“रंग बदलते रिश्ते ” – कमलेश आहूजा

मीना सुबह के काम से निपटी ही थी कि,भाभी का फाेन आ गया।मीना ने फोन उठाया-“नमस्ते भाभी,कैसे हैं आप लोग?” “मीना हम सब ठीक हैं। तुम्हें एक गुड न्यूज़ देनी थी,अंजु का रिश्ता पक्का कर दिया है।शादी भी अगले महीने है,बस तुम जल्द से जल्द आ जाना सब काम तुम्हें ही करना है आख़िर तुम इकलौती बुआ जो हो अंजु की।”मीना खबर सुनकर ख़ुश हो गई और भाभी को बधाई दी।भाभी को ये आश्वासन भी दिया,कि वो समय से पहुँच जाएगी और सब संभाल लेगी।

भाभी से तो मीना ने ख़ुशी-ख़ुशी बात करली किंतु बाद में फूट फूटकर रोने लगी..सोमिल क्यों चले गए इतनी जल्दी आप हमें अकेला छोड़कर? पति सोमिल की मृत्यु हुए साल भी नहीं हुआ था।अभी तो उस दुख से पूरी तरह से उबर भी नहीं पाई थी।कैसे भतीजी की शादी की ख़ुशियाँ मनाएगी? ये ही विचार उसके मन को विचलित कर रहे थे।

मीना को याद आने लगे बीते दिन जब वो पति सोमिल से अंजु की शादी को लेकर कितनी बातें किया करती थी।”सोमिल मैं तो अंजु की इकलौती बुआ हूँ,अंजु की शादी में ख़ूब एनजॉय करूँगी,नयी साड़ी लूँगी और नया ही सोने का सैट बनवाऊँगी।

तुम भी नया सूट बनवाना।” सोमिल मीना की भावनाओं की क़द्र करते थे,वो जानते थे कि अंजु मीना के मायक़े में सबसे बड़ी लड़की है इसलिए उसका अंजु से बहुत लगाव था। उसकी शादी को लेकर वह बहुत उत्साहित रहती थी।मीना से कहते थे-“हाँ भई,तुम अंजु की इकलौती बुआ हो तुम्हारा सजना सँवरना तो बनता है।तुम एक क्या दो नयी साड़ी ले लेना पर अंजु की शादी तय तो होने दो।”

मीना को रोते देख,बेटे रोहन ने उसे गले लगा लिया और दिलासा दिया – “माँ मैं जानता हूँ,आज आपको पापा की बहुत याद आ रही है पर क्या कर सकते हैं? पापा तो अब कभी वापस नहीं आएंगे पर मैं हूँ ना,मैं आपको अंजु दीदी की शादी में ले चलूँगा।” बेटे की बातें सुनकर मीना ने कहा-“बेटा मेरा मन नहीं है जाने का।” “माँ मन तो मेरा भी नहीं है,

पर मामा के घर में तो पहली शादी है।और आपने ही तो सिखाया था,कि हमें घर परिवार में एक दूसरे के सुख दुःख में शामिल होना चाहिए। मामा मामी हमारे दुःख में साथ थे तो अब हमें भी अपना दुख भुलाकर उनकी ख़ुशी में शामिल होना चाहिए ना।” बेटे के मुँह से इतनी बड़ी बात सुनकर मीना चुप हो गई और ख़ामोशी से अपनी स्वीकृति दे दी।

मीना बेटे के साथ शादी से दो दिन पहले भैया भाभी के घर पहुँच गई।सफ़र में थकान हो गयी थी इसलिए थोड़ा आराम करने के बाद उसने भाभी से कहा-“कोई काम हो तो बताओ।” “अरे बस तुम आ गईं,हमारे लिए यही बहुत है।तुम बस सब

मेहमानों को देख लेना।”भाभी मुस्कुराकर बोली। मीना को लगा भाभी कहेंगीं..अंजु की साड़ियाँ देख लो,मेकअप का सामान कैसा है?,शगुन में जो सामान देना है उसकी पैकिंग अच्छे से हुई है कि नही।क्योंकि पहले भाभी कुछ भी लेना देना हो मीना से ही सलाह लेती थीं। पर भाभी ने ऐसा कुछ नहीं कहा।रात को ही छोटे भैया भाभी भी आ गए।घर में रौनक़ हो गई।शादी वाला घर लगने लगा।रोहन भी सबके साथ घुल मिल गया था।

