रामकिशोर जी ने अपने चश्मे को नाक पर थोड़ा ऊपर खिसकाया और हाथ में पकड़े हुए त्यागपत्र (Resignation Letter) को दोबारा पढ़ा। उनके हाथ हल्के से काँप रहे थे। सामने उनका बेटा मोहित सोफे पर टांग पर टांग चढ़ाए अपने मोबाइल में कुछ टाइप कर रहा था, उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेफिक्री थी।
“यह क्या है मोहित?” रामकिशोर जी की आवाज़ में गुस्सा कम और हताशा ज़्यादा थी। “सरकारी बैंक की पीओ की नौकरी… लोग तरसते हैं इसके लिए। तुमने बिना मुझसे पूछे इस्तीफा दे दिया? और कारण क्या है? कि तुम्हें वीडियो बनाने हैं? यू-ट्यूब पर नाच-गाना करना है?”
मोहित ने फोन परे रखा और एक गहरी सांस लेकर पिता की ओर देखा। “पापा, प्लीज। इसे ‘नाच-गाना’ मत कहिए। यह ‘कंटेंट क्रिएशन’ है। डिजिटल मार्केटिंग का जमाना है। आप नहीं समझेंगे। बैंक में मुझे महीने के साठ हज़ार मिलते थे, और यहाँ एक ब्रांड डील से मैं एक लाख कमा सकता हूँ। दुनिया बदल चुकी है, आप अपनी 1990 वाली मानसिकता से बाहर निकलिए।”
रामकिशोर जी ने पास रखी कुर्सी का सहारा लिया और बैठ गए। “बेटा, मैं मानसिकता की बात नहीं कर रहा, मैं स्थिरता की बात कर रहा हूँ। यह इंटरनेट की दुनिया बुलबुले जैसी है। आज तुम ऊपर हो, कल कोई और ट्रेंड आ जाएगा तो तुम्हें कोई पूछेगा भी नहीं। नौकरी सिर्फ़ पैसे के लिए नहीं होती, एक सामाजिक सुरक्षा और इज़्ज़त के लिए भी होती है। तुम एक बच्चे के बाप हो, आरव अभी स्कूल जाने लगा है। कल को अगर यह ‘कंटेंट’ नहीं चला, तो घर कैसे चलेगा?”
तभी रसोई से मोहित की पत्नी, वंदना, हाथ में चाय की ट्रे लिए आई। उसने ससुर की बात सुन ली थी। ट्रे मेज़ पर रखते हुए वह बोली, “बाबूजी, आप खामखां चिंता करते हैं। मोहित के चैनल पर एक मिलियन सब्सक्राइबर होने वाले हैं। परसों जो हमने नई वाशिंग मशीन ली, वो देखी आपने? वो मोहित की कमाई से ही आई है। बैंक की नौकरी में तो हम ईएमआई चुकाते-चुकाते ही बूढ़े हो जाते। अब तो हम सेलिब्रिटी बनने की राह पर हैं।”
वंदना की आँखों में एक अलग ही चमक थी—चकाचौंध की चमक। उसे लगता था कि कैमरा और लाइक ही जीवन की असली सच्चाई हैं।
पास ही बैठी रामकिशोर जी की पत्नी, सावित्री देवी, जो अब तक चुपचाप मटर छील रही थीं, बोलीं, “बहू, चमक-दमक से घर नहीं चलते। तुझे याद है हमारे पड़ोस में रहने वाला वो शर्मा जी का लड़का? वो भी दिन भर वीडियो बनाता था, मॉडलिंग के चक्कर में पढ़ाई छोड़ दी थी। आज क्या हालत है? न नौकरी मिली, न स्टार बन पाया। अब दुकान पर बैठने को मजबूर है। बेटा, हम यह नहीं कहते कि तुम तरक्की मत करो, पर जिस डाल पर बैठे हो, उसे ही काट देना समझदारी नहीं है।”
मोहित झल्ला गया। “माँ, आप फिर शुरू हो गईं? शर्मा जी का लड़का और मुझमें फर्क है। मेरे पास टैलेंट है। और आप लोग प्लीज़ अब मुझे डीमोटिवेट मत कीजिये। मैंने फैसला ले लिया है। कल से मैं फुल टाइम व्लॉगिंग (Vlogging) करूँगा। और हाँ, आप लोग भी थोड़ा अच्छे कपड़े पहनकर रहा कीजिये, मेरे वीडियो के बैकग्राउंड में सब दिखता है।”
