जाड़े के दिन थे। कड़ाके की ठंड पर रही थी। 1से 5तक की कक्षा विद्यालय नें स्थगित कर दिया था पर 6 से 12 की पढ़ाई चल रही थी। विद्यालय सात बजे की जगह नव बजे से खुलता था पर बच्चों को जाना पड़ता था और जब बच्चे विद्यालय जाएंगे तो उनके खाने के लिए और टिफिन मे देने के लिए कुछ तो बनाना ही पड़ेगा।
इसलिए आरोही सुबह छह बजे बच्चो के लिए नाश्ता और टिफिन बनाने के लिए जग जाती थी। उसकी सास का नियम था कि रसोई मे बिना स्नान के प्रवेश नहीं किया जा सकता है। इसलिए आरोही को जल्दी उठना पड़ता था।आज सुबह आरोही उठी तो उसे हल्का बुखार था।
सुबह नहाने से बुखार और भी बढ़ सकता था और उसका दुध पीने से उसके बच्चे को भी बुखार होने का खतरा था। इसलिए वह अपनी जेठानी कृतिका के कमरा मे जाकर बोली “दीदी मुझे बुखार है इसलिए मै नहा नहीं पाऊँगी।तो क्या आज आप बच्चो का नाश्ता बना देंगी?” कृतिका कहाँ रजाई मे बैठी चाय का इंतजार कर रही थी वहाँ उसे चाय देने की जगह नाश्ता बनाने को कहा जा रहा था,
यह सुनकर वह गुस्सा हो गई और बोली मै क्यों नाश्ता बनाउंगी? तुम्हारे आने के पहले बारह वर्ष तक मैंने अपने हिस्सा का काम कर लिया है।अब मै काम नहीं करूंगी। तुम्हे बुखार है तो नहाओ नहीं बस कपड़े बदल कर टिफिन बना लो।पर मुझसे काम की उम्मीद मत करो। कृतिका की बात सुनकर आरोही वहाँ से चली आई और कपड़े बदल कर बच्चो के लिए नाश्ता बनाया और उन्हें खिलाकर और देकर विद्यालय भेज दिया।
कृतिका और आरोही देवरानी और जेठानी है। जहाँ कृतिका के पति घर मे सबसे बड़े है वही आरोही के पति सबसे छोटे है।बीच मे चार बहने है। दूसरे बेटे की आस मे एक बेटा के बाद चार बेटियां हो गई थी।फिर जाकर आरोही के पति का जन्म हुआ था।
कृतिका के विवाह के पहले एक ननद का विवाह हुआ था और उसके बाद तीन ननद का विवाह हुआ। तब जाकर अंत मे आरोही का विवाह हुआ। इसलिए इनदोनो के विवाह मे बारह वर्ष का फासला था। कृतिका अपने बड़ी बहू होने का खूब फायदा उठाती थी। आरोही के आने के बाद वह रसोई के कामों मे उसका बहुत ही कम हाथ बटाती थी।
कपड़ा धोना, फैलाना जैसे काम जो सबको दिखे वह अभी भी करती थी। खाना बनते ही सास -ससुर, पति, देवर आदि को आगे बढ़कर परोस देती थी।आरोही को काम करने से कोई परेशानी नहीं थी।वह घर के सारे काम ख़ुशी ख़ुशी कर देती थी पर अब जब शादी के तीन वर्ष बाद उसको भी बच्चा हुआ था
तो उसे ज्यादा काम करने से प्रायः थकावट और कमजोरी जैसा महसूस होने लगा था। दूधमूहा बच्चा था. उसके ज्यादा ठंड मे काम करने से बच्चे को भी बीमार होने का खतरा रहता था। फिर भी वह किसी से कुछ नहीं कहती थी। रोज़ सुबह उठकर कृतिका के दोनों बच्चो के लिए नाश्ता बना देती थी
पर आज बुखार होने के कारण उसने एकदिन कृतिका से नाश्ता बनाने को कहा तो उसने इंकार कर दिया। यह सोचकर आरोही को बहुत दुख हो रहा था। आरोही का स्वभाव बहुत ही अच्छा था। यह सोचकर की दीदी नें पहले ननदो के साथ मेरे पति के भी सारे कामो को किया है
