नूपुर चार महीने की नन्ही सी सिया को अपनी गोद में ले कर बैठी हुई थी।
चारों तरफ भीड़ थी, रोने चीखने की आवाजें, शोर, और सिसकियां बता रही थी कि इस घर पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।
सामने ही नूपुर की ननद सौम्या और ननदोई अजय के शव पड़े थे। दोनों किसी रिश्तेदारी में एक कार्यक्रम में गए थे और वापस लौटते समय रात हो गई थी।
रात में पीछे से एक ट्रक बेकाबू हो कर आया और आगे जा रही कार से टकरा गया। उस कार को नूपुर के ननदोई चला रहे थे और बगल की सीट पर सौम्या बैठी थी। ट्रक के टकराते ही कार पलट गई। बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया था।
दोनों की मौका- ए – वारदात पर ही मौत हो गई थी।
सुबह दोनों के शव पोस्टमार्टम के बाद उनके घर यानि सौम्या के ससुराल ले कर आए थे। खबर मिलते ही नूपुर और उसके पति निशांत भागते हुए वहां पहुंचे।
अपनी छोटी बहन और बहनोई के शव देख कर निशांत पछाड़ खा कर गिर गए। किसी तरह लोगो ने उनको संभाला।
निशांत और उनकी बहन, बस यहीं निशांत का परिवार था। क्योंकि निशांत के पापा बचपन में ही गुजर गए थे और मां निशांत के विवाह के कुछ महीनों पश्चात मामूली सी बीमारी में गुजर गई थी।
निशांत ने ही अपनी छोटी बहन सौम्या को पढ़ाया और एक अच्छा इंजिनियर लड़का देख कर विवाह कराया था। सौम्या के विवाह को तीन वर्ष ही हुए थे। और अब सौम्या और उसके पति का ये भयानक एक्सीडेंट हो गया जिसमें दोनों की एक साथ मौत हो गई और उनके पीछे रह गई उनकी नन्ही सी बेटी सिया। जो अभी नूपुर की गोद में सोई हुई थी।
उस मासूम जान को ये पता ही नहीं कि उसके सर से उसके मां बाप का साया उठ गया है, वो अनाथ हो चुकी है।
चारों तरफ चीख पुकार मची थी। सौम्या के सास ससुर, उसके पति के बड़े भाई…सब बिलख रहे थे। घटना ही ऐसी थी कि किसी का भी दिल चीर जाए।
नूपुर सिया को अपने साथ अपने घर ले गई क्योंकि उस समय ऐसे हालात में उसे वहां सौम्या के ससुराल रखना उचित नहीं लगा था।
सारे क्रियाकर्म के पश्चात सब रिश्तेदारों के जाने के बाद निशांत और नूपुर भी अपने घर लौट आए।
अगले दिन निशांत गुमसुम बैठा था। नूपुर उसके पास आई, उसने गोद में सिया को उठाया हुआ था, वो पास में रखी कुर्सी पर बैठ गई।
“सुनो जी!! आठ दस दिन पश्चात हमें सिया को ले कर उसके दादा दादी के पास जाना होगा। वो उनकी अमानत है, उन्हें सौंपनी होगी!”
निशांत ने सिया को देखा और उसे गोद में ले कर बिलख उठा।
एक सप्ताह पश्चात वो सिया को उसके दादा दादी को सौंपने के लिए सौम्या की ससुराल गए। लेकिन वहां उसके दादा दादी ने उसे रखने से इनकार कर दिया। उन लोगों ने कहा कि हमारा बेटा और बहू दोनों नहीं है तो इसको अब हम क्यों रखे? अगर ये लड़की की बजाय लड़का होता तो फिर भी सोच सकते थे।
उनका ऐसा जवाब सुन कर निशांत और नूपुर दोनों को बहुत दुख हुआ और वो सिया को अपने साथ वापस ले आए।
निशांत एक सरकारी दफ्तर में मामूली क्लर्क था। उसके भी दो छोटे छोटे बच्चे थे।
“नूपुर, हमारे पहले ही दो बच्चे है। इस महंगाई के ज़माने में हम तीन बच्चे कैसे पालेंगे? अगर तुम कहो तो मैं सिया को अनाथाश्रम में छोड़ आऊँ!”
“कैसी बातें करते हो! सिया हमारी सौम्या की निशानी है। मैंने सौम्या को हमेशा अपनी बहन माना है। उसकी बेटी को अनाथाश्रम छोड़ आए तो उसकी आत्मा को कितना दुख होगा और हम भी खुद को कभी माफ नहीं कर पाएंगे!”