रामकिशोर जी चुप हो गए। उन्होंने समझ लिया कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि। बहस का कोई फायदा नहीं है।
अगले कुछ महीने घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जिसे कभी ‘घर’ कहा जाता था, वह अब एक ‘स्टूडियो’ बन चुका था। ड्राइंग रूम में बड़ी-बड़ी रिंग लाइट्स लग गईं। हर वक्त कैमरा ऑन रहता।
“हेल्लो दोस्तों, स्वागत है आपका हमारे व्लॉग में! आज पापा जी हमें बताएंगे कि उन्हें मेरी नई कार कैसी लगी!” मोहित कैमरे को रामकिशोर जी के मुंह पर तान देता।
रामकिशोर जी, जो एक गंभीर और एकांतप्रिय व्यक्ति थे, असहज हो जाते। वे न चाहते हुए भी मुस्कुराने का नाटक करते क्योंकि बहू वंदना पीछे से इशारे करती। घर की निजता (Privacy) पूरी तरह ख़त्म हो चुकी थी। नाश्ता क्या बना है, घर में कौन आया है, बच्चा रो रहा है या हंस रहा है—सब कुछ दुनिया के सामने परोसा जा रहा था।
शुरुआत में तो सब अच्छा लगा। पैसे आए, नई कार आई, पड़ोसियों में वाह-वाही हुई। मोहित और वंदना हवा में उड़ने लगे। वंदना तो अब घर के काम भी नहीं करती थी, क्योंकि उसे ‘रील’ बनाने के लिए तैयार होना पड़ता था। घर का सारा बोझ बूढ़ी सावित्री देवी के कंधों पर आ गया, लेकिन वे चुप रहीं।
फिर एक दिन मोहित के दिमाग में एक आईडिया आया। “प्रैंक वीडियो” (मज़ाक वाला वीडियो)। उसने देखा था कि लोग अपने घर वालों के साथ भद्दे मज़ाक करते हैं और उस पर लाखों व्यूज आते हैं। उसे लगा कि चैनल की ग्रोथ थोड़ी रुक गई है, कुछ ‘धमाकेदार’ करना पड़ेगा।
उसने वंदना के साथ मिलकर योजना बनाई।
रविवार की दोपहर थी। रामकिशोर जी अपने कमरे में आराम कर रहे थे। उन्हें ब्लड प्रेशर की शिकायत रहती थी। अचानक घर में जोर-जोर से शोर मचने लगा।
“पापा! पापा! पुलिस आई है!” मोहित हांफते हुए कमरे में घुसा। उसका चेहरा पसीने से तर-बतर था (जो उसने पानी छिड़क कर बनाया था)।
रामकिशोर जी हड़बड़ा कर उठे। “क्या? पुलिस? क्यों?”
“पापा, वो… मुझसे गलती से गाड़ी एक्सीडेंट हो गया… वो आदमी मर गया शायद… पुलिस मुझे लेने आ रही है,” मोहित ने रोने का नाटक करते हुए कहा। वंदना भी पीछे खड़ी होकर “हाय मैया, अब क्या होगा” का विलाप कर रही थी।
रामकिशोर जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनका पूरा जीवन बेदाग़ रहा था। इज़्ज़त ही उनकी सबसे बड़ी कमाई थी। बेटे को जेल जाते देखने की कल्पना मात्र से उनका सीना जकड़ने लगा। उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी।
“बेटा… तू… तू छिप जा… मैं बात करता हूँ,” रामकिशोर जी ने हांफते हुए कहा और बिस्तर से उठने की कोशिश की, लेकिन चक्कर खाकर वहीं गिर पड़े।
जैसे ही वे गिरे, मोहित ने चिल्लाया, “अरे कैमरा बंद करो! कैमरा बंद करो! पापा को सच में कुछ हो गया!”
