“माँ, आज फिर देर हो जाएगी?” रसोई से आती हल्की-सी खनखनाहट के बीच श्रेयांश की आवाज़ में झुँझलाहट साफ़ थी।
सावित्री ने पलटकर बेटे को देखा। चेहरे पर थकान थी, पर मुस्कान वैसे ही सजी थी जैसे बरसों से सजी रहती थी।
“बस आधा घंटा और… तेरे पापा की दवा दे दूँ, फिर नाश्ता लगाती हूँ।”
श्रेयांश ने कुछ नहीं कहा। मोबाइल उठा कर बाहर बरामदे में जाकर बैठ गया। उसके मन में कई दिनों से जमी खीझ जैसे हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा बाहर आने लगी थी। एकबारगी तो उसकी इच्छा हुई कि वो बिना नाश्ता किए और टिफ़िन लिए चला जाए। लेकिन फिर गहरी साँस लेकर खाने के मेज़ पर बैठ रहा।
सामने वही आँगन था, जहाँ कभी शामें रुक जाया करती थीं। लेकिन अब वही शामें बस बीत जाती थीं। घर पहले ऐसा नहीं था। पापा की हँसी दीवारों से टकराकर लौटती थी, माँ की आवाज़ हर कमरे में गूंजती थी और वह… वह इस सबके बीच बेफिक्र रहता था। अब सब कुछ ही धीरे-धीरे कहीं खो गया था। जब से पापा, रमेश जी, बिस्तर पर पड़े थे, घर का रंग फीका पड़ गया था।
***
तीन महीने पहले की बात थी। अचानक दफ्तर में रमेश जी को चक्कर आया और वे गिर पड़े। डॉक्टर ने कहा आधा शरीर लकवाग्रस्त हो गया है। अब लंबा इलाज और देखभाल ही एकमात्र रास्ता है।
उस दिन के बाद से सावित्री का जीवन जैसे रुक गया था। सुबह से रात तक वही दवाइयाँ, खाना, साफ-सफाई और पति की सेवा करना ही दिनचर्या में शामिल हो गया और श्रेयांश… वह बस देख रहा था, पर समझ नहीं पा रहा था कि कैसे संभाले सब कुछ।
श्रेयांश की नौकरी नई थी। शहर के एक प्राइवेट ऑफिस में काम करता था। वहाँ की भागदौड़, घर की चिंता और ऊपर से पापा की हालत सब मिलकर उसे भीतर से थका रहे थे। कभी-कभी उसे लगता, पूरी दुनिया में वही एकमात्र ऐसा है, जो बेरंग जिंदगी को ढो रहा है।
उस रात खाना खाते समय वह अचानक बोल पड़ा,
“माँ, कब तक ऐसे चलेगा? मेरी भी एक ज़िंदगी है।”
सावित्री के हाथ रुक गए। उसने धीरे से पूछा,
“क्या मतलब?”
“मतलब ये कि मैं रोज़ ऑफिस से थका हुआ आता हूँ और यहाँ भी चैन नहीं मिलता। हर समय बस बीमारी, दवा, चिंता… मैं भी इंसान हूँ माँ।”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। पापा चुपचाप लेटे हुए थे, पर उनकी आँखें सब सुन रही थीं।
सावित्री ने धीरे से कहा,
“घर में अगर मुश्किल आए तो उससे भागा नहीं जाता, साथ बैठकर उस समय को काटा जाता है।”
श्रेयांश ने झुंझलाकर कहा, “लेकिन हर चीज़ की सीमा होती है। मैं कब तक…?” वह थाली और बात दोनों ही अधूरी छोड़कर उठ गया।
उस रात सावित्री बहुत देर तक जागती रही। वह जानती थी कि बेटा गलत नहीं है, पर यह भी सच था कि हालात उसके बस में नहीं थे।
अगले दिन सुबह वह बिना कुछ बोले जल्दी ऑफिस के लिए निकल गया। दिन बीतते गए, घर में अब बातचीत कम और खामोशी ज़्यादा रहने लगी थी।
एक शाम, जब श्रेयांश ऑफिस से लौटा, तो देखा माँ पापा के पास बैठी धीरे-धीरे कुछ पढ़ रही थी।
“क्या कर रही हो?” उसने पूछा।
“तेरे पापा को रामायण सुना रही हूँ,” सावित्री ने मुस्कुराते हुए कहा।
“इनको सुनना अच्छा लगता है।”
श्रेयांश ने एक नज़र पापा पर डाली। उनकी आँखें बंद थीं, पर चेहरे पर पहले जैसी शांति व सौम्यता नहीं थी। वह कई दिनों के बाद पापा को ढंग से देख रहा था।
उस रात श्रेयांश अपने कमरे में लेटा रहा, पर नींद नहीं आई। उसे अपने बचपन के दिन याद आने लगे।
कैसे पापा उसे साइकिल चलाना सिखाते थे… गिरने पर उठाते थे… कहते थे, “डर मत, मैं हूँ न।”
उसे याद आया, जब दसवीं में उसके नंबर कम आए थे, तो वह डरते हुए घर आया था। माँ डांटने वाली थीं, लेकिन पापा ने बीच में आकर कहा था,
“अरे, नंबर से ज़िंदगी थोड़ी तय होती है। मेहनत करके आगे बढ़ेगा हमारा बेटा।”
अब वही आदमी चुप पड़ा था। और वह… उनसे नज़रें चुरा रहा था। वो आज बिस्तर पर पड़े थे… और वह उनसे दूर भाग रहा था। उस रात सोच के समंदर में गुम श्रेयांश को रात्रि के अंतिम पहर में नींद नसीब हुई।
अगले दिन रविवार था। श्रेयांश देर तक सोता रहा। जब उठा, तो घर में चारों ओर खामोशी ही ख़ामोशी थी।
“माँ?” उसने आवाज़ दी।
कोई जवाब नहीं आया। उसका दिल अचानक तेज़ धड़कने लगा। वह जल्दी से पापा के कमरे में गया। वहाँ सावित्री नहीं थी। पापा अकेले लेटे थे और उनके पास दवा की शीशी खाली पड़ी थी।
श्रेयांश घबरा गया, “पापा! माँ कहाँ है?”
