“पापाजी अब घर में रह रहे हैं.. तो कुछ तो काम करना ही होगा।” – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव
खिड़की से आती धूप अब कमरे के फर्श से हटकर दीवार पर चढ़ चुकी थी। दोपहर के दो बज रहे थे, लेकिन दीनानाथ जी अभी तक अपनी उसी पुरानी आराम कुर्सी पर लेटे हुए थे। उनकी आँखों पर चश्मा टिका था, और हाथ में एक किताब थी जिसका पन्ना पिछले एक घंटे से नहीं पलटा … Read more