वंदना, जो दरवाजे के पीछे छिपकर वीडियो बना रही थी, दौड़कर आई। प्रैंक (मज़ाक) हकीकत में बदल गया था। रामकिशोर जी का शरीर पसीना छोड़ रहा था और वे अपनी छाती पकड़कर तड़प रहे थे।
आनन-फानन में एम्बुलेंस बुलाई गई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें ‘माइनर हार्ट अटैक’ आया है। समय पर अस्पताल न लाते तो कुछ भी हो सकता था।
अस्पताल के गलियारे में मोहित सिर झुकाए बैठा था। सावित्री देवी उसके सामने खड़ी थीं। उनकी आँखों में आज ममता नहीं, आग थी।
“खुश है अब तू?” सावित्री देवी ने ऐसी कड़क आवाज़ में पूछा कि मोहित सिहर गया। “बना लिया वीडियो? मिल गए तुझे लाइक्स? अरे अभागे, अपने बाप की जान की कीमत लगाकर तू नोट कमाना चाहता है? धिक्कार है तेरी ऐसी तरक्की पर।”
“माँ, मेरा मकसद वो नहीं था… मैं तो बस…” मोहित रो पड़ा।
“बस क्या?” सावित्री देवी चिल्लाईं। “तू भूल गया मोहित कि असली जीवन और स्क्रीन के जीवन में क्या फर्क होता है। तेरे उस मोबाइल के स्क्रीन ने तुझे इतना अंधा कर दिया कि तुझे अपने बाप की तकलीफ और उनकी बीमारी का भी खयाल नहीं रहा? तुझे बस ‘कंटेंट’ चाहिए था? आज अगर तेरे पिता को कुछ हो जाता, तो क्या दुनिया वाले आकर तुझे बचा लेते? या वो कमेंट करने वाले लोग तेरे आंसू पोंछने आते?”
मोहित के पास कोई जवाब नहीं था। उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। वंदना भी कोने में खड़ी रो रही थी। उसे वो नई साड़ियाँ और वाशिंग मशीन अब तुच्छ लग रही थीं।
दो दिन बाद रामकिशोर जी को अस्पताल से छुट्टी मिली। वे घर आए, लेकिन उन्होंने मोहित से बात करना बंद कर दिया। वे अपने कमरे में ही रहते। घर से कैमरा, ट्राइपॉड और रिंग लाइट्स हटा दी गई थीं, लेकिन रिश्तों में आई दरार अभी नहीं भरी थी।
कुछ दिनों बाद, मोहित का वह अधूरा वीडियो (जो उसने एडिट करके नहीं डाला था) किसी तरह उसके एक दोस्त ने देख लिया और मज़ाक में सोशल मीडिया पर डाल दिया, यह लिखकर कि “देखो कैसे प्रैंक भारी पड़ गया।”
वीडियो वायरल हो गया। लेकिन इस बार तारीफ नहीं मिली। लोगों ने गालियों की बौछार कर दी।
“कैसा बेटा है, बाप को हार्ट अटैक आ गया और ये वीडियो बना रहा है।”
“शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को।”
“अनफॉलो करो इसे।”
मोहित का चैनल, जिसे उसने अपनी नौकरी छोड़कर खड़ा किया था, नफ़रत का अखाड़ा बन गया। ब्रांड्स ने अपने हाथ खींच लिए। स्पॉन्सरशिप कैंसिल होने लगीं। जिस ‘इमेज’ को बनाने के लिए उसने सब कुछ दांव पर लगाया था, वह इमेज तार-तार हो गई।
एक शाम, मोहित छत पर अकेला बैठा था। नीचे से सावित्री देवी दूध का गिलास लेकर आईं।
“क्या सोच रहा है?” उन्होंने पूछा।
“माँ, सब ख़त्म हो गया,” मोहित ने रुंधे गले से कहा। “पापा सही कहते थे। यह बुलबुला था, जो फूट गया। अब न नौकरी है, न इज़्ज़त। लोग मुझे ताने मार रहे हैं। मैं आरव को स्कूल छोड़ने गया तो वहां भी लोग मुझे घूर रहे थे।”
सावित्री देवी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “बेटा, गिरना बुरा नहीं है, गिरकर न संभलना बुरा है। तेरे पिता जी नौकरी या पैसे के लिए नाराज़ नहीं थे। उन्हें दुख इस बात का था कि तूने अपनी निजता और अपनी संवेदना बेच दी थी। घर की चारदीवारी इज़्ज़त ढकने के लिए होती है, और तूने उसे ही बाज़ार बना दिया।”
“मैं क्या करूँ माँ? मैं पापा से नज़र कैसे मिलाऊं?”
