शायद माँ हमें माफ कर दें – स्वाति जैन

“पापा, यह क्या? मेरी पत्नी मेरी — मेरी पत्नी लगा रखा है आपने! आपकी पत्नी कोई अनूठी फरिश्ता या परी नहीं है। जब से आए हैं, एक ही राग लगाए बैठे हैं — राखी बांध दी कि इस घर में हिस्सा नहीं देंगे, इन पैसों पर तुम्हारा कोई हक नहीं है, मैं तो मेरे घर … Read more

 सोच – परमा दत्त झा

आज राजेश मिश्र खुशी से भरे हुए थे कारण बहू राधा ने इनको मौत के मुंह से छीन लिया था। हुआ यह कि राजेश बाबू एक शिक्षक थे और बड़ी मुश्किल से बेटे को बी टेक ,एम बी ए कराया था।बेटा पढ़ाई के दौरान एक विजातीय लड़की से प्रेम करने‌ लगा था और इनके मना … Read more

स्त्री से अपेक्षा – शिव कुमारी शुक्ला

दीपा मात्र छब्बीस की उम्र में छः माह के बेटे को गोद में लिए, वैधव्य की चादर ओढ़,सूनी आंखें लिए पिता की चौखट पर पुनः खड़ी थी। शादी को अभी दो बर्ष भी नहीं हुए थे कि यश मात्र एक माह के बच्चे को उसकी झोली में डाल स्वयं काल का ग्रास बन गया। ऑफिस … Read more

झूठा अहम् – शिव कुमारी शुक्ला

आज सुबह सुबह ही परेश और निशा में फिर खट-पट हो गई।यह खट-पट उनके जीवन का आवश्यक अंग बन गई थी और परेश का पूर्ण प्यार पाने के वावजूद भी समय असमय आने वाले तूफानों ने निशा को तोड़कर रख दिया था। निशा आज तक परेश को अपनी मानसिक स्थिति नहीं समझा सकी थी। उनकी … Read more

आग पर तेल छिड़कना –  हेमलता गुप्ता

मैं तो पहले ही कह रही थी कि नूपुर को  अगर बढ़िया कोचिंग में डलवाते तो यह नतीजा नहीं आता, देख लो जैसे तैसे करके 12वीं पास हुई है! मैंने तो अपनी कृति को सबसे टॉप की कोचिंग में डलवाया था और देखो उसका इस साल ही हो सकता है 12वीं के साथ ही मेडिकल … Read more

गृहणी की भी उम्र बढ़ती है – लतिका पल्लवी

सुनाइ नहीं दे रहा है? कब से डोरबेल बज रहा है।कहाँ हो खोलना नहीं है?सुन रही हूँ।आ ही रही हूँ। मुकुंद जी की बात को सुनकर उनकी पत्नी कालिंदी जी नें जबाब देते हुए दरवाजा खोला। दरवाज़े पर पड़ोस के वर्मा जी खडे थे। उन्हें देखकर कालिंदी जी नें कहाँ आइये भाई साहब अंदर आइये. … Read more

अनजाना भय – विभा गुप्ता

          ‘ शांति पार्क ‘ की बेंच पर बैठे सुदर्शन जी अपने दो मित्र- श्रीकांत दुबे और जमनालाल से बातें करते हुए सुबह की धूप का आनंद ले रहें थे कि अचानक कलाई पर बँधी घड़ी पर उनकी नज़र पड़ी तो वो उठकर जाने लगे।      ” इतनी ज़ल्दी चल दिये..आज तो संडे है..क्या आज भी दफ़्तर..।” … Read more

दरवाजा ध्यान से बंद करना – श्वेता अग्रवाल

“मम्मा खजला(चावल के पापड़) दो ना।” अंशुल अपनी मम्मा रीमा से कह रहा था। “खजले नहीं है,अंशुल। खत्म हो गए हैं।” “मुझे नहीं पता। मुझे तो खजला खाना है। दादी ने इतने सारे खजले तो दिए थे।” अंशुल जिद करते हुए बोला। “हाँ,दिए तो थे पर दिन में तीन- तीन बार ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर सब … Read more

रिटायरमेंट – प्रतिमा पाठक

रेलवे स्टेशन की पुरानी घड़ी ने जैसे ही शाम के पाँच बजाए, राघव बाबू की ड्यूटी खत्म हो गई। आज का दिन उनके जीवन का सबसे अलग दिन था, क्योंकि यह उनकी नौकरी का आख़िरी दिन था। चालीस वर्षों की अनवरत सेवा के बाद वे आज रिटायर हो रहे थे। स्टेशन मास्टर की वर्दी उतारते … Read more

रिटायर्मेंट कभी नही – रीतू गुप्ता

भरत जी आज बहुत खुश थे .. बेटे जय की नौकरी जो लग गई थी… लाखों का पैकेज था.. अपने दोस्तों को मिठाई खिला रहे थे…. दोस्त शाम- “भरत, अब तो बेटा कमाने वाला हो गया है .. आगे का क्या प्लान है। ”  भरत- “कुछ खास नहीं यार .. बस अब रिटायर्मेंट ले लूँगा… … Read more

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