रात भर आँखें जागतीं रहीं।दिल में बादलों की उमड़ घुमड़ उत्ताल पर हो रही थी।दीप्ति को बिस्तर पर चैन कहां था।कल उसकी जिंदगी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिन होने वाला था।इतने महीनों की अथक मेहनत का परिणाम मिलने वाला था।कल उसका रिजल्ट डे था।सुबह ही टीवी और समाचार पत्रों में उसने देखा और पढ़ा था कि बोर्ड के परीक्षा परिणाम कल घोषित होंगे।इसीलिए उसे नींद नहीं आ रही थी।
उसे याद आ रहा था वह दिन जब पापा ने घर में घोषित किया था कि जिस बच्चे के नब्बे प्रतिशत नंबर आएंगे उसे वह शहर के बड़े कॉलेज में पढ़ने भेजेंगे।बस उसी दिन से दीप्ति दृढ़ संकल्पित हो गई थी मानो उसे अपने जीवन की दिशा मिल गई हो।दिन रात एक कर दिया था उसने।पूरे स्कूल में वह पूर्व घोषित टॉपर कहलाने लगी थी।
परीक्षा की तैयारी और हर पेपर उसने जैसा सोचा था उससे बढ़ के ही अच्छा हुआ था।वह बेहद आशान्वित थी अपने अच्छे परीक्षा परिणाम के प्रति।उसके पिता समीर जी और मां शोभना जी भी ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि बेटी की मेहनत व्यर्थ ना जाने देना प्रभु ।समीर जी के तो ऑफिस में भी दीप्ति का रिजल्ट चर्चा का विषय बन गया था क्योंकि समीर जी के बॉस की बेटी भी उसी कक्षा में थी।
वह रात पूरे घर के लिए बेहद तनावपूर्ण थी।
जैसे तैसे सुबह हुई।प्रात: दस बजे रिजल्ट खुलना था।दीप्ति के घर समाचार पत्र नहीं आता था।भाई गया था समाचार पत्र लेने जिसमें रोलनंबर के अनुसार रिजल्ट छपा था।भाई अपने साथ बहन का रोलनंबर भी ले गया था और मां से मांग कर रुपए भी ले गया था ।उसे दृढ़ विश्वास था कि बहन का रिजल्ट बहुत अच्छा ही आएगा।कलाकंद उसकी फेवरेट मिठाई है खरीद कर लेता आऊंगा और सबसे पहले उसे मै ही मिठाई खिलाऊंगा सोच कर खुश होता हुआ वह तेज कदमों से बाजार में पहुंचा तो कई लोग समाचार पत्र बेचते और पढ़ते नजर आए।उसने तुरंत एक समाचार पत्र खरीदा और बहुत अधीरता से वहीं खड़े खड़े रोलनंबर जेब से निकाल कर रिजल्ट चेक करने लगा।काफी देखने के बाद भी उसे वह रोलनंबर कहीं दिखाई ही नहीं पड़ा तब उसे लगा शायद जल्दबाजी में मैंने गलत रोलनंबर लिख लिया है।सोचते हुए वह तेजी से घर वापिस लौटा।
दीप्ति उसे देखते ही उतावली हो गई।
बहन दिखा तेरा रोलनंबर मैने शायद गलत लिख लिया है भाई ने जल्दी से कहा तो दीप्ति अपना प्रवेश पत्र ले आई।जल्दी से पेपर खोल कर दोनों रोलनंबर ढूंढने लगे तब तक पिता की आवाज सुनाई दी।
अरे उत्तीर्ण रोलनंबर में नहीं अनुत्तीर्ण में देखो पिता का वाक्य दीप्ति के कानों में पिघला सीसा उड़ेल गई।
पिता जी कैसी बात कर रहे हैं कम से कम बहन के लिए तो ऐसा मत कहिए मेरे लिए कहते थे वो तो ठीक था भाई उग्र स्वर में बोल उठा।
तब तक पिता जी ने पेपर उठा कर अनुत्तीर्ण रोलनंबर की लिस्ट में रोलनंबर दिखा दिया।