“लेकिन हम तीन बच्चे कैसे पालेंगे?”
“अगर तीसरा हमारा अपना बच्चा होता तो…तो क्या हम उसे अनाथाश्रम छोड़ आते? और हर बच्चा अपनी किस्मत ले कर आता है। हम तो निमित्त मात्र है। सिया भी अपनी किस्मत ले कर आई है…हम सिर्फ माध्यम है!” नूपुर ने निशांत को समझाया।
“मैं कहना तो नहीं चाहता लेकिन तुम अपने बच्चों की परवरिश में इस नन्हीं जान को मत भूल जाना। अभी तो तुम भावुकता में कह रही हो लेकिन ऐसा ना हो कि भविष्य में तुमको अपने फैसले पर पछताना पड़े!”
“मैं आपको वादा करती हूं कि आज से मेरे तीन बच्चे है और तीनों में कभी कोई फर्क नहीं करूंगी!” नूपुर की ये बात सुन कर निशांत ने एहसानमंद हो कर उसे देखा। दरअसल वो तो सिया को अपने पास ही रखना चाहता था लेकिन उसे डर था कि नूपुर जो सिया की मामी है वो कहीं मना ना कर दे और अगर वो सिया को रख भी ले तो वो सिया के साथ भेदभाव ना करे। लेकिन अब नूपुर की बात सुन कर वो सिया की तरफ से निश्चिंत हो गया था।
समय गुजरता गया। नूपुर ने जो वादा किया था वो बराबर निभाया। उसने तीनों बच्चों की एक समान परवरिश की, एक समान प्यार दुलार किया। सिया सबसे छोटी थी उसे हमेशा अपने सीने से चिपका कर रखा था। वो सिया की मां बन गई थी। उसे हमेशा अपनी ममता की छाँव में रखा था।
कम आमदनी में भी उसने तीनों बच्चों की बहुत अच्छे से परवरिश की थी।
सिया को कभी महसूस नहीं हुआ कि वो उसका घर नहीं है, उसके मामा मामी का घर है। नूपुर के दोनों बच्चे और सिया…तीनों भाई बहन की तरह ही लड़ते झगड़ते, एक दूसरे से लाड़ दुलार करते बड़े हुए। नूपुर के दोनों बच्चों को कभी महसूस नहीं हुआ कि सिया उनकी सगी बहन नहीं है।
तीनों भाई बहन ने बड़े हो कर अच्छी शिक्षा प्राप्त कर ली थी। नूपुर का बेटा दक्ष इंजिनियर बन गया था, बेटी महक ने फैशन डिजाइनिंग में डिग्री ले कर अपना बुटीक खोल लिया था।
और सिया…सिया एक सरकारी गाड़ी से उतर रही थी। उसका रुतबा देख कर नूपुर और निशांत की आँखें भर आई थी क्योंकि उनकी छोटी सी सिया आज एक आई ए इस ऑफिसर बन गई थी।
सिया घर के बाहर खड़े अपने मामा मामी के चरणों में झुक गई और उनके पैरों को अपने आंसुओं से भिगोते हुए बोली,
“बचपन से मुझे सब लोग कहते थे मेरे मम्मी पापा मुझे छोड़ कर भगवान के घर चले गए लेकिन मैं सबको कहती थी कि मेरे मम्मी पापा है, यहीं है जो मेरे साथ मेरे सामने खड़े है। मामा मामी मैने अपने मम्मी पापा को नहीं देखा…तो क्या हुआ…मेरे मम्मी पापा हमेशा से आप ही है। वो भी मुझे इतना प्यार नहीं करते, जितना आपने किया है।
रिश्तों का ऐसा पवित्र और अनोखा रंग तो भगवान का आशीर्वाद है, ईश्वर की देन है।
मैं आपको थैंक यू नहीं कहूंगी क्योंकि मैं आपकी बेटी हूं और बच्चे मम्मी पापा को थैंक यू नहीं कहते बल्कि उनका आशीर्वाद लेते है और मेरी ये सफलता आपकी ही मेहनत और आशीर्वाद का परिणाम है।
ये सफलता मेरी नहीं बल्कि आपके प्यार और आशीर्वाद की सफलता है, ये आप दोनों की सफलता है।
निशांत और नूपुर ने बहती आँखों के साथ सिया को उठाया और अपने गले से लगा कर उसे ढेरों आशीर्वाद दे दिए।
रिश्तों के ऐसे रंग देख कर वहां मौजूद हर शख्स की आँखें गीली हो गई थी।
रेखा जैन
अहमदाबाद, गुजरात
#रिश्तों के भी रंग