दीपावली की खुशनुमा दोपहर पूरा परिवार सुबह की पूजा व खाना प्रसाद के बाद शाम को होने वाली पूजा की तैयारी में लगा था। निर्मला देवी बैठी बैठी अपनी बहु वृन्दा को रंगोली बनाना समझा रही थी, वृंदा भी बहुत मन से अपनी सास के द्वारा बनाई हुई रंगोली के तौर तरीके सीख रही थी।इतने में छोटा सा प्यारा सा बिट्टू दौड़ता हुआ आता है और दादी से अपनी तोतली आवाज में पूछता है दादी दादी यह मां किसके पैर बना रही है?…
दादी उसे प्यार से गोदी में बैठाते हुए कहती है ,अरे प्यारे बिटवा तेरी मां साक्षात लक्ष्मी है और मां लक्ष्मी के कदम बना रही है रात को मां लक्ष्मी की जब हम पूजा करेंगे तो इन्हीं कदमों पर अपने पैर रखते हुए मां लक्ष्मी अंदर आएंगी और हमारे घर को खुशियों से भर देंगी, और हमारे बिटवा को बहुत सारी मिठाई और खूब सारे पटाखे देगी,खूब सुख समृद्धि देगी, हमारा बिटवा बड़ा होकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा। दादी की इतनी बात सुनकर बिट्टू बहुत खुश हुआ और नाचता हुआ , अपने विद्यालय की एक कविता गाता है
गली गली में दीप सजे है,
देखो तो दिवाली आई।
मिठाई और ढेर सारे पटाखे,,
अपने देखो संग संग लाई।
बिट्टू की कविता को सुनकर दोनों सांस बहु मुस्कुराने लगी।
पास ही में बिट्टू के पापा किशनचंद बैठे थे और इस वार्तालाप को बड़े ध्यान से सुन रहे थे।…
किशन चंद को अपने पैसे पर ,अपनी पढ़ाई लिखाई पर अपनी हाई सोसायटी पर बहुत घमंड था वह अपनी पत्नी को अपने योग्य न समझता था।
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पर दादी कैसे पता चलेगा की लक्ष्मी माता आई है कि नहीं ? थोड़ी ही देर में बिट्टू के बालमन में एक सवाल आता है तो वो अपनी दादी से पूछता है,जिद करने लगता है,बताओ ना दादी ,बताओ ना।
तब निर्मला जी ने यूं ही बच्चे का मन रखते हुए कहा अरे बिटवा मां के पैर लाल ही रहे तो समझना लक्ष्मी मां अंदर आ गई और यदि मां के पैर काले हो जाएं तो समझना मां नहीं आई और वो नाराज़ हैं….
रात की पूजा के बाद किशनचंद ने वृंदा से अपने कुर्ते पजामे व दुकान के गल्ले के सारे रुपए लाने को कहा वृंदा ने पूछा इतनी रात आप कहां जा रहे हो जी ?,और यह रुपए किसलिए ?
किशन चंद ने कहा दोस्तों ने जुए के शगुन के लिए बुलाया है उसी के लिए जा रहा हूं वृंदा ने कहा यह कहां तक सही है कि इतनी मेहनत से कमाया हुआ धन अंधविश्वास के कारण जुए में लगा दिया जाए।
किशन चंद ने कहा ये शगुन है ,हाई सोसाइटी में इसी तरह दीपावली का त्यौहार पूरा माना जाता है । पर तुम कैसे समझ सकती है हाई सोसायटी क्या होती है। उसके लिए हाई सोसायटी का होना भी तो चाहिए और तुम ठहरी गांव देहात की, ऐसा कह कर किशन चंद वृंदा को लगभग धक्का देते हुए उसका अपमान करते हुए अपने पैसे के घमंड में अकड़े मुनीम के साथ पैसे का थैला लेकर निकल गए वृंदा का सर दीवार से लगा और वह अचेत होकर गिर गई ….
यह वही पल था जब मां लक्ष्मी अपने कदम घर में रख रही थी और वृंदा के अपमान के साथ माता लक्ष्मी को अपना अपमान लगा, क्योंकि जिस घर में नारी की पूजा होती है नारी को सम्मान मिलता है उसी घर में देवी देवता, माता लक्ष्मी निवास करती है ऐसा कहा जाता है। मां लक्ष्मी उसी समय ही उल्टे पांव वापस लौट गई।
उधर किशन चंद क्लेश में घर से निकला था ,वह रकम पर रकम हारने लगा,उसका धैर्य खत्म होता जा रहा था,उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया और वो धीरे-धीरे अपनी सारी मेहनत की कमाई हार बैठा । उसने खूब शराब भी पी ली।जब देर रात उसका मुनीम उसे घर छोड़ने आया तो लड़खड़ाते किशनचंद को अचानक रंगोली में बने मां लक्ष्मी के पैर काले नजर आने लगे…..
कहते भी हैं ना घमंड तो रावण का भी नहीं रहा था, आज किशनचंद का भी घमंड से भरा सिर अब झुक चुका था।
#घमंड
ऋतु गुप्ता
खुर्जा बुलंदशहर
उत्तरप्रदेश