सहारा – संजय सिंह।

 रात का समय था ।तकरीबन 10:00 बज रहे थे ।राम पूरा दिन काम करके अपनी थकान को मिटाने के लिए बिस्तर पर लेटा हुआ था। सोने की तैयारी कर रहा था। उसके बिस्तर के सामने एक मोमबत्ती जल रही थी ।उसी की रोशनी सारे कमरे को रोशन कर रही थी।राम मन ही मन में सोचने लगा कि क्या बात है?

आज उसका मन बहुत परेशान है ।पूरे दिन का लेखा-जोखा मन में सोच कर उस परेशानी के कारण को ढूंढने लगा। तो एकाएक  वह परेशानी सामने आ गई ।अर्थात उसकी परेशानी का कारण उसके सामने आ गया। यह सोचने लगा जब तक उसकी मां इस संसार में उसके साथ थी ।तब तक उसे किसी भी बात की चिंता नहीं होती थी

और वह समय उसके जीवन का सबसे सुखमय समय था। वह बेफिक्र होकर सुबह घर से निकल जाता था और पूरा दिन काम करके शाम को घर पर आकर मां को देखकर शांति प्राप्त करता था। उसे किसी भी प्रकार की कोई चिंता नहीं होती थी। उसका मन जानता था कि कोई भी मुश्किल आ जाए

परंतु हमेशा उसकी मां उसके साथ है और उसकी मां उसके लिए सबसे बड़ा सहारा है। परंतु आज मां ही संसार से चली गई है। अब उसे कोई भी सहारा नजर नहीं आता। वह जीवन को सिर्फ उठने गिरते जी रहा है। 

परेशानियां छोटी होते हुए भी बड़ी होकर उसके समक्ष खड़ी हो जाती हैं और उसे अकेले ही उन परेशानियों का सामना करना पड़ता है। परंतु वह परेशानिया ऐसी है जो उसका पीछा नहीं छोड़ती है ।परंतु जिस समय मां थी ।तब तो परेशानियां ना के बराबर थी ।अगर कोई परेशानी सामने आई थी। तो वह कुछ पल के लिए होती थी और मां के होते ही

वह परेशानी सदा के लिए समाप्त हो जाती थी ।अजब जादू था ।मां के होने का ।परंतु अब उसे एहसास हो रहा है कि उसके जीवन का सबसे बड़ा सहारा अब उसके पास नहीं है। वह काम पर चला जाता है और अपनी छोटी बेटी को किसी और के घर पर छोड़ जाता है। जब तक वह कम से नहीं लौटता ।

तब तक उसकी सांस अटकी  रहती है  कि घर पर बेटी क्या कर रही होगी? फिर मन में यह सोचता कि जिनके घर पर उसको छोड़ा है। वह उसको संभाल  लेंगे ।परंतु मन कभी नहीं मानता। परंतु जिस समय मां थी। उस समय बेटी की चिंता बिल्कुल नहीं होती थी ।

फिर मन में यह सोचता कि जल्दी ही बेटी स्कूल जाना शुरू कर देगी और उसे समय वह स्कूल में उसके साथ ही होगी। तो सभी परेशानियों का हाल हो जाएगा। परंतु फिर सोचता जब उसे छुट्टियां होंगी तो फिर से उसे किसी के घर पर रहना होगा। तब क्या होगा? वह यह सब सोचकर बहुत परेशान हो जाता।

सोचता काश मां जीवन भर मेरे साथ रहती  ।परंतु भगवान ने बड़ी जल्दी से अपने पास बुला लिया और मुझे बेसहारा बनाकर रख दिया। जीवन कैसे कटेगा? आगे क्या होगा? यह सब सोच कर वह परेशान हो रहा था ।नींद मानो कभी उसे आई ही ना हो और ना ही आने की कोशिश कर रही हो। इसी कशमकश में और चिंतित हो जाता। उसे ऐसे लग रहा था जैसे वह अपने जीवन को बहुत बड़े बोझ के साथ जी रहा है ।जीने का कोई भी आनंद उसे नहीं आ रहा है ।

वह सिर्फ समय काट रहा है। दिमाग में सोचता कि यह भी कोई जीवन है ।जीवन तो मां के रहते था। परंतु मन के जाने के बाद अब यह जीवन बोझ लगने लगा है। किसी ने सच कहा है माता-पिता के पांव के नीचे जन्नत होती है। वह आज उसे समझ आ रहा है। मन में आता की मां जहां भी होगी। मुझे अवश्य देख रही होगी और परेशान होती होगी कि मेरे बेटे की

क्या दशा हो गई है? काश! वह उसके साथ होती और उसकी सारी परेशानियों को दूर कर देती। फिर लंबी सांस लेकर वह बस यही कहता कि एक दिन वह भी आएगा। जिस दिन वह अपनी मां से  मिलेगा और उसे  अपने जीवन की हर एक परेशानी बताएगा ।मन में आता है कि  मां तेरे जैसा सहारा दुनिया में कभी कोई नहीं हो सकता।

बिना सहारे के इस संसार में जीना बहुत ही दुश्वार है। माता-पिता का सहारा इंसान को जीवन जीने की दिशा देता है। माता-पिता के संसार से चले जाने के बाद व्यक्ति का जीवन दिशाहीन हो जाता है। उसे यह संसार बोझ रखना लगता है। अब मैं जानता था

कि वह अपनी मां से  कभी नहीं मिलेगा ।जैसा है उसे वैसा काटना ही होगा और मजबूत होकर आगे बढ़ना होगा। एक समय मां उसका सहारा होती थी।  मां का सिखाया हुआ वह ज्ञान उसके काम आ रहा है। जिसमें मां उसे कहती थी कि जिस प्रकार हम अपने बच्चों का सहारा बने हैं।

वैसे ही आपको अपने बच्चों का सहारा बनना है और मजबूती के साथ इस जीवन को जीना है। यह सब सोच कर राम अपने मन को मजबूती के साथ बांधकर हौसला रखता है और मन में प्रण करता है कि वह भी अपनी बेटी के लिए अपनी मां की तरह बेजोड़ सहारा बनेगा और उसे संसार में मजबूती के साथ आगे बढ़ना सिखाएगा। यह सब सोचते हुए एकाएक वह सो जाता है।

धन्यवाद।

लेखक: संजय सिंह।

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