प्रभात -बेला की सूर्य -किरणें क्षितिज पर आगमन कर चुकी थीं। धरती पर सुनहरी रश्मियाँ बिखर कर अपने आने का आभास से जनजीवन में उर्जा भर रही थीं। वृक्षों पर पक्षियों का चहचहाना,गायों का रंभाना सूर्योदय होने का प्रमाणित कर रही थीं। कुछ लोग अपने दैनिक जीवन कार्य में संलग्न हो चुके थे
और कुछ संलग्न होने के उपक्रम में सचेत हो रहे थे। शांत वातावरण धीरे-धीरे बच्चे, बूढ़े और युवाओं की ध्वनियों से गुंजायमान हो उठा। पुरुष अपने अपने कार्यस्थल पर जाने के लिए तैयार होने लगे, बच्चे स्कूल के लिए और गृहणियां अपने गृहकार्यों में लग गईं ।
विकास बाबू के घर की व्यवस्था अभी भी जीवन -पटरी पर पूर्णतया नहीं आ पाई थी । आने के उपक्रम में हो रही थी। शोक-संतप्त परिवार अपने शोक से उबर नहीं पाया था।
एक महीना बीत गया था। करीबी नाते रिश्तेदार क्रियाकर्म के पश्चात् ही सांत्वना देकर वापस चले गए थे। अब केवल परिवार के सदस्य ही रह गए थे जो अपनी जिंदगी को फिर से गतिमान बनाने के प्रयास में लगे हुए थे।
सबसे अधिक आघात तो मिताली को लगा। इस कारण उसका जीवन स्थिर सा हो गया। न किसी से बात करना, न ही अपने बच्चों पर ध्यान देना, जैसे उसे कुछ भी नहीं सुहाता था। हां, कभी रसोईं में कुछ काम कर लेती थीं , वह भी नितांत एकांत भाव से, या कभी चुपचाप अकेले बैठी रहतीं। उन्हें देखकर ऐसा लगता जैसे आत्ममंथन कर रही हैं।
यह तो स्वाभाविक ही है कि जिसके* सहारे वो स्वाभिमान पूर्ण जीवन बीताने के मधुर स्वप्न देख रही थीं, वह ही छोड़कर चला गया।
पूरा परिवार बड़ी हंसी-खुशी से चल रहा था कि एक दिन विमल (विकास के बड़े भाई, मिताली के पति) को तेज बुखार चढ़ा। एक सप्ताह भी नहीं हो पाया था कि एक प्राणघातक इंजेक्शन से उनकी मृत्यु हो गई। पत्नी और दो बच्चों को छोड़कर वो इस संसार से प्रस्थान कर गए।
बच्चे छोटे ही थे। बेटा मनु दस साल का और बेटी मधु चार साल के थे। दोनों मां को देखते पर कुछ कह नहीं पाते।वे भी उदास ही रहते।
विकास और सुनीता (विकास की पत्नी) ने देखा कि भाभी (मिताली) पति के शोक से मुक्त नहीं हो पा रही हैं। बच्चों से भी कोई बात नहीं करतीं। यहां तक कि उनकी बेटी सुवासा,जिसे हर समय अपने पास खिलाती रहती थीं, अब पास भी नहीं जातीं हैं।
एक दिन दोनों लोग मिताली के कमरे में गए, देखा -कमरे में अकेली बैठी हैं और दीवार पर लगे विमल और अपनी शादी की फ़ोटो को एकटक निहार रही थीं।
दोनों उनके पास जाकर बैठ गए।तब मिताली ने अपनी नज़रें उनकी ओर फेरी। सुनीता ने कहा, “भाभी हम आपको लेने आए हैं।कमरे से बाहर निकलिए।आपको सुवासा ढ़ूढ़ती है। इधर उधर नज़रें घुमाती है, लगता है कि आप ही को तलाश रही है।”
