सर्दियों की एक सर्द शाम थी, जब सुमेधा अपने कमरे में बैठी हुई फोन के रिसीवर को अपने हाथों में पकड़े हुए सुन्न सी रह गई थी। बाहर हल्की-हल्की धुंध छाने लगी थी, लेकिन सुमेधा के मन के भीतर विचारों का एक घना कोहरा उमड़ पड़ा था। फोन कट चुका था, लेकिन दूसरी तरफ से बोली गई बातें अभी भी उसके कानों में किसी हथौड़े की तरह बज रही थीं। वह अभी-अभी अपनी छब्बीस वर्षीय बेटी, काव्या के लिए आए एक रिश्ते पर बात कर रही थी। लड़के के पिता, मिस्टर अवस्थी से यह उनकी तीसरी बातचीत थी।
शुरुआत में सब कुछ बहुत सामान्य और सभ्य लग रहा था। लड़का एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर था और परिवार भी पढ़ा-लिखा और संपन्न था। सुमेधा और उनके पति रविशंकर को लगा था कि शायद उनकी बेटी के लिए यह एक योग्य घर होगा। लेकिन आज की बातचीत ने उनके सारे भ्रम तोड़ दिए थे। मिस्टर अवस्थी ने बातों ही बातों में बहुत ही चालाकी और ‘सभ्यता’ का लबादा ओढ़कर अपनी मांगें रख दी थीं।
उन्होंने सीधे तौर पर दहेज शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन उनका कहना था— “देखिए सुमेधा जी, हमारा बेटा इकलौता है। हमारे यहाँ शादी का मतलब है समाज में रुतबा। हम कोई मांग नहीं कर रहे हैं, लेकिन हमारी बिरादरी के हिसाब से शादी फाइव स्टार होटल में होनी चाहिए। और हाँ, बच्चे जब नई जिंदगी शुरू करेंगे, तो उन्हें एक अच्छी गाड़ी की जरूरत तो पड़ेगी ही, वह आप अपने प्यार से दे दीजिएगा। बाकी रिश्तेदारों के कपड़ों का शगुन तो आजकल का रिवाज है।”
सुमेधा ने जब बीच में टोकते हुए कहा था कि उनकी बेटी काव्या भी एक बड़ी आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और वह बहुत होनहार है, तो मिस्टर अवस्थी का जवाब था— “अरे बहन जी, लड़की की नौकरी का क्या है? हमारे घर में लक्ष्मी की कोई कमी नहीं है। वह नौकरी करे या ना करे, हमें उसके पैसों से कोई मतलब नहीं। हमें तो बस संस्कारी बहू चाहिए जो घर को संभाल सके।”
यह सुनकर सुमेधा सकते में आ गई थी। बिना कुछ सीधे माँगे ही उस पिता ने कितना कुछ माँग लिया था। सुमेधा ने कुछ बहाना बनाकर फोन रख दिया था, लेकिन वह कुर्सी से उठ नहीं पा रही थी। उसकी आँखें भर आई थीं। वह सोचने लगी कि आखिर एक लड़की का पिता या माँ होना इतना बड़ा गुनाह क्यों है? जब से काव्या पैदा हुई थी, सुमेधा और रविशंकर ने उसे अपने बेटे आर्यन से कभी कम नहीं समझा। उसकी पढ़ाई, उसकी कोचिंग, उसके शौक—हर चीज पर उन्होंने अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च किया था।
काव्या भी अपने माता-पिता के हर सपने पर खरी उतरी थी। उसने अपनी मेहनत से एक मुकाम हासिल किया था। लेकिन आज मिस्टर अवस्थी की बातों ने काव्या की उस सारी मेहनत, उसकी डिग्रियों और उसकी उस पहचान को शून्य कर दिया था। उनकी नजर में काव्या की काबिलियत की कोई कीमत नहीं थी; कीमत थी तो उस गाड़ी की, उस फाइव स्टार होटल के जश्न की, और उन शगुनों की जो सुमेधा और रविशंकर को अपने कंधों पर कर्ज का बोझ लादकर पूरे करने थे।
सुमेधा की आँखों से एक आंसू छलक कर उसके गालों पर आ गिरा। उसने कमरे की खिड़की से बाहर देखा, जहाँ काव्या अपने लैपटॉप पर ऑफिस का काम कर रही थी। वह कितनी स्वतंत्र, कितनी आत्मविश्वासी लग रही थी। सुमेधा सोचने लगी कि हम लड़की वाले अपनी बच्चियों की शादी के समय अचानक से इतने ‘बेचारे’ क्यों दिखने लगते हैं? समाज का यह कैसा कड़वा सच है कि जहाँ एक तरफ हम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे लगाते हैं, वहीं दूसरी तरफ बंद कमरों में आज भी बेटियों की पढ़ाई के अलावा दहेज की एक मोटी रकम जुटा कर रखते हैं, ताकि तथाकथित ‘अच्छे घरों’ में उनकी शादी कर सकें। एक मध्यमवर्गीय पिता अपनी बेटी की पढ़ाई के लिए लोन लेता है, और फिर उसकी शादी में समाज की झूठी शान बनाए रखने के लिए अपनी जीवन भर की जमापूंजी लूटा देता है। कहाँ मिटा पाए हैं हम बेटा-बेटी में फर्क?
