परिवार साथ नहीं आया?”
अवंतिका ने कॉफी का आर्डर देते हुए कहा, “नहीं, पति देव को अस्पताल से फुर्सत नहीं मिली। मेरे पति राजीव एक कार्डियोलॉजिस्ट हैं और उनका रूटीन बहुत व्यस्त रहता है। तो मुझे अकेले ही आना पड़ा। वैसे तुम्हारा क्या प्रोग्राम है सिद्धार्थ? भाभी जी और बच्चे नहीं आए साथ?”
शिमला की सर्द शाम और मॉल रोड पर गिरती हल्की-हल्की बर्फ ने पूरे माहौल में एक अजीब सा जादू भर दिया था। देवदार के ऊंचे पेड़ों के बीच से छनकर आती धुंध ने हेरिटेज होटल ‘द ओकवुड’ को अपने आगोश में ले रखा था। होटल की बालकनी से सटी कॉफी शॉप में बैठे सिद्धार्थ की नजरें बाहर गिरती बर्फ पर थीं, लेकिन उनके ख्यालों में दिल्ली की वो भागदौड़ भरी जिंदगी चल रही थी, जिसे पीछे छोड़कर वह दो दिन के सुकून के लिए यहां आए थे। सिद्धार्थ, जो अब भारत सरकार में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी थे, अपनी व्यस्त और तनावपूर्ण दिनचर्या से कुछ पल चुराकर इन वादियों में खुद को तलाश रहे थे।
तभी उनके कानों में एक बेहद परिचित सी हंसी की आवाज पड़ी। वह हंसी, जिसकी खनक पच्चीस साल बाद भी सिद्धार्थ के जहन के किसी कोने में महफूज थी। उन्होंने अचरज से अपनी कॉफी का प्याला मेज पर रखा और आवाज की दिशा में देखा। सामने एक महिला खड़ी थी, जिसने एक बहुत ही सलीके से बुनी हुई कश्मीरी शॉल ओढ़ रखी थी। उसके चेहरे पर एक गजब सा ठहराव और परिपक्वता थी। बालों में चांदी के कुछ तार चमक रहे थे, लेकिन आंखों की वो चमक बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी पच्चीस साल पहले हुआ करती थी।
“अवंतिका?” सिद्धार्थ के मुंह से बेसाख्ता यह नाम निकला।
महिला ने चौंककर पीछे मुड़कर देखा। कुछ पल के लिए उसकी आंखों में अजनबीपन रहा, लेकिन जैसे ही उसने सिद्धार्थ के चेहरे की लकीरों और उन परिचित आंखों को पहचाना, उसके चेहरे पर एक साथ आश्चर्य और खुशी के भाव तैर गए।
“सिद्धार्थ? हे भगवान! तुम… तुम यहां शिमला में?” अवंतिका के कदम खुद-ब-खुद सिद्धार्थ की मेज की तरफ बढ़ गए।
पच्चीस सालों का लंबा फासला जैसे उन चंद कदमों में ही सिमट गया था। सिद्धार्थ ने सम्मान से उठकर कुर्सी पीछे की और अवंतिका को बैठने का इशारा किया। दोनों कुछ देर तक बस एक-दूसरे को देखते रहे। समय ने दोनों के चेहरों पर अपने निशान जरूर छोड़े थे, लेकिन उन निशानों ने उनकी शख्सियत को और भी निखार दिया था।
“यकीन नहीं होता अवंतिका कि हम इस तरह अचानक कभी टकराएंगे। तुम बिल्कुल नहीं बदली हो। सच कहूं तो वक्त ने तुम्हारी खूबसूरती में एक बहुत ही शालीन सा गाम्भीर्य घोल दिया है।” सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए पुरानी आत्मीयता के साथ कहा।
अवंतिका भी खुलकर मुस्कुरा दी, “तुम भी तो वैसे ही हो सिद्धार्थ। वही गंभीर आंखें और कुछ बड़ा कर गुजरने का आत्मविश्वास। वैसे, तुम यहां कैसे? और क्या कर रहे हो आजकल?”
सिद्धार्थ ने एक गहरी सांस ली और खिड़की के बाहर देखते हुए बोले, “मैं यहां एक गवर्नेंस समिट में हिस्सा लेने आया था। सोचा एक दिन रुककर पहाड़ों की शांति महसूस कर लूं। फिलहाल मैं दिल्ली में गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव (जॉइंट सेक्रेटरी) के पद पर हूं। जिंदगी फाइलों, नीतियों और सरकारी दौरों के बीच ही बीत रही है। तुम बताओ, तुम कैसे यहां?”
