सहारा – मधु वशिष्ठ

डोर बैल की आवाज सुनकर भाभी बाहर गईं। थोड़ी देर में उनकी चिल्लाने की आवाज सुनकर मैं भी बाहर निकली तो मैंने देखा भाभी बाहर खड़े कुछ सफाई कर्मचारी जैसे दिखने वाले लोगों से जोर जोर से बोल रही थीं।  कहां काम करते हो तुम ? क्या सरकार तुम्हें तनख्वाह नहीं देती ?

जब तुम्हें मैं कह रही हूं शादी का कार्ड या पता दे जाओ, तो मैं पैसे भिजवा दूंगी। वह तुम्हारे पास है नहीं। अगर तुम्हें मैं पैसे नहीं देती तो तुम मेरे पति को और मेरे घर को कोसोगे।

वह आदमी जो सवेरे से निकल कर के मेहनत करके रात को घर में पैसे ला रहा है,  “वह सिर्फ इसलिए  नरक में जाएगा क्योंकि उसने तुम्हारे झूठ बोलने पर तुम्हें पैसे नहीं दिए”। वह लोग तो भाग चुके थे, पर भाभी बड़बड़ातीं हुई अंदर आ रही थी।

             क्या हुआ?   मैंने भाभी से पूछा, तो वह बोलीं ,घर में हर थोड़ी देर में कोई ना कोई बहाना लगा कर के कोई मांगने के लिए आ जाते हैं। पहले बैल बजाते हैं,

आटा और खाने का सामान इनको चाहिए नहीं ,इन्हें सिर्फ पैसे ही दे दो।  भिखारी को भीख देना कोई दया  और सहारा थोड़े ही ना है, यह तो इनके धंधे को बढ़ावा देना है। 

          भाभी की बात तो सही थी पर——–उन्होंने बताया पहले मेरे  मन में भी दया भाव कूट-कूट कर भरा था घर पर आ कर मांगने वालों को कुछ भी देने से मुझे खुशी ही होती थी,

और मेरी यही कोशिश होती थी कि घर में आने के बाद कोई भूखा या खाली हाथ ना जाए। मुझे अच्छा लगता था कि मैं उनके कोई काम आए और उन्हें सहारा दे सकती हूं।

          वह बोलीं, कुछ दिन पहले की बात है हम चौरासी कोस की यात्रा करने का संकल्प लेकर वृंदावन गए ,लेकिन आदत ना होने के कारण और पैर में अत्यधिक छाले और दर्द होने के कारण अधूरी यात्रा छोड़ कर हम घर को आ गए। तब से वैसे ही आत्मग्लानि से मन भरा हुआ था

एक अपराध बोध सा सता रहा था । कुछ दिनों के  बाद बाहर दो औरतें और एक उनकी बच्ची ने बैल बजाई और बोली हम वृंदावन जा रहे हैं, तुम्हारे नाम की ज्योति जला देंगे कुछ पैसे दे दो। अत्यंत श्रद्धा भाव से मैंने उन्हें ₹51 दिए लेकिन उन्होंने बोला इससे तो आधा किलो घी भी नहीं आएगा हम तुम्हारे नाम की जोत जलाएंगे प्रसाद बाटेंगे ,

घर से कुछ और पैसे ले आओ। अंदर जाकर मैं और पैसे भी ले आई उसके बाद मुझे खुद नहीं पता कि मुझ पर क्या वशीकरण हुआ, 

ठाकुर जी के नाम पर वह मुझ से घर से साबुन तेल इत्यादि मंगवातीं गई ,और मैं उन्हें देती रही ।अगर तुम्हारे भाई साहब समय पर नहीं आते तो उस दिन ना जाने क्या हो गया होता। यह सोच कर के मेरा दिल आज भी घबरा जाता है। उन्हें आया देखकर वह तीनों ही भाग गई थी। काफी देर बाद मेरी तंद्रा टूटी थी।

असुरक्षा का भाव इस हद तक समा गया था कि काफी दिनों तक तो मैं सहज ही नहीं हो पाई। उस दिन से मैं कभी भी किसी भी भिखारी को पैसे ना देने का प्रण किया है और परमात्मा से भी ऐसा करने पर  मुझे क्षमा करने की प्रार्थना की है। कई बार तो 

किसी भी भगवान का रूप बनाकर या किसी भी देवी देवता की फोटो हाथ में लेकर जब कोई भीख मांगते हुए देखती हूं तो अपने आप को काबू करना बेहद मुश्किल हो जाता है जगत  के पालनहार ,जगत को देवन हार, के क्या सड़कों पर कोई भी रूप  बना कर भीख मांगेंगे ? 

     हमें कभी दया नहीं करनी चाहिए,  हालांकि ऐसा सोचना ही बहुत शर्मनाक है। लेकिन ऐसा ही एक किस्सा मुझे याद आया जब मदर डेरी पर दूध लेते हुए दो प्यारे से बच्चे मेरी और एक आइसक्रीम खाने की अपेक्षा से देख रहे थे, दया और प्रेम से द्रवित होकर मैंने उन दोनों के लिए आइसक्रीम मंगवाई। मुझे खुद नहीं पता इतनी देर में बहुत सारे बच्चे कहां से आ गए और मुझे अपना पर्स संभालना ही मुश्किल हो गया। 

   भाभी ने बताया मैं नियमित रूप से अंध विद्यालय और विश्वसनीय संस्थाओं में ही दान देतीं हूं। किसी जरूरतमंद की सहायता भी मैं जरूर करती हूं लेकिन अपने घर के बाहर किसी भी रूप में कोई भी मांगने के लिए आने वालों को  पैसे तो कभी भी नहीं देती। उन्होंने मुझसे भी यही आग्रह करा कि कभी किसी को पैसे मत देना ।तुम्हारे दिए हुए पैसे सिर्फ भिखारियों की संख्या बढ़ाते हैं ,और अपराध को बढ़ावा देते हैं। हां!  शायद भाभी बिल्कुल सही कह रहीं थी।

            पाठक गण यह एक सत्य कथा है और इसी प्रार्थना के साथ कि कभी भी किसी भी भिखारी को पैसे देकर अपराध को ना बढ़ावा दें मैं इस कहानी को समाप्त करती हूं। 

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

सहारा विषय के अंतर्गत लिखी गई कहानी।

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