उसी पल, सुमेधा के कमरे में उसका बाइस साल का बेटा आर्यन चाय के दो कप लेकर दाखिल हुआ। “क्या हुआ माँ? आप इतनी परेशान क्यों लग रही हैं? अवस्थी अंकल का फोन था न? क्या कहा उन्होंने?” आर्यन ने पूछा।
सुमेधा ने आर्यन को देखा और उसके मन में एक दृढ़ संकल्प ने जन्म लिया। उसने अपने आंसू पोंछे और आर्यन के सिर पर हाथ फेरते हुए एक प्रण किया। उसने मन ही मन खुद से कहा, “आज मैं एक बेटी की माँ होने के नाते जिस पीड़ा और अपमान से गुजर रही हूँ, कल जब मैं एक लड़के की माँ के रूप में किसी के दरवाजे पर जाऊँगी, तो वह इतिहास नहीं दोहराऊँगी। मैं अपने बेटे की शादी में एक रुपया भी उपहार या दहेज के रूप में नहीं लूँगी। समाज को बदलने की शुरुआत मैं खुद अपने घर से करूँगी। कम से कम एक बेटी के पिता के सिर से ‘बेटी बोझ होती है’ वाली यह घटिया सोच तो मैं मिटाने का प्रयास कर ही सकती हूँ।”
सुमेधा ने रविशंकर को सारी बात बताई और दोनों ने फैसला किया कि वे इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाएंगे। काव्या ने भी जब यह बात सुनी तो उसने अपने माता-पिता को गले लगा लिया और कहा, “मुझे गर्व है आप दोनों पर। मैं ऐसे घर में कभी नहीं जाना चाहूँगी जहाँ मेरी अपनी कोई पहचान न हो और जहाँ रिश्तों की नींव लालच पर टिकी हो।”
इसके बाद सुमेधा ने अपनी बेटी के लिए योग्य वर की तलाश फिर से शुरू कर दी। इस बार उन्होंने ऑनलाइन मैट्रिमोनियल साइट्स का सहारा लिया। कई प्रोफाइल्स देखने के बाद उनकी बात एक परिवार से शुरू हुई। लड़के का नाम तन्मय था और उसके पिता का नाम प्रकाश माथुर था। तन्मय एक आर्किटेक्ट था और उसका परिवार विचारों से बहुत ही सुलझा हुआ लग रहा था।
जब सुमेधा की पहली बार प्रकाश जी से फोन पर बात हुई, तो सुमेधा के मन में वही पुराना डर बैठा हुआ था। लेकिन प्रकाश जी के बात करने का लहजा बिल्कुल अलग था। उन्होंने काव्या के बारे में बहुत सी बातें पूछीं—उसके शौक क्या हैं, उसके करियर के लक्ष्य क्या हैं, और वह भविष्य में क्या करना चाहती है। जब सुमेधा ने हिचकिचाते हुए कहा कि उनकी बेटी अपनी नौकरी शादी के बाद भी जारी रखना चाहती है, तो प्रकाश जी की हल्की सी हंसी सुनाई दी।
उन्होंने कहा, “सुमेधा जी, यह तो बहुत अच्छी बात है। हमारी बच्चियों ने इतनी मेहनत से पढ़ाई की है, अपना करियर बनाया है, तो उसे बीच में क्यों छोड़ना? तन्मय और काव्या दोनों मिलकर अपना भविष्य संवारेंगे। हमें तो अपने घर के लिए एक बेटी चाहिए, जिसकी अपनी एक मजबूत सोच हो।”
सुमेधा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसे लगा जैसे यह कोई सपना है। लेकिन उसने खुद को संयत रखा। वह एक बार और इस परिवार की सच्चाई परखना चाहती थी। सुमेधा ने हिम्मत जुटाकर अपनी एक शर्त प्रकाश जी के सामने रखी।
“प्रकाश जी, मैं आपसे बहुत ईमानदारी से एक बात कहना चाहती हूँ। हमारी हैसियत किसी बड़े होटल या रिसॉर्ट में शादी करने की नहीं है। हमारी इच्छा है कि हम अपनी बेटी की शादी अपने इसी पुश्तैनी घर से, अपने छोटे से शहर से करें। क्या आप लोग बारात लेकर हमारे शहर आ सकेंगे?”