“अरे वाह! मुझे हमेशा से पता था कि तुम एक दिन बहुत बड़े अफसर बनोगे। तुम्हारी मेहनत और लगन ही ऐसी थी,” अवंतिका की आंखों में एक सच्चा गर्व झलक रहा था। “मैं यहां हिमाचल यूनिवर्सिटी में बॉटनी (वनस्पति विज्ञान) की एक नेशनल कांफ्रेंस में मुख्य वक्ता के तौर पर आई हूं। मैं चंडीगढ़ की एक यूनिवर्सिटी में बॉटनी की प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हूं।”
सिद्धार्थ की आंखों में चमक आ गई। “प्रोफेसर अवंतिका! सुनकर बहुत अच्छा लगा। लेकिन तुम अकेली हो? परिवार साथ नहीं आया?”
अवंतिका ने कॉफी का आर्डर देते हुए कहा, “नहीं, पति देव को अस्पताल से फुर्सत नहीं मिली। मेरे पति राजीव एक कार्डियोलॉजिस्ट हैं और उनका रूटीन बहुत व्यस्त रहता है। तो मुझे अकेले ही आना पड़ा। वैसे तुम्हारा क्या प्रोग्राम है सिद्धार्थ? भाभी जी और बच्चे नहीं आए साथ?”
“अवंतिका, जिंदगी में हम जो प्रोग्राम बनाते हैं, वो कहां पूरे होते हैं। वो कहते हैं न कि इंसान सोचता कुछ और है, और नियति उसे कहीं और ले जाती है। पत्नी दिल्ली में ही हैं, किसी रिश्तेदार की शादी थी तो वह वहां व्यस्त हैं। बच्चे अपनी-अपनी जिंदगी में सेटल हो चुके हैं,” सिद्धार्थ ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा।
दोनों के बीच कुछ पलों के लिए एक खामोशी सी छा गई। यह वो खामोशी थी जिसमें पच्चीस साल पहले के अनकहे सवाल और अधूरे जवाब तैर रहे थे। दिल्ली विश्वविद्यालय का वो कैंपस, वो साथ में देखे गए सपने, वो एक-दूसरे के साथ पूरी जिंदगी बिताने के वादे—सब कुछ उस खामोशी में गूंज रहा था।
सिद्धार्थ ने हिम्मत जुटाते हुए उस खामोशी को तोड़ा, “अवंतिका, एक बात पूछूं? अगर तुम्हें बुरा न लगे तो…”
अवंतिका ने सिद्धार्थ की आंखों में देखा और समझ गई कि वह क्या पूछने वाले हैं। उसने धीरे से कहा, “पूछो सिद्धार्थ, आज इतने सालों बाद शायद हमारे बीच कोई पर्दा या कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।”
“तुम उस दिन अचानक… बिना कुछ बताए, अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर दिल्ली से क्यों चली गई थीं? हम दोनों ने साथ मिलकर सिविल सर्विसेज की तैयारी करने का सपना देखा था। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि तुमने न तो अपनी ग्रेजुएशन वहीं से पूरी की और न ही मुझसे कभी संपर्क किया?” सिद्धार्थ की आवाज में आज भी वो पुराना दर्द हल्का सा महसूस हो रहा था।
अवंतिका ने अपनी नजरें झुका लीं। उसकी उंगलियां कॉफी के कप को सहलाने लगीं। कुछ पल सोचकर उसने एक लंबी सांस ली और बोलना शुरू किया, “सिद्धार्थ, तुम्हारे लिए वो सब समझना बहुत मुश्किल रहा होगा। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मेरे पिताजी अचानक हॉस्टल आए थे। उन्हें हमारे रिश्ते के बारे में पता चल गया था। वो कोई दकियानूसी इंसान नहीं थे जो प्यार के खिलाफ थे, लेकिन उनकी चिंता कुछ और थी।”
अवंतिका ने सिद्धार्थ की तरफ देखा, “पिताजी ने मुझसे कहा था कि अवंतिका, प्यार करना कोई गुनाह नहीं है, लेकिन जिस उम्र में तुम्हें खुद की एक पहचान बनानी है, अपने पैरों पर खड़ा होना है, उस उम्र में अगर तुम भावनाओं के भंवर में पड़ गई, तो तुम अपना लक्ष्य भूल जाओगी। वो नहीं चाहते थे कि मैं अपनी पढ़ाई छोड़कर या उसे दांव पर लगाकर सिर्फ किसी की पत्नी बनकर रह जाऊं। उन्हें डर था कि शादी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले मेरा करियर, मेरा वजूद कहीं दब जाएगा। उनका मानना था कि एक स्त्री का आर्थिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र होना बहुत जरूरी है।”
सिद्धार्थ बड़ी ध्यान से अवंतिका की बातें सुन रहे थे।
