क्या ? सारी जिम्मेदारी बहुओं की ही है ? – सरिता कुमार 

सुधा जी बहुत सुन्दर , सुशील , सुशिक्षित , सुसंस्कृत थीं और एक सम्पन्न परिवार से आई थीं । अपने साथ परिवार भर के लिए ढ़ेरों उपहार लेकर आई थीं उसके बाद जब हनीमून पर गई तो वहां से भी घर के हर एक सदस्य के लिए उपहार लेकर आई थीं । मिलनसार स्वभाव की … Read more

रोज रोज का मिलना – विमला गुगलानी

 अभी तुलसी लेटी ही थी कि घंटी बजी। उसका बिल्कुल भी मन नहीं था उठने का लेकिन मजबूरी में उठना पड़ा। उसे मालूम था नीलू ही होगी, और वही थी, नीलू , उसकी अपनी बेटी।    नीलू आई , डेढ़ साल के बेटे वरूण को गोदी से उतारा और सोफे पर पैर फैला कर बैठ गई।” … Read more

इतना घमंड अच्छा नहीं – विभा गुप्ता 

     ” नैन-मटक्का करने से फ़ुरसत मिल गई..।कोचिंग के बहाने मैडम खूब गुलछर्रे उड़ा रही हैं।देख लेना राधिका..तेरी ये बेटी एक दिन हम सबका मुँह काला करके ही छोड़ेगी..।” अपनी देवरानी की बेटी तन्वी को कोचिंग सेंटर से वापस आने पर सुगंधा ने उस पर कटाक्ष किया।         धनाड्य परिवार से ताल्लुक रखने वाली सुगंधा को अपने … Read more

एक बहु तो बस प्यार की भुखी होती हैं !! – स्वाती जैंन

मम्मी जी आप जब तक मुझे बताएँगी नहीं हुआ क्या है आपका मुँह क्यों चढ़ा हुआ है?? मुझे नहीं समझ आएगा , आखिर एक हफ्ते से देख रही हूं अब नहीं सहन हो रहा हैं ऐसी क्या गलती हो गई है मुझसे कविता ने अपनी सास योगिता जी से कहा !! योगिता जी फिर भी … Read more

कीचड़ उछालना – लक्ष्मी त्यागी

बचपन में, हमारे बड़े कहा करते थे —“किसी पर कीचड़ उछालोगे, तो उसके छींटे अपने ऊपर भी पड़ेंगे।” किन्तु कुछ लोग भ्र्म में जीते हैं ,जैसे वो सही हैं ,और हमेशा ही ऐसे रहने वाले हैं किन्तु उन्हें सच्चाई का एहसास तब होता है जब उन पर स्वयं उस कीचड़ के छींटे पड़ते हैं।  चारु … Read more

मुझे मौत चाहिए – रवीन्द्र कान्त त्यागी

आँखें खुलीं तो मेंने खुद को हस्पताल की बैड पर पाया। सारे परिजन और डौक्टर व नर्सें मुझे घेरे खड़े थे।   “मिष्टर त्यागी, कैसा महसूस कर रहे हैं।” डॉक्टर ने कहा। “क्या हुआ है मुझे। मैं यहाँ? “ऐसा होता है। अगर सर में थोड़ी भी चोट लगे तो इंसान तत्कालीन घटना को भूल जाता है। … Read more

आदर का क्षण… – रश्मि झा मिश्रा 

.…सारे काम खत्म कर महेश फिर प्रिंसिपल के दरवाजे के पास खड़ा हो गया… “सर… सर…!” ” महेश… आ जाओ… बोलो क्या बात है… क्यों एक ही बात पर अड़े हो…!” ” सर… आप अगर चाहेंगे तो सब हो जाएगा… प्लीज सर… नहीं तो मुझे यह नौकरी भी छोड़नी पड़ जाएगी…!” ” महेश एक तो … Read more

निरादर – सुदर्शन सचदेवा 

देखो ज़रा, ये वही हाथ हैं जो कभी बेटे के लिए खिलौने खरीदते थे, और अब मोबाइल पर ऑर्डर पैक कर रहे हैं। ज़िंदगी का नाम है बदलना, लेकिन आज सविता को महसूस हुआ — बदलाव सबसे मुश्किल तब होता है, जब वह अपने ही बच्चे की नज़रों में करना पड़े। सुबह बेटे आर्यन ने … Read more

असमर्थ – के आर अमित

रात के दस बज चुके थे। चूल्हे की आख़िरी आँच धीमी पड़ चुकी थी। मिट्टी की दीवारों पर झिलमिलाती दीये की लौ के साथ एक आदमी लकड़ी की चारपाई पर बैठा था सिर झुका हुआ आँखों में नमी और सामने एक पुरानी स्कूल की कॉपी रखी थी। उसका नाम था रामनारायण गाँव के स्कूल में … Read more

नहले पर दहला – परमा दत्त झा

काम के न काज के दुश्मन अनाज के -यह रमिया थी जो चाचा श्वसुर अनुराग पर भड़क रही थी। अनुराग जी यानि उसके श्वसुर के छोटे भाई।रमिया के पति से मात्र चार साल बड़े। अनुराग जी पांच साल के थे तो भाई भावज के साथ हो गये।नौकर सा व्यवहार सब करते।मकान तक हथियाकर भगा दिया … Read more

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