वह अपनी जेठानी का बहुत सम्मान करती थी पर आज उसे उनके व्यवहार से बहुत दुख पहुंचा था।फिर भी उसने किसी से कुछ नहीं कहा। बच्चो के विद्यालय जाने के बाद उसकी सास नें कहा “बहू आज तुमने चाय नहीं बनाया। क्या आज देर से उठी? तुम्हारी तबियत ठीक है? हाँ माँ, ठीक है।
आरोही नें कहा। इस समय कमजोरी हो जाती है। उपर से ठंड भी ज्यादा है तो उठने मे देर सबेर हो जाता है. कोई बात नहीं, अब जाकर चाय बना लो। तुम्हारे पापा चाय का इंतजार कर रहे है। उसकी सास नें कहा। जी माँ,मै झट नहाकर आई और चाय बना दी। बस पापा को थोड़ा सा रुकने बोलिए। आरोही नें कहा। नहाने जा रही हो? नाश्ता बिना नहाए बनाई थी? तुम्हे पता है हमारे यहाँ बिना नहाए कोई भी रसोई मे नहीं जाता है।
फिर तुमने ऐसा क्यों किया? अब आरोही के पास सारी बातो को सास से बताने के आलावा कोई रास्ता नहीं था।सुबह मे जो भी घटना हुई थी उसने सारी बातें सास से कह दिया। आरोही को बुखार है यह सुनकर उन्होने उसका माथा छुआ तो देखा कि वह एकदम आग के जैसा जल रहा है।यह देखकर उन्होंने आरोही को आराम करने के लिए भेज दिया।
उसके बाद रसोई मे जाकर चाय बनाई और अपने पति को देने के बाद अपना और अपनी बड़ी बहू का चाय लेकर बड़ी बहू के कमरा मे गई। उन्हें चाय लेकर आते हुए देखकर वह तुरंत बिस्तर से उठी और बोली माँ चाय किसके लिए लाई है? तुम्हारे लिए, सास नें कहा।
आप क्यों? बैठो बहू घबड़ाओ नहीं कोई बात नहीं है।क्या हुआ जो मै चाय ले आई। तुम मेरी बेटी जैसी ही तो हो। आज तुमसे कुछ बात करने का मन किया तो चाय लेकर तुम्हारे कमरा मे आ गई। सास की बात सुनकर कृतिका नें कहा कहिए माँ, क्या बात है। सास नें समझाते हुए कहा बहू बड़ी बहू होना सम्मान की बात है पर यह कोई अधिकार का पद नहीं है। मै और सारे घर वाले यह मानते है कि तुमने इस घर के लोगो के लिए बहुत किया है।
पर सच्चाई यही है कि तुम भी इस घर की बहू ही हो जैसे की छोटी बहू है। जितने कर्तव्य उसके है उतने ही कर्तव्य तुम्हारे भी है। आरोही के रूप मे तुमने एक बहुत ही अच्छी देवरानी को पाया है।वह तुम्हारा बहुत सम्मान करती है। इसलिए समझदारी इसी मे है कि तुम ऐसा कुछ मत करो जिससे तुम्हे उसका सम्मान खोना पड़े। वह जब से इस घर मे आई है तबसे ही सुबह उठकर तुम्हारे बच्चो के लिए नाश्ता बनाती आ रही है।
उसने कभी भी यह नहीं कहा कि बच्चे मेरे नहीं है तो मै क्यों उनका काम करू? मैंने भी पहले तुमसे कभी भी काम करने के लिए नहीं कहा। सोचा कि जब आरोही को दिक्कत नहीं है तो मै क्यों बीच मे पड़कर जेठानी -देवरानी के बीच मे फूट डालू?पर अब जब उसका भी एक छोटा बच्चा है
तो तुम्हे खुद आगे बढ़कर उसके कामों मे हाथ बटानी चाहिए। बेटा बात हाथ से निकल जाए उसके पहले ही सचेत हो जाना चाहिए। ऐसा ना हो कि कल को आरोही मुँह पर काम करने को मना कर दे। आगे तुम खुद समझदार हो यह कहकर सास नें अपनी बात को समाप्त कर दिया।जी माँ, आपने सही कहा आगे से मै इस बात का ख्याल रखूंगी। अबसे आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगी।
वाक्य –बड़ी बहू होना सम्मान है,अधिकार नहीं।
लतिका पल्लवी