” अब मेरे जीवन में निराशा के सिवाय रह ही क्या गया है। मुझसे वह दूर ही रहे तो अच्छा है। मैं अपना साया उसपर नहीं पड़ने देना चाहती।”आंखों में आंसू भरे मिताली ने कहा। पुनः विकास बाबू बोले, ” भाभी जीवन जीने के लिए है, निराश होने के लिए नहीं। जन्म मृत्यु पर मनुष्य का वश नहीं होता ।
यह तो आप भी जानतीं हैं।हम सब भइया के जाने से दुखी हैं, पर जीवन तो चलता रहता है न। आपको और बच्चों को कोई कमी नहीं रहेगी, यह मेरा वादा है। भईया का सहारा छिन गया है, पर मैं अभी हूँ ।” “हां भाभी ये ठीक कह रहे हैं। दुख तो हम सभी को है, लेकिन बैठा तो नहीं जा सकता? जिंदगी चलने का नाम है,
रुकने का नहीं। उठिए, बच्चों को देखिए। उन्हें भी तो आपकी आवश्यकता है।” कहते हुए सुनीता ने भाभी की बांह पकड़ कर लीविंग रुम में ले आई और अपनी बच्ची सुवासा को उनकी गोद में डाल दिया। ख़ुद चाय बनाने चली गई।
विनय बाबू ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
देश स्वतंत्र हुआ तो देशभक्तों को पेंशन राशि मिलनी शुरू हुई। विमल बाबू को भी इसका लाभ प्राप्त हुआ। उनकी मृत्यु के बाद वह पेंशन मिताली को मिलने लगी। मिताली पेंशन लातीं और विकास बाबू के हाथों में रख देतीं।
चार पांच महीने के पश्चात् विकास बाबू ने कहा -” भाभी,अब पेंशन आप रखिए और बच्चों की फीस आदि का जिम्मा आप पर रहेगा। मैं इसलिए कह रहा हूं कि इससे आप व्यस्त रहेंगी। कुछ कमी बेस होगा, मैं तो हूं ही।आप निश्चिंत रहिए।”
दिन महीने साल गुजरते गए।सबका जीवन कर्मपथ पर चलने लगा। बच्चे बड़े हो गए।मनु ने इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास कर ली।
अब ऐडमिशन फीस की समस्या आई तो विकास बाबू ने गांव के खेत को बेचकर पैसे का इंतजाम कर लिया और मनु के साथ रुड़की जाकर उसके हास्टल वगैरह का इंतजाम करके वापस लौटे।घर आकर मनु के खाने रहने आदि की पूरी जानकारी सभी को बताया।
सबकी ख़ुशी का पारावार नहीं था। साथ ही यह गर्व हुआ कि मनु ने समाज में हम सबका सिर ऊंचा किया। मिताली की आंखों में आंसू आ गए। आंचल से आंसू पोंछते हुए बोली – ” आपने हमें बहुत*सहारा दिया।आपकी ही इच्छा और प्रयास से आज मनु यहां तक पहुँचा ।” “अरे भाभी! परिवार में सभी एक दूसरे के सहारे होते हैं। अगर एक दूसरे की ज़रूरतों को न समझा जाए तो वह कैसा परिवार। आपने भी तो हमारा साथ दिया।
घर को संभाला। समाज में हमारे घर की एकता, सौहार्द की प्रशंसा की जाती है। बहुत बड़ी बात है और अब तो मनु ने हमारा सर और भी ऊंचा कर दिया।बस इंजिनियर का पद प्राप्त कर ले,यही अभिलाषा है।” “सुनीता ने कहा, हम साथ हैं और साथ ही रहेंगे एक दूसरे के सहारे बनकर।”
” मधु बेटा, चलो आज हम सब रसोगुल्ला खाते हैं।” चाचा से यह सुनकर मधु हंसने लगी और घर का वातावरण खुशियों से भर गया।
स्वलिखित मौलिक (सर्वाधिकार सुरक्षित)
गीता अस्थाना,
बंगलुरू, कर्नाटका।