अपरिचित -दीप्ति मित्तल
रात थोड़ी डरावनी हो चली थी। वैसे इसमें रात की कोई गलती नहीं थी। प्रकृति के बंधे-बंधाये नियमों के तहत धरती के उस हिस्से ने सूरज से पीठ कर ली थी जिधर दिल्ली बसता था। ये तो वो रोज़ ही किया करती थी। गलती शायद इस शहर की थी या सिया के कुछ अनुभवों की … Read more