रात के खाने के बाद सब बैठे बातें कर रह थेे तभी मीना ने देखा बड़ी भाभी आँखों से छोटी भाभी को बाहर जाने का इशारा कर रहीं थीं।छोटी भाभी इशारा समझकर बाहर चली गईं।पीछे पीछे बड़ी भाभी भी चली गईं।

थोड़ी देर बाद भैया ने मीना को रसोई से पानी लाने को कहा।मीना पानी लेने के लिए जैसे ही रसोई के पास पहुँची,उसे दोनों भाभियों की बातें करने की आवाज सुनाई दी।बड़ी भाभी छोटी भाभी से कह रहीं थीं-“मीना सो जाएगी तो मैं तुम्हें अंजु की सब साड़ियाँ और जेवर दिखाऊँगी,कल तो सब रिश्तेदार आ जाएँगे समय नही मिलेगा।

तुम बस ऐसा करना,कि मीना सब शगुन की रस्मों से दूर ही रहे।मैं कहूँगी तो अच्छा नहीं लगेगा।” मीना भाभी की बातें सुनकर बहुत दुखी हुई।उसने सोचा भी ना था कि जिस भाभी ने कहा था..तुम्हें ही सब काम करना हैं,

वो ही उसे शगुन के कार्यों से दूर रखने को छोटी भाभी से कह रही है।उसकी आँखों में आँसू आ गए।मन तो किया कि वो इसी समय वापिस चली जाए।पर उसने धेर्य से काम लिया।अपने जज़्बातों पर क़ाबू रखते हुए व चेहरे पर नक़ली मुस्कान लिए रसोईघर में दाख़िल हुई।मीना को देखकर दोनों भाभियों के चेहरे का रंग उड़ गया,

उनको लगा कहीं मीना ने उनकी बातें तो नहीं सुनली.! पर मीना ने ऐसा जताया,मानो उसने कुछ सुना ही नहीं।भाभी से बोली-“भाभी, मुझे तो बहुत नींद आ रही है,मैं तो सोने जा रहीं हूँ आप भैया को पानी दे देना।”अंधा क्या माँगे दो आँखे,यही तो चाह रहीं थीं दोनों भाभियाँ कि मीना जल्द से जल्द सोने चली जाए।

दोनों चहकते हुए बोलीं-“हाँ हाँ..मीना टाइम से सो जाओ फिर सुबह जल्दी भी उठना है।क्योंकि सुबह ही सब रिश्तेदार आने वालें हैं”।मीना अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गई।

सोने की बहुत कोशिश की पर नींद तो मानो आँखों से कोसों दूर थी।ना जाने कितने सवाल उसके दिमाग में चल रहे थे।क्या औरत की सारी ख़ुशियाँ पुरुष से ही होती हैं?उसका अपना कोई वजूद नहीं होता।क्यों पति के देहांत के बाद पत्नी अपशकुनी हो जाती है?जबकि इसमें उसका कोई कुसूर नहीं होता।सारी रात मीना सोई नहीं,रोती रही।सुबह भी जल्दी उठ गई क्योंकि भाभी के मायक़े वाले आ गए थे।हल्दी की रस्म में मीना दूर-दूर रही।दोनों भाई मेहमानों की आवभगत में लगे हुए थे। उनका ध्यान मीना पर गया ही नहीं।छोटी भाभी ने एक बार औपचारिकता निभाने को बोल दिया था-“अरे मीना आओ तुम भी अंजु को हल्दी लगाओ।”पर बड़ी भाभी ने तो एक बार भी नहीं बोला।

उनको तो अपने मायक़े वालों से ही फ़ुर्सत नहीं थी। बड़ी भाभी ने अपने पिता जी को शादी की हर रस्म में यह कहकर आगे रखा,कि यह हमारे घर के बड़े हैं। उन्हें जेवर,साड़ियाँ व शगुन का सब सामान भी बड़े चाव से दिखाया।ये सच था