ये देखो यही है ना उस रोलनंबर पर उंगली रख उन्होंने दीप्ति की तरफ सशंकित नजरों से देखा तो दीप्ति उनकी उंगली के नीचे लिखे रोलनंबर को देखती रह गई।ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह बेहोश होकर गिर पड़ेगी।
दीप्ति क्या हुआ बेटी मां शोभना जी पूजा घर से प्रसाद लेकर आ रहीं थीं दीप्ति का जर्द चेहरा देख भागती हुई आ गईं।
कोई कुछ कहने की स्थिति में बचा ही नहीं था।
ऐसा नहीं हो सकता ।आपने सोचा ही कैसे अनुत्तीर्ण रोलनंबर लिस्ट देखने के विषय में हिम्मत करके शोभना जी ने जड़ बैठे पति को झकझोरा।
बॉस ने कहलवाया था।उन्होंने ही देखा।उनके पास भी दीप्ति का रोलनंबर है समीर जी किसी तरह कह पाए।क्या मुंह दिखाऊंगा मै अब सबको गला भर आया उनका।
बहन दरवाजा खोल क्या कर रही है तब तक भाई की तेज आवाजें आने लगीं।दोनों दौड़ कर दीप्ति के कमरे के पास पहुंचे तो भाई बंद दरवाजे को पीटते हुए पाया।
अनहोनी का भय सिहरा गया सबको।
दीप्ति दरवाजा खोल शोभना जी ने चिल्ला कर कहा।
भाई ने देर होती देख धक्का मार कर दरवाजा ही तोड़ दिया।
मां तुम सब लोग जाओ मुझे किसी से बात नहीं करनी दीप्ति फफक कर रो रही थी।
बहन कोई वाहियात विचार दिमाग में मत लाना।मैं तो मान ही नहीं सकता कि मेरी बहन फेल हो गई है ये हो ही नहीं सकता मुझे पूरा विश्वास है अपनी बहन की मेहनत पर भाई उत्तेजित था।
अब तुम्हारे मानने या ना मानने से क्या होता है।सच्चाई तो यही है।पेपर में तो यही रिजल्ट है।सब तरफ थू थू हो रही है ।ऐसा कलंक लगा दिया इसने जो कभी छूटेगा ही नहीं समीर जी हताश थे।
दिन भर पड़ोसियों ऑफिस वालों रिश्तेदारों का ऐसा तांता लगा रहा मानो पता नहीं क्या हो गया।हर कोई मातमपुर्सी करने में लगा था।सहानुभूति दिखाने के बहाने मजे ले रहे थे लोग।
समीर जी आपको जरूरत से ज्यादा भरोसा था अपनी बेटी पर।हमे पहले ही लगता था इतना भरोसा करना सही नहीं है। आपने कुछ ज्यादा ही छूट भी दे रखी थी बेटी को अब देख लीजिए नतीजा पड़ोसी मनीष जी दिलासा कम दे रहे थे सुना ज्यादा रहे थे।
पढ़ती तो बहुत थी।किसी के घर किसी पार्टी में भी कभी ना जाती थी चाहे जितना बुला लो हमारी प्रीति तो बिल्कुल ना पढ़ती थी फिर भी फर्स्ट डिवीजन पास हो गई है दर्प से सरला आंटी कह रहीं थीं जो दीप्ति का रिजल्ट सुनते ही मिठाई लेकर आ गईं थीं कि हमारी प्रीति तो पास हो गई।
जितने मुंह उतनी बातें हो रहीं थीं। सारा जगत आज दीप्ति का हितैषी बन आया था।मानव स्वभाव किसी के कष्ट में अपना संतोष ढूंढता है।दिखावे की सहानुभूति की बाढ़ आ गईं थी।
दीप्ति अपना कमरा बंद किए पड़ी रही।शोभना जी और समीर दिन भर विविध भांति के लोगों से मिलते रहे सुनते रहे।चुपचाप भीतर से रोते रहे।शाम को दीप्ति के स्कूल की एक टीचर आईं जो दीप्ति से ही मिलने आईं थीं।बड़ी मुश्किल से दीप्ति उनसे मिलने कमरे से बाहर आई।