“जा, उनके पास जा। कैमरा लेकर नहीं, दिल लेकर। माफ़ी मांग। और वादा कर कि अब ज़िंदगी को जिएगा, उसे रिकॉर्ड नहीं करेगा।”
मोहित नीचे गया। रामकिशोर जी अपनी आराम कुर्सी पर आंखें मूंदे लेटे थे। मोहित ने धीरे से उनके पैर छुए।
रामकिशोर जी ने आंखें खोलीं। बेटे का उतरा हुआ चेहरा और आँखों में पश्चाताप देखकर उनका दिल पसीज गया। पिता का दिल आखिर पिता का होता है।
“पापा,” मोहित ने सिसकते हुए कहा, “मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं भटक गया था। चकाचौंध में मुझे असली और नकली का फर्क नज़र नहीं आया। मुझे अपनी पुरानी ज़िन्दगी वापस चाहिए। मैं कल ही नई नौकरी के लिए अप्लाई करूँगा। मुझे अब और वीडियो नहीं बनाने।”
रामकिशोर जी ने उठकर मोहित को गले लगा लिया। कुछ पल तक दोनों चुप रहे।
“बेटा,” रामकिशोर जी ने शांत स्वर में कहा, “मैंने तुम्हें कभी भी कुछ नया करने से नहीं रोका था। मुझे डर तुम्हारे काम से नहीं, तुम्हारे ‘तरीके’ से था। पैसा कमाना ज़रूई है, पर सुकून और रिश्तों की कीमत पर नहीं। देखो, यह मोबाइल और इंटरनेट बुरा नहीं है, पर जब यह साधन से साध्य बन जाए, जब यह हमारे ऊपर हावी हो जाए, तो यह ज़हर बन जाता है। जैसे शराब की लत होती है, वैसे ही यह ‘अटेंशन’ (ध्यान) पाने की लत है।”
मोहित ने सिर हिलाया। “मैं समझ गया पापा। अब मैं आरव को एक ऐसा पिता दूंगा जो उसके साथ खेलेगा, न कि उसे सिर्फ़ कैमरे के लिए इस्तेमाल करेगा।”
वंदना भी वहां आ गई थी। उसने भी अपनी गलती मानी।
वक्त गुज़रा। मोहित को बैंक की नौकरी तो वापस नहीं मिली, लेकिन उसने एक प्राइवेट फर्म में अच्छे पद पर काम शुरू कर दिया। तनख्वाह पहले से कम थी, लेकिन घर में शांति थी। शाम को अब रिंग लाइट्स नहीं जलती थीं, बल्कि पूरा परिवार साथ बैठकर चाय पीता था और बातें करता था—बिना किसी रिकॉर्डिंग के।
एक दिन रविवार को, मोहित ने अपना फोन उठाया। वंदना डर गई, “क्या कर रहे हो?”
मोहित मुस्कुराया। “चिंता मत करो, वीडियो नहीं बना रहा। बस एक फोटो ले रहा हूँ। हमारी यादों के लिए, दुनिया को दिखाने के लिए नहीं।”
उसने एक सेल्फी ली जिसमें रामकिशोर जी हंस रहे थे, सावित्री देवी आरव को गोद में लिए थीं, और वंदना चाय डाल रही थी। वह फोटो कभी सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं हुई, लेकिन मोहित के बेडरूम की दीवार पर एक फ्रेम में सज गई।
उस फ्रेम में कैद तस्वीर में ‘लाइक्स’ नहीं थे, पर ‘लव’ बेशुमार था। और यही वह कमाई थी जो किसी एल्गोरिदम (Algorithm) के बदलने से कभी कम नहीं होने वाली थी। परिवार ने समझ लिया था कि असली जीवन ‘ऑफलाइन’ ही होता है, ‘ऑनलाइन’ तो बस उसका एक धुंधला सा प्रतिबिम्ब मात्र है।
लेखक : मुकेश पटेल