कि भाभी के पिता जी घर में सबसे बड़े थे क्योंकि उनके सास ससुर अर्थात् मीना के माता पिता गुज़र चुके थे।किंतु उतना ही सच ये भी था,कि भाभी के पिता विधुर थे।उनकी पत्नी यानी भाभी की माँ का भी निधन हो चुका था।


मीना को भाभी ने शादी की सब रस्मों से दूर रखा क्योंकि वो विधवा थी पर अपने विधुर पिता को हर रस्म में शामिल किया।ऐसा क्यों? बस यही द्वन्द चल रहा था मीना के मन में।क्यों विधवा स्त्री को ही अपशकुनी माना जाता है,विधुर पुरुष को क्यों नहीं?सारे बंधन स्त्री के लिए ही होते हैं,पुरुष हर बंधन से आजाद होता है ऐसा क्यों? मीना मन ही मन सोच रही थी..ये कैसा भेदभाव है विधवा और विधुर में?ये कैसी रीत है जमाने की?


मीना को इस तरह अकेला बैठे देख,भाभी के पिता उसके पास आए और बोले-” बेटी तुम भी आओ ना और अपनी भतीजी की खुशियों में शामिल हो आखिर तुम अंजु की इकलौती बुआ हो।”


“अंकल जी मैं विधवा हूँ,इसलिए मुझे शगुन की रस्मों से दूर ही रहना चाहिए।”मीना दुखी होते हुए बोली।

“भई, मैं विधुर होकर शादी की रस्मों में भाग ले सकता हूँ,तो तुम क्यों नहीं?”पिता की बात सुनकर मीना की भाभी खिसिआते हुए बोली-” मीना,पापा ठीक ही तो कह रहें हैं।”

पिता के सामने भाभी को बात बनाते देख मीना चेहरे पे व्यंग भरी मुस्कान लाते हुए बोली -“वाह भाभी,आपका भी जवाब नहीं।गिरगिट तो यूं ही बदनाम है..रंग तो इंसान बदलता है।”

“मैं तुम्हारा मतलब समझी नहीं।”

“अपने पिता जी के सामने आप मुझे शादी की रस्मों में शामिल होने को कह रही हैं और कल आप छोटी भाभी से मुझे शगुन की हर रस्म से दूर रहने को कह रही थीं।” सबके सामने पोल खुलते ही मीना की भाभी गिड़गिड़ाते हुए बोली – 

“मीना,मुझसे गलती हो गई मुझे माफ कर दो।सब कुछ अंजाने में हो गया।”

“भाभी, रिश्तों के भी रंग होते हैं।और वो तभी तक चमकते हैं जब तक उनमें प्यार विश्वास और समर्पण हो।इनके अभाव में रंग फीके पड़ जाते हैं।”कहकर मीना रोने लगी।

“मीना,मैं तुम से वादा करती हूं आज के बाद मैं कभी इन रंगों को फीका नहीं पड़ने दूंगी।अपने प्यार से रिश्तों के रंगों को और भी चमकाऊंगी क्योंकि इन्हीं से तो जिंदगी खूबसूरत होती है।”मीना की भाभी उसे प्यार से गले लगाते हुए बोली।

मीना जो भाभी के व्यवहार से अंदर तक टूट चुकी थी..उसे ये लगने लगा था, कि जैसे वैधव्य उसके लिए एक श्राप है..किंतु अब उसके मन से सारा क्लेश दूर हो गया और चेहरे पे मुस्कान आ गई।उसने खुशी खुशी शादी की हर रस्में निभाईं और भतीजी की शादी की सुखद यादें लेकर अपने घर लौटा आई।

सच यदि हम चाहते हैं, कि रिश्तों के रंग हमेशा चमकते रहें,तो उन पर ईर्ष्या द्वेष अविश्वास की धूल को कभी ना जमने दें।

कमलेश आहूजा

साप्ताहिक कहानी प्रतियोगिता के शीर्षक ” रिश्तों के भी रंग “

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