दीप्ति तुम इतना दुखी मत हो।तुम्हारे सारे पेपर अच्छे गए थे।तुम फेल नहीं हो सकती ।हम लोग इसकी जांच करवाएंगे ।फिर से तुम्हारी उत्तर पुस्तिकाएं चेक करवाएंगे जिस विषय में तुम फेल हुई हो उसमें तुम्हारे सिर्फ नौ नंबर आए हैं ऐसा हो ही नहीं सकता उसी विषय की फिर से जांच करवाएंगे तुम की दुखी मत हो टीचर की बातों से और उनका अपने ऊपर भरोसा देख दीप्ति को काफी हिम्मत मिली।
टीचर ने दीप्ति से एक आवेदन भरवाया पिता जी के साइन लिए और इस प्रक्रिया में समय लगेगा इसलिए धैर्य रखना ऐसी हिम्मत बंधा कर वह चली गईं।
परिस्थिति इतनी कठिन थी कि धैर्य रखना संभव ही नहीं था।इंतजार का एक एक दिन नहीं एक एक पल काटना दुस्सह था।दुनिया के ताने कड़वी जबानें व्यंग्य उपहास से सभी घरवालों के दिल विदीर्ण थे।
आखिर में इंतजार खत्म हुआ और वह दिन आया।
उस विषय की उत्तरपुस्तिका का पुनर्मूल्यांकन करवाया गया तो गलती उजागर हुई वह रोंगटे खड़े करने वाली थी।
दीप्ति को जिस विषय में मात्र नौ नंबर मिले थे वह दरअसल नौ नहीं नब्बे थे।90 को चढ़ाने वाले ने गलती से उल्टा चढ़ा कर 09 कर दिया था।
जीरो जो सामने था अब नौ के पीछे आ गया।पूरा रिजल्ट ही बदल गया था अब तो और पूरी दुनिया भी बदल गई थी एक झटके में दीप्ति की।
दुनिया वाले भी बदल गए थे अब।जो कल तक उसे कलंक लगाने वाली घोषित कर रहे थे आज गिरगिट की तरह रंग बदल तारीफों के पुल बांध रहे थे।
देख बहन मुझे पूरा विश्वास था कि मेरी बहन फेल ही ही नहीं सकती ।और आज तूने साबित भी कर दिया चल अब मुंह खोल असली खोवे के कलाकंद लाया हूं एकदम ताजे भाई ने एक बड़ा सा मिठाई का डब्बा खोलते हुए कहा तो दीप्ति मुंह खोल हंसने लगी।
भैया इतना बड़ा डिब्बा लाए हो उसने आश्चर्य से पूछा।
हां क्यों नहीं लाउंगा सबको खिलाना है पर सबसे पहले सरला आंटी और उनकी फर्स्ट डिवीजन लाने वाली होनहार बेटी को खिलाने उनके घर जा रहा हूं जोर से हंसकर भाई ने कहा तो सब हंसने लगे।
पिता जी अब तो मुझे बड़े वाले कॉलेज भेजेंगे ना दीप्ति ने पिता की तरफ देखते हुए पूछा तो समीर जी प्रसन्न हो गए हां बेटी बिल्कुल भेजूंगा मेरी बेटी ने नाम रोशन कर दिया है मुझे गर्व है तुझ पर बेटी को गले से लगाते हुए समीर जी भावुक हो गए ।
विशेष: ऐसा होता है।कई बातें रिजल्ट को प्रभावित करती हैं।माता पिता से अनुरोध है कि अपने बच्चों पर भरोसा रखें और भरोसा दिलाते रहें कि ऐसी किसी भी कठिन परिस्थिति में वे अपने बच्चों के साथ खड़े हैं।बच्चे कमजोर और भावुक होते हैं।रिजल्ट का महत्व इतना बड़ा भी नहीं होना चाहिए कि जिंदगी जीने का महत्व छोटा लगने लगे।
लतिका श्रीवास्तव
यह कलंक कभी ना मिटेगा#कहानी प्रतियोगिता