समाज एक आईना – स्नेह ज्योति

गर्मी की छुट्टियाँ पड़ी हुई थी बच्चों की मस्तियाँ जोरो पर थी, एकाएक सनी मेरे पास आया और बोला-माँ आइसक्रीम खानी है कुछ समय पश्चात मैं,सनी और टिया पास वाली मार्केट चले गए, उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था जैसे ही हम आइसक्रीम वाले के पास पहुँचे,तो मेरे कुछ पूछने से पहले ही दोनो ने … Read more

  ‘ राम तो बनो ‘ – विभा गुप्ता 

     ” आप मेरी बात तो सुनिए…” सुनंदा ने कहना चाहा लेकिन सुमेश ने उसे बाहर करते हुए कहा, “मुझे कुछ नहीं सुनना, इस घर में अब तुम्हारी कोई जगह नहीं है।” और भड़ाक से दरवाज़ा बंद कर लिया।          सुनंदा को कुछ समझ नहीं आया,क्या करे,कहाँ जाए।उसने एक फोन लगाया और पूरी बात बताई।उधर से आवाज़ … Read more

मंजर ,१९८४ – मनवीन कौर पाहवा

मौसम शांत था।हल्की ठंडी हवा की लहरें  दीवारों से  टकराकर  उन्हें नम  करने में जुटी थीं। कच्ची धूप खिड़की से झांक क़र अपनी उपस्तिथि दर्ज क़र रही थी। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई । कोटा के जाने – माने बैंक के मैनेजर  शर्मा जी थे ।आते ही घबराई हुई आवाज़ में बोले ,“टंडन साहिब आप … Read more

बहन या मुफ़्त की सहायिका – रश्मि प्रकाश 

  “प्यार के दो शब्दों के लिए तरस गई थी वह। बचपन यूँ ही तानों में गुजर गया और अब जाकर शायद उसकी ज़िन्दगी में प्यार के रस घोलने वाला मिल गया है….आपको क्या लगता है….. चारू की क़िस्मत में भगवान ने कुछ तो अच्छा लिखा ही होगा… है ना!” गुंजन पति अनुराग से बोली। … Read more

 हक़ – विनय कुमार मिश्रा

मैंने ताई के घर की तरफ देखा। ताई नहीं थी।मैंने चैन की सांस ली। जब कभी मुझे बाहर निकलते देखती हैं।उन्हें कुछ ना कुछ बाजार से मंगाना ही होता है।कभी सब्जी, कभी दवा तो कभी दूध।तंग आ गया हूँ उनसे।जी तो चाहता है कभी सुना दूं कि खुद के बेटे को बाहर भेज दिया और … Read more

प्यार को जताना भी आना चाहिए – के कामेश्वरी

सुजाता आजकल उदास रहती है क्यों यह घर में कोई भी नहीं जान सका था । हमेशा कुछ न कुछ सोचती ही रहती है । पहले तो एक पल भी चुप नहीं रहती थी ।परिवार के लोग उनके सोने का इंतज़ार करते थे ,क्योंकि वह तब ही चुप रहतीं थी । अब उनके बोल सुनने … Read more

किन्नरों का नेग – प्रियंका मुदगिल

कुसुम, जोकि किन्नरों की टोली की मुखिया थी,सब लोग उसे कुसुमदीदी के नाम से बुलाते थे। हर किसी के दुख दर्द को अच्छे से समझती थी वो… उसने घर आते ही  आवाज दी, “”सब तैयार हो गए हैं ना….  अपने-अपने ढोलक और बाजे लेकर….और यह पुष्पा कहाँ गयी.. उसके डांस के बिना तो मंडली का … Read more

हमेशा बड़े ही सही नहीं होते –  मनीषा भरतीया

आनंदी जी स्वभाव से बहुत कड़क लेकिन अंदर से बिल्कुल मोम की तरह नरम| उनकी चाल-ढाल बोलने का अंदाज देखकर ऐसा प्रतीत होता जैसे किसी हवेली की ठकुराइन हो। एक छोटी-सी कोठरी में अपने बहु-बेटे, पोता और दो पोतीयों के साथ रहती थी। बेटा काम बाहर करता था तो महीने में दो बार ही घर … Read more

देवी-आराधना – रश्मि स्थापक

कॉलेज से आने के बाद निहारिका अपने काम फटाफट निपटा कर कॉलोनी के गरबा मंडलों मैं घूमने निकल पड़ी। इस बार शहर की नई बसी इन चारों कालोनियों के अपने-अपने पांडाल सजे हुए थे। एक महीने पहले से ही चारों पांडाल वाले जोर-शोर से तैयारियों में लगे हुए थे। कार्यकर्ता कॉलोनी के छोटे-बड़े बच्चे थे … Read more

जीने की कला – आभा अदीब राज़दान

” दादा जी आप क्यों बाज़ार चले गए , आप को रात में तेज़ ज्वर था और घुंटनों में भी इतना दर्द रहता है ,मुझे बहुत चिंता होती है आपकी । लेकिन आप कभी भी मेरी बात नहीं सुनते हैं ।” पोतबहू विनती बोली । ” बहू मैं बिलकुल ठीक हूँ न अब मुझे बुख़ार … Read more

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