कभी-खुशी-कभी-गम – कुमुद चतुर्वेदी

भैया का ट्रांसफर भोपाल हो गया था,पर माँ वहाँ जाना नहीं चाहती थीं। कारण यहाँ ग्वालियर में ही उनकी दो बेटियाँ भी थीं मैं बस आगरा थी सो बच्चों की छुट्टियों में ही जा पाती थी।परंतु भैया भी मजबूर थे उनको अकेले कहाँ छोड़ते बुढ़ापे में।खैर भैया भाभी और माँ को लेकर भोपाल चले गये।वहाँ … Read more

त्रिशूल – नताशा हर्ष गुरनानी

मेरी भांजी और मेरी बेटी लगभग समान उम्र की है। दोनो बहुत अच्छी दोस्त भी है, बहनें तो है ही। मेरी बहन सिंगल मदर है तो वो अपनी बेटी को थोड़ा ज्यादा लाड़ से पालती है या ये कहा जाये कि मेरे घर मे सब उसे कुछ ज्यादा ही प्यार करते हैं। पर मै उसे … Read more

 माँ का आँचल – आरती झा आद्या

लॉक डाउन क्या हुआ, गोविंद घर ही बैठ गया। एक नामचीन फैक्ट्री में सुपरवाइजर था समीर। तनख्वाह भी अच्छी थी। रहने के लिए फैक्ट्री के अहाते में ही दो कोठरी मिली हुई थी, जहाँ वो अपनी पत्नी और तीन साल का बेटा समीर के साथ रहता था। वही कुछ जमीन पर पति पत्नी मिलकर थोड़ी … Read more

एक पोस्टकार्ड –  मुकुन्द लाल

 मैं हवाई अड्डा के वेटिंग रूम में फ्लाइट का इंतजार कर रहा था। मेरा पुत्र सरकारी सेवा में कार्यरत था। हाल ही में प्रमोशन मिलने के कारण वह अपने विभाग में सुपरिटेंडेंट बन गया था। तरक्की मिलने के बाद पहली बार वह घर आ रहा था।    वहांँ पर गमलों में रंग-बिरंगी फूल खिले हुए थे, … Read more

पहले करवा चौथ का नया चांद – शुभ्रा बनर्जी

आज शुभदा बहुत उत्साहित थी।और हो भी क्यों नहीं?कल बहू का पहला करवाचौथ है।जैसा उसने चाहा था,सुरभि तो उससे भी बढ़कर खूबसूरत है।शालीन है।कितना ख्याल रखती है उसका।यही सोचते सोचते कब आंख लग गई,पता भी नहीं चला। मां! मां! शुभदा हड़बड़ाकर उठ गई।क्या हुआ बेटा? कुछ नहीं मां,सुरभि उसके गले में झूलती हुई बोली।अभी आपके … Read more

भेदभाव रहित परवरिश… – याभिनीत

क्या तुम लोग भी,जब देखो तब,ये फिल्मी दुनिया में घुसे रहते हो,थोडा पढ़- लिख लोगे,तो कुछ बिगड़ ना जाएगा तुम्हारा…-स्वाति ने अपनी सहेलियों से कहा, पर सहेलियाँ तो सहेलियाँ ठहरी,जहाँ सगे भाई – बहन तक आपस में नहीं सुनते और ना ही कोई बात मानते,तो  सहेलियाँ कैसे मान लेती ? स्वाति की एक खास सखी,भावना … Read more

आपको और? – विनय कुमार मिश्रा

“मेरे एक नाना-नानी भी यहीं रहते हैं ना मम्मी?” “हाँ” आज पत्नी के साथ बिटिया को लेकर एडमिशन के लिए उस शहर में आया हूँ जहां से मेरा एक रिश्ता होकर भी नहीं है। मेरी पहली पत्नी इसी शहर से थी। हमारी शादी बहुत धूमधाम से हुई थी। सिर्फ सात महीने का ही साथ था … Read more

गीत – विनय कुमार मिश्रा

“भैया आप मुझसे बातें करिए, मुझे अपने गीत सुनाइये मैं सुनूँगी” मैंने हाथ पकड़ कर कहा। भैया थोड़े हतप्रभ हो मुझे देखने लगे। और मेरा हाथ छुड़ाकर दूसरी तरफ बैठ गए। मेरी आँखें भीग आईं। मुझसे नाराज नहीं हैं ये। बस मर्यादा की एक झूठी परंपरा ढो रहे हैं। भैया मेरे जेठ हैं। इनके सामने … Read more

मन में ही छुपे हैं, खुशियाँ और गम * – पुष्पा जोशी

राजेश्वर जी अपने आलीशान बंगले के कारिडोर में, आराम से आराम कुर्सी पर बैठे थे. संद्या का समय था. वे कॉलेज में हिन्दी के प्रोफेसर थे, और एक अच्छे लेखक भी.सेवानिवृत्ति  के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान अपने लेखन पर केन्द्रित कर दिया था. कल उनकी पुस्तक ” कभी खुशी कभी गम ” के लोकार्पण … Read more

मेरी बात और है-मैने तो मोहब्बत की है” – कुमुद मोहन

ट्रिंग ट्रिंग! दरवाज़े की घंटी बजी! शिवा डिनर खत्म कर अपनी छ साल की बेटी सना को सुलाने की कोशिश कर रही थी!”अब इतनी रात को कौन आ गया “सोचते मैजिक आइ से झांक कर देखा पर समझ ना सकी! कौन?कहने पर उधर से आवाज आई “मैं!मैं हूं समर! पूरे सात साल बाद वही सागर … Read more

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