बिल माँ बाप का रामु अपने दादा दादी के साथ गाँव में रहता था. जब वो 5 साल का था, दादी भी नही रही, इसलिए दादा ने जैसे तैसे बड़ा किया। 14 साल की उम्र में दादा भी साथ छोड़ गए। पेट भरने के लिए उसने पढ़ाई छोड़ दी और एक स्कूटर रिपेयर की दुकान पर काम करने लगा।
मेहनत ओर समय के साथ साथ वो अच्छा मेकेनिक बन गया और आज अपनी अलग दुकान चला रहा है। शादी के कुछ ही महीनों बाद उसकी पत्नी राधिका ने अपनी खुद की दुकान खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जिससे उसकी मेहनत और हुनर किसी ओर की जेब में न जाएं।
इस काम के लिए उसने अपना सोना चांदी सब रामू क़ो दे दिया ओर उसने गहने बेच कर अपनी खुद की एक दुकान उसी बाजार में शुरू कर दी। लोग उसे ओर उसके काम से वाकिफ थे, इसलिए बिना किसी परेशानी के धंधा चल निकला। इसी के साथ एक खुश खबरी ओर आ गई, की रामू बाप बनने वाला हैं। समय बीता और राधिका ने एक प्यारी सी लड़की को जन्म दिया, दोनों बहुत खुश थे और बेटी का नाम खुशी रखा।
खुशी पैदा होने के बाद राधिका बीमार रहने लगी ओर दिन ब दिन कमजोर होती गई। बहुत इलाज कराने के बाद भी उसकी सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा था।
खुशी मां के हर छोटे बड़े काम में हाथ बटाती ओर समय से पहले ही समझदार हो गई। खुशी जब 7 साल की थी, एक दिन अचानक राधिका की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई ओर इलाज के दौरान ही वो खुशी ओर रामू को अकेला छोड़ कर लिए चली गई।
पत्नी के गुजर जाने के बाद रामु को खुशी की चिन्ता होने लगी, वो अच्छी तरह जनता था कि बिन मां बाप के बच्चों की क्या दशा होती हैं। रामू ने दूसरी शादी करने का फैसला किया ओर कुछ ही महीनों बाद कोमल नाम की लड़की से शादी कर ली। कुछ दिन तो सब ठीक रहा,
फिर सौतेली मां ने अपने रंग दिखाने शुरु कर दिए ओर खुशी से घर के सारे काम करवाने लगी। कोमल के मायके वाले भी आए दिन वहीं पड़े रहते और कोमल को सौतेली बेटी के खिलाफ भड़काते रहते। खुशी सब समझती थी पर कुछ नहीं बोलती थीं बस मुस्कुरा कर काम करती रहतीं।
कुछ समय बाद राजू को पता चला की कोमल मां बनने वाली हैं तो वो बहुत खुश हुआ। परन्तु उसकी ये खुशी ज्यादा दिन नहीं रहीं, क्योंकि एक दिन कोमल बाथरूम में गिर गई ओर उसका मिस कैरेज हो गया। ज्यादा ब्लीडिंग होने की वजह से खून ओर पेसो की जरूरत पड़ गई।
ऐसे वक्त में कोमल के मायके वाले उसे अकेला छोड़कर गांव चले गए परन्तु खुशी ने मां की बहुत सेवा की और उसे पूरा आराम दिया।
जैसे मां बच्चों को पालती हैं, वैसे ही खुशी अपनी मां को पाल रही थीं। रामू सब देख समझ रहा था और एक दिन खुशी को बोला, कोमल तुम्हारे साथ कितनी ज्यादती करती हैं फ़िर भी तुम उसकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ रही हो। खुशी पापा से बोली, मां मुझे बेटी माने या न माने पर मैंने उन्हें हमेशा अपनी मां समझा है।
मैं किस्मत वाली हूं क्योंकि बहुत से बच्चे तो ऐसे भी होते हैं जिन्होंने मां बाप को कभी देखा ही नहीं। कोमल लेटी हुई बाप बेटी की सब बाते सुन रही थी और उसके बाद अपने आंसुओं को रोक नहीं पाई और उठकर खुशी को गले लगा लिया ओर बोली, बेटी, मुझे माफ कर दो, मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई।
तुम्हारी बातों ने मेरी आँखें खोल दी और मुझे रिश्तों कि पहचान करवा दी. अपने वो नहीं होते जिनसे खून का रिश्ता होता हैं बल्कि वो होते हैं जो दिल से बनाए ओर निभाए जाते हैं।
आज के बाद तू मेरी बेटी बनकर रहेगी ओर मैं गर्व से सबको बताऊंगी कि मैं खुशी की मां हूं। उस दिन के बाद से रामू कोमल और उनकी इकलौती बेटी खुशी, मिलजुल कर प्यार से एक दूसरे का “सहारा ” बनकर जिंदगी में आगे बड़ने लगे.
साप्ताहिक प्रतियोगिता
शब्द – सहारा
लेखक
एम. पी. सिंह
Mohindra Singh
स्वरचित, अप्रकाशित