“इसलिए,” अवंतिका ने आगे कहा, “उन्होंने रातों-रात मेरा ट्रांसफर पुणे की एक यूनिवर्सिटी में करवा दिया। वो वक्त मेरे लिए बहुत पीड़ादायक था सिद्धार्थ। मुझे लगता था कि मेरे पिता दुनिया के सबसे क्रूर इंसान हैं। लेकिन जब मैं पुणे गई, तो मेरे पास पढ़ाई के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। मैंने अपना पूरा ध्यान अपनी किताबों पर लगा दिया। वहां से एमएससी की, फिर अमेरिका जाकर पीएचडी की। वहां मेरी मुलाकात राजीव से हुई, जो मेरी ही तरह अपनी पढ़ाई में डूबे हुए थे। हमारे विचार मिले और हमने शादी कर ली।”
सिद्धार्थ के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून आ गया था। “तुम्हारे पिताजी ने जो किया, वह उस वक्त हमें भले ही गलत लगा हो अवंतिका, लेकिन आज जब मैं तुम्हें एक सफल, आत्मनिर्भर और इतनी मजबूत महिला के रूप में देखता हूं, तो लगता है कि उनका फैसला सही था। अगर हम उस वक्त जज्बातों में बहकर कोई कदम उठा लेते, तो शायद न मैं आज इस मुकाम पर होता और न तुम इतनी बड़ी प्रोफेसर बन पातीं।”
“सच कहा सिद्धार्थ,” अवंतिका मुस्कुराई, “वक्त सबसे बड़ा गुरु होता है। अच्छा, तुम अपने बच्चों के बारे में बताओ।”
“मेरा बड़ा बेटा रोहन लंदन में एक इन्वेस्टमेंट बैंकर है, पिछले साल ही उसकी शादी हुई है। और छोटी बेटी सान्या, वो सिडनी में अपना स्टार्टअप चला रही है। दोनों अपनी-अपनी दुनिया में इतने व्यस्त हैं कि साल में एकाध बार ही मिलना हो पाता है। मैं और मेरी पत्नी अब दिल्ली के उस बड़े से सरकारी बंगले में अकेले ही रहते हैं। कभी-कभी बहुत खालीपन लगता है, लेकिन फिर लगता है कि यही तो जीवन का नियम है। परिंदे जब उड़ना सीख जाते हैं, तो घोंसले खाली ही हो जाते हैं।”
अवंतिका ने सहमति में सिर हिलाया, “बिल्कुल सही कहा। मेरी भी दो बेटियां हैं। एक कनाडा में रिसर्च साइंटिस्ट है और दूसरी मुंबई में एक एडवरटाइजिंग एजेंसी में क्रिएटिव डायरेक्टर है। मैं और राजीव भी चंडीगढ़ के घर में अकेले ही रहते हैं। दिन भर मैं यूनिवर्सिटी के बच्चों के बीच अपना समय बिताती हूं और राजीव अपने मरीजों में। शाम को जब हम मिलते हैं, तो घर की शांति हमें याद दिलाती है कि हमारी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी हैं। कभी-कभी मैं सोचती हूं कि हमने अपनी सारी जवानी अपने करियर और बच्चों को सेटल करने में लगा दी, और अब जब फुर्सत मिली है, तो घर में वो शोरगुल ही नहीं है।”
कॉफी का दौर खत्म हो चुका था और बाहर बर्फबारी भी थम चुकी थी। दोनों ने उठने का फैसला किया। होटल की लॉबी तक दोनों साथ-साथ चले। उनके बीच अब कोई मलाल, कोई शिकायत या कोई अधूरापन नहीं था। पच्चीस सालों का बोझ जो कहीं न कहीं उनके दिलों के किसी कोने में दबा था, वह आज शिमला की इस सर्द शाम में पिघल कर बह गया था।
सिद्धार्थ ने हाथ बढ़ाते हुए कहा, “आज तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा अवंतिका। ऐसा लगा जैसे मैंने अपनी जिंदगी के उस खूबसूरत पन्ने को फिर से पढ़ लिया, जिसे मैंने अधूरा ही बंद कर दिया था।”
अवंतिका ने गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए जवाब दिया, “मुझे भी सिद्धार्थ। हम दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में बहुत खुश हैं और मुकम्मल हैं, यही सबसे बड़ी बात है। अपना और भाभी जी का ख्याल रखना।”
दोनों मुस्कुराए और अपनी-अपनी राह पर चल पड़े। सिद्धार्थ ने मुड़कर नहीं देखा और न ही अवंतिका ने। दोनों जानते थे कि यह मुलाकात कोई नई शुरुआत नहीं थी, बल्कि एक बहुत ही खूबसूरत सफर का वह ठहराव था, जिसने उन्हें यह अहसास दिलाया कि जिंदगी में जो छूट जाता है, वो हमेशा के लिए खो नहीं जाता, बल्कि एक मीठी याद बनकर हमारे साथ हमेशा रहता है।
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