पापा ने मुश्किल से आँखें खोलीं। किसी तरह उन्होंने बताया, “बेटा… तेरी माँ… सुबह से तबियत ठीक नहीं थी… चक्कर आ गया… पड़ोस वाली सीमा उन्हें अस्पताल ले गई है…”
सुनकर श्रेयांश के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह तुरंत अस्पताल पहुँचा। वहाँ सावित्री बेड पर लेटी थीं, चेहरे पर थकान और कमजोरी साफ दिख रही थी और अस्पताल की उस सफेद चादर पर लेटी माँ बहुत छोटी लग रही थीं।
“इनकी हालत ज्यादा गंभीर नहीं है, लेकिन इन्हें आराम की सख्त जरूरत है। लगता है बहुत दिनों से खुद का ध्यान नहीं रखा इन्होंने।” डॉक्टर कुछ कह रहे थे, पर उसे सिर्फ माँ का चेहरा दिख रहा था। वह चुपचाप उनके पास बैठ गया।
धीरे से उनका हाथ अपने हाथ में लिया।
“माँ…”
सावित्री ने आँखें खोलीं। उसे देखकर चेहरे पर नरमी लौट आई।
“आ गया?”
श्रेयांश कुछ पल कुछ बोल नहीं पाया।
“मैं… मैं नहीं समझ पाया माँ…”
सावित्री ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी उँगलियों को हल्का सा दबा दिया। उस स्पर्श में कोई शिकायत नहीं थी। बस थकान थी…श्रेयांश बिल्कुल चुप था। उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू ढलकने लगे थे।
वह माँ के पास बैठ गया। धीरे से उनका हाथ पकड़ा।
“माँ… मुझे माफ़ कर दो।”
सावित्री ने आँखें खोलीं और हल्की मुस्कान दी।
“पगला… माफी कैसी?”
“मैं समझ नहीं पाया… आपने अकेले कितना संभाला… और मैं बस अपनी ही सोचता रहा…”
सावित्री ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, घर में भी कोई अकेला नहीं होता है भला। बस कभी-कभी हम भूल जाते हैं कि हमें एक-दूसरे का सहारा बनना है।”
उस दिन के बाद घर में आवाज़ें धीरे-धीरे लौटने लगीं।
सुबह अब श्रेयांश की आवाज़ सुनाई देती, “पापा, दवा का टाइम हो गया।” उनके साथ बैठकर बातें करता। कभी उन्हें अखबार पढ़कर सुनाता, तो कभी पुरानी यादें ताज़ा करता। शाम को रसोई में बर्तनों के साथ उसकी हँसी भी मिल जाती। धीरे-धीरे घर में फिर से वही पुरानी गर्माहट लौटने लगी।
पापा अब कभी-कभी मुस्कुरा देते थे।
एक दिन उन्होंने बड़ी मुश्किल से हाथ उठाकर श्रेयांश की कलाई पकड़ ली।
श्रेयांश झुककर पास आया। पापा मुस्कुरा कर अटकते हुए स्वर में कहते हैं, “अब तो मेरा बेटा मेरा सहारा बन गया है।”
श्रेयांश ने हँसकर जवाब दिया,
“और आप हमेशा मेरे थे… बस मुझे समझने में देर लग गई।”
सावित्री दोनों को देख रही थीं। उनकी आँखों में सुकून था। बरसों पहले जब उन्होंने इस घर की नींव रखी थी, तो सोचा भी नहीं था कि एक दिन यही घर उन्हें जीवन का सबसे बड़ा सबक सिखाएगा कि सहारा माँगा नहीं जाता, दिया जाता है… और जो इसे समझ ले, उसका घर कभी कमजोर नहीं होता।
अब इस घर में बीमारी थी, जिम्मेदारियाँ थीं, परेशानियाँ भी थीं…लेकिन सबसे बड़ी बात अब वहाँ एक-दूसरे का साथ था और यही साथ, सबसे बड़ा सहारा बन गया था।
✍️आरती झा आद्या