सुमेधा जानती थी कि उनके शहर की दूरी माथुर परिवार के शहर से लगभग छह सौ किलोमीटर थी। अमूमन लड़के वाले इतनी दूर बारात ले जाने से कतराते हैं या फिर लड़की वालों पर दबाव डालते हैं कि वे लड़के के शहर में आकर शादी का सारा खर्च उठाएं। फोन पर कुछ पल की शांति छा गई। सुमेधा का दिल जोर से धड़कने लगा। उसे लगा कि शायद बात यहीं बिगड़ जाएगी।
लेकिन तभी प्रकाश जी की स्नेह भरी आवाज आई, “सुमेधा जी, इसमें पूछने वाली क्या बात है? बारात तो वहीं जाएगी जहाँ हमारी होने वाली बहू का घर है। आपके घर के आंगन से ही तो असली विदाई होगी। दूरी चाहे छह सौ किलोमीटर हो या हजार किलोमीटर, हम खुशी-खुशी आएंगे। और हाँ, हमें शादी में कोई तामझाम या दिखावा नहीं चाहिए। बस दोनों बच्चों को आपका और हमारा आशीर्वाद मिल जाए, यही सबसे बड़ा शगुन है।”
सुमेधा की आँखों से इस बार जो आंसू बहे, वे खुशी और राहत के आंसू थे। उसे विश्वास हो गया था कि दुनिया में सिर्फ लालची लोग ही नहीं हैं, बल्कि ऐसे भी परिवार हैं जो रिश्तों का असली मतलब समझते हैं, जहाँ बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि सम्मान और गौरव का प्रतीक माना जाता है।
शादी का दिन तय हो गया। काव्या और तन्मय ने एक-दूसरे से बात की और दोनों के विचार बहुत अच्छे से मेल खा गए। शादी की तैयारियां शुरू हुईं, लेकिन सुमेधा के चेहरे पर वह तनाव नहीं था जो आमतौर पर एक लड़की की माँ के चेहरे पर देखा जाता है। घर में हंसी-खुशी का माहौल था। किसी तरह की कोई अनचाही डिमांड की लिस्ट उनके सिर पर नहीं लटक रही थी।
और फिर वह दिन भी आ गया जब प्रकाश जी अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ पूरे छह सौ किलोमीटर का सफर तय करके सुमेधा के दरवाजे पर बारात लेकर पहुंचे। कोई दिखावा नहीं, कोई फिजूलखर्ची नहीं। सब कुछ बहुत ही सादगी और प्रेम के साथ संपन्न हुआ। तन्मय के परिवार ने काव्या को जो मान-सम्मान दिया, उसने सुमेधा और रविशंकर का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया। विदाई के वक्त प्रकाश जी ने सुमेधा के हाथ जोड़कर कहा था, “आप रोइए मत बहन जी, हम आपकी बेटी को विदा करके नहीं ले जा रहे, बल्कि अपने घर की लक्ष्मी को अपने साथ ले जा रहे हैं।”
आज काव्या अपनी ससुराल में बेहद खुश है। उसकी नौकरी, उसके रुतबे और उसके विचारों को वहाँ पूरा आदर और सम्मान मिलता है। जब भी सुमेधा अपनी बेटी की खिलखिलाती हुई आवाज फोन पर सुनती है, तो उसे अपने उस फैसले पर गर्व होता है जो उसने उस सर्द शाम को लिया था। और साथ ही, उसे अपना वह प्रण भी याद रहता है जो उसने अपने बेटे आर्यन के लिए किया था। सुमेधा जानती है कि समाज को बदलने के लिए सिर्फ उपदेश देना काफी नहीं है; बदलाव की शुरुआत हमेशा अपने घर की दहलीज से ही करनी पड़ती है। अगर हर लड़की का पिता और हर लड़के की माँ यह तय कर ले कि वे रिश्तों का सौदा नहीं करेंगे, तो शायद किसी भी आंगन में बजने वाली शहनाई कभी आंसुओं और कर्ज के बोझ तले नहीं दबेगी।
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लेखिका : रीमा साहू