नियति के खेल, कोई नहीं जानता… – रोनिता कुंडु

अरे सुषमा..! पद्मिनी को नहीं बुलाया, बबलू के जन्मदिन की पार्टी में..?

रमा जी ने अपनी बहू सुषमा से कहा…

 पद्मिनी उन लोगों की पड़ोसी थी…

 सुषमा:   मम्मी जी..! आप तो जानती है उनका… आ जाएंगे एक प्लास्टिक का गिफ्ट लेकर और खाना भरपेट खाकर चले जाएंगे…

रमा जी:   सुषमा..! जिसकी जितनी औकात वह तो उतना ही करेगा ना… उनकी माली हालत तो तुझसे छुपा ना है… उसका बेटा चिकू और बबलू दोस्त है… जब मोहल्ले के बाकी बच्चे आएंगे तो तू चिकू को कितना बुरा लगेगा…? पद्मिनी तो समझ जाएगी, पर चिकू..? वह तो रोने ही लग जाएगा…

सुषमा:   रोता है तो रोए, मेरी बला से.. अब पूरे मोहल्ले के बच्चो का क्या मैंने ठेका ले रखा है..? मुझे उन्हें नहीं बुलाना बस…

 रमा जी को सुषमा की यह बात बहुत बुरी लगती है… पर एक अकेली बूढ़ी कर भी क्या सकती है..? बुढ़ापे में बहु से उलझना मतलब अपने जीवन को बोझ बनाना… खैर पार्टी शुरू होती है.. सभी बच्चे शोरगुल मचा रहे थे, तो जाहीर है यह शोर चीकू के कानों तक पहुंचेगी ही… पर पद्मीनी हैरान थी, क्योंकि चीकू ने एक बार भी बबलू के यहां जाने की जिद नहीं की…

 पद्मिनी लगभग 1 साल पहले उसी मोहल्ले में अपने परिवार के साथ रहने आई थी… और उसकी माली हालत बहुत ही खराब थी… उसके पति अमर की छोटी सी नौकरी थी और किसी तरह उनका गुजारा चलता था… पद्मीनी उसी मोहल्ले के कुछ गरीब बच्चों को कम पैसों में ट्यूशन पढ़ाती थी… सुषमा का घर उसके बगल में ही था और वह एक संपन्न परिवार की बहू थी… शाम को मोहल्ले के सभी बच्चे साथ ही खेलते थे.. बच्चे तो बच्चे होते हैं… उन्हें कहा फर्क पड़ता है अमीरी और गरीबी से..? यह तो हम बड़े दिग्गजों ने सब बना रखा है… खैर जब पार्टी खत्म हुई… घर के आखिरी मेहमान को विदा करने के लिए सुषमा दरवाजे तक आती है… तो देखती है दरवाजे पर एक तोहफा रखा हुआ है…

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तोहफा उठाकर सुषमा अंदर चली जाती है…

 रमा जी:   यह कहां से ले आई सुषमा..?

 सुषमा:   बाहर दरवाजे पर रखा था.. देखा तो चीकू लिखा था.. इसलिए ले आई… यह कहकर उसने तोहफे को खोले बिना, उसे एक तरफ फेंक दिया… 




रमा जी:   अरे..! उसे खोलो तो सही.. उन लोगों को बुलाया नहीं, पर उनके तोहफे का तो इस तरह अपमान मत करो…

सुषमा:   ऑफ हो मम्मी जी..! आप भी ना… रुकिए अभी खोल कर देखती हूं, कि कौन सा हीरा दिया है उस महारानी ने…? जो मेरी मम्मी जी इतनी उतावली हुई जा रही है…

सुषमा तोहफा खोलती है.. उसमें से एक बॉल निकलती है और एक नोट होता है… जिस पर लिखा होता है… हैप्पी बर्थडे बबलू… तेरी बॉल परसों झाड़ियों में खो गई थी ना… इसलिए यह बोल तेरे लिए…

चीकू…

  उसके बाद और लिखा होता है…

 सुषमा बहन..! बबलू के जन्मदिन के लिए चीकू ने यह तोहफा पहले से ही खरीद रखा था… सोचा था कि उसके जन्मदिन पर ही अपने हाथों से देगा… पर शायद वो नहीं जानता था, कि दोस्ती बराबरी में होती है और उसकी और बबलू की बराबरी तो हो ही नहीं सकती…

 बहन..! कुछ सालों पहले हम भी अमीर हुआ करते थे और ऐसे ही पेश आते थे गरीबों से… पर आज नियति का खेल देखो… हमारे साथ लोग वैसे ही पेश आते हैं, जैसा पहले हम आते थे… मेरे पति का व्यापार डूब गया और सारे कर्जो को चुकाने के लिए, सब कुछ बेच हमें इस छोटे से घर में आना पड़ा… तब मैं भी गरीबों को इंसान नहीं, अपना गुलाम समझती थी… शायद इसलिए आज मैं नियति की गुलाम बन कर रह गई हूं…

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तुम्हें देखकर मुझे मेरा अतीत याद आता  है… इसलिए सोचा के तुम्हें भी एक बार अपनी वह छवि दिखा दूं… जो कभी दूसरों को बोलने का मौका नहीं देती थी, आज सब के कड़वे बोल के घूंट पीकर चुपचाप जी रही है…

मैं यह नहीं कह रही कि, जैसा मेरे साथ हुआ… वैसा सभी के साथ होगा.. पर जब हमारी परिस्थिति ठीक हो तो, दूसरों की तकलीफो का मजाक उड़ाने के बजाय, उसकी तकलीफ को समझना चाहिए… वरना मेरा हाल तो देख ही रही हो बहन..!

पद्मिनी..

यह नोट पढ़कर, सुषमा के शब्द उसके जुबान में ही अटक गए और रमा जी के बार बार पूछने पर भी, वह एक शब्द नहीं कह पाती और दौड़ कर पद्मिनी के घर जाकर, उससे माफी मांगने लगती है… उसके बाद से उन दोनों की दोस्ती भी बहुत गहरी हो जाती है…

    दोस्तों..! पैसा, दौलत, शोहरत यह सब हम इंसानों के बनाए गए चोंचले हैं, वरना भगवान के सामने सिर्फ कर्मों का ही बोलबाला है… जब हमारे में सामर्थ्य हो किसी की मदद करने की, तो कर दिया कीजिए और ना हो तो बस आगे बढ़ जाइए… लेकिन किसी की गरीबी का मजाक मत उड़ाइए… वरना नियति के खेल को कोई नहीं जानता… आज जिस गरीब पर हम हंस रहे हैं… कहीं कल उसकी जगह हम ही ना हो…

धन्यवाद 

स्वरचित/मौलिक/अप्रकाशित

#नियति 

रोनिता कुंडू

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