पिपासा – ऋतु यादव : Moral Stories in Hindi

#आँखों में खटकना 

रंभा के स्कूल से आते ही आठ साल के तन्मय ने अपना हाथ दिखाते हुए कहा,” मम्मी, बंसी दीदी ने मारा और नाखून भी चुभा दिए। रंभा का अंदर से जी ज़ार ज़ार रो रहा था। हे भगवान! क्या करूं इस लड़की का। कौन कहदे, पांच साल बड़ी सगी बहन है। क्या इनके पापा के चले जाने का कष्ट कम था मेरे जीवन में, जो पिछले जन्मों का बदला लेने के लिए बेटी के रूप में ये नई दुश्मन दे दी, जिसे अपना ही भाई आँखों में खटकता है।

जैसे तैसे कर उसे लाड़ कर मनाया,चल तुझे मैगी बनाकर देती हूँ। मैगी बना, बंसी को आवाज़ लगाई,तू भी खा ले। बंसी आई, खाकर फिर अपने कमरे में चल दी।

अब रंभा से भी न रुका गया, तूने क्यों मारा तन्मय को? बंसी- लापरवाही से जवाब देते हुए, पहले इसने मेरी किताब छीनी थी।

तभी दरवाज़े की घंटी बजी,तो रंभा ने देखा चाची आई हैं। चाय पानी कर, रंभा उनसे बतियाने लगी। चाची का सदा से ही रंभा पर बहुत हेज था। चाची समझाने लगी, बस बच्चे बड़े हुए और तेरा दुःख खत्म रंभा,अपना ख्याल रखा कर,ये वक्त भी गुजर ही जाएगा।

चाची कुछ दिनों यहीं रुकेगी,अपनी फिजियोथेरेपी के लिए आई हैं, यह सोच रंभा भी खुश हो गई कि कुछ दिनों मन लगा रहेगा।

दो दिन बाद फ़िर तन्मय और बंसी का युद्ध और रंभा का बंसी को डांटना।आज रंभा का सब्र का बांध टूट गया, पहले बंसी को थप्पड़ मारा फिर रोती हुई बताने लगी, चाची इस लड़की ने नाक में दम कर रखा है, बजाय सहारा बनने के रोज़ लड़के के साथ क्लेश कर परेशान करती है मुझे।

चाची ने तब तो ये कहकर बात टाल दी कि तू नाहक परेशान होती है, सबके बच्चे लड़ते हैं। जा बेटा बंसी पढ़ले तू और तू भी पड़ोस में खेल आ,तन्मय।

फिर रंभा को पास बिठा बोली, रंभा मेरी बच्ची क्या हो रहा है तुझे? तुझे नहीं लगता तू बंसी से जरूरत से ज़्यादा उम्मीद कर रही है, उसका बचपन छीन रही है।उसके पापा तो दुनिया में हैं ही नहीं, पर लगता है मां भी नहीं है। मैं आई हूँ जबसे देख रही हूँ,तू अपने दुःख,तनाव और जिम्मेदारियों के बोझ तले अपनी ही बेटी को दबा रही है।

याद कर तूने पिछली बार कब प्यार से उसे सहलाया था या उसकी परेशानी पूछी थी। वो तो नादान है,पर तू तो मां है। तेरा तन्मय के प्रति स्नेह और दुलार,उसकी खीझ और प्रतिद्वंदिता तन्मय के लिए बढ़ा रहे हैं और उसी का गुस्सा वह तन्मय को प्रताड़ित कर निकाल रही है। तू खुद ही अपने बच्चों के बीच दरार डाल रही है।थोड़ा समय बंसी को भी दे, बढ़ती बच्ची है, उसे भी प्यार चाहिए।

आज रंभा को लगा, मानो आँखें खुल गई उसकी। अश्रुपूरित नयनों से गले लग गई चाची के। फिर उठकर रसोई में जा, बंसी का फैवरेट पनीर टिक्का बना, उसके कमरे में गई।

चाची फिजियोथेरेपी कराकर आई तो दोनों मां बेटी की हँसी ठिठौली की आवाज़ सुन समझ गई कि बंसी की प्रेम की पिपासा शांत हो गई है और मां बेटी के बीच की खाई भी कुछ भर गई है।

ऋतु यादव 

रेवाड़ी